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    सूरए इसरा, आयतें 32-33, (कार्यक्रम 483)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 32 की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَقْرَبُوا الزِّنَا إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَسَاءَ سَبِيلًا (32)

    और व्यभिचार के (तो) निकट भी न जाओ की यह अत्यंत बुरा कर्म और बहुत बुरा मार्ग है।(17:32)

    इससे पूर्व की आयतों में ईश्वर ने लोगों को अज्ञानता के काल के बुहत से बुरे कार्यों से रोका था। यह आयत कहती है कि न केवल यह कि व्यभिचार न करो बल्कि उसके निकट भी न जाओ अर्थात उन बातों से भी दूर रहो जो मनुष्य को इस अप्रिय एवं घृणित कृत्य के निकट ले जाती हैं।

    महिला और पुरुष के बीच अवैध संबंधों की प्रक्रिया एक दूसरे की ओर देखने से आरंभ होती है। इस्लाम ने मां, बहन, बेटी, मौसी, बुआ, नानी, दादी, नतनी, पोती तथा पत्नी के अतिरिक्त किसी दूसरी महिला पर दृष्टि डालना पुरुष के लिए वर्जित घोषित किया है। इसी प्रकार दूसरी महिलाओं से अनावश्यक मेल जोल से भी रोका गया है। यह सारे धार्मिक आदेश समाज के लोगों के वैचारिक एवं मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य को सुनिश्चित बनाने के लिए हैं ताकि महिलाओं के अधिकारों के हनन को रोका जा सके और वे पूरी सुरक्षा के साथ समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें।

    यदि हम परिवार एवं समाज पर व्यभिचार के ख़तरनाक परिणामों पर दृष्टि डालें तो हम भली भांति समझ जाएंगे कि क्यों सभी आसमानी धर्मों में इस कृत्य को बुरा व निंदनीय बताया गया है और इसमें ग्रस्त होने वाले के लिए लोक-परलोक में ईश्वरीय दंड की घोषणा की गई है।

    विचित्र बात यह है कि आज के सभ्य संसार में महिलाओं की स्वतंत्रता तथा उनके अधिकारों की रक्षा का दावा करके उनपर सबसे बड़ा अत्याचार किया जाता है और विभिन्न प्रकार से उनका यौन शोषण किया जाता है। आज पश्चिमी देशों में स्कूलों और कालेजों की छात्राओं में गर्भपात के आंकड़ों ने इन देशों के अधिकारियों को चिंतित कर रखा है। यह अवैध संबंधों का ही एक ख़तरनाक परिणाम है। इसी प्रकार विभिन्न प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोग कि जो आत्महत्या तक का कारण बन जाते हैं, इसी निंदनीय कृत्य के कुपरिणाम हैं।

    समाज में व्यभिचार के प्रचलन के कारण विवाहित पुरुषों और महिलाओं में भी यह रोग फैल जाता है और विवाहेतर संबंधों के माध्यम से वे अपने दंपत्ति के साथ विश्वासघात करते हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि आज के समाज में तलाक़ के बढ़ते हुए आंकड़ों का एक कारण बढ़ता हुआ व्यभिचार है और तलाक़ स्वयं ही समाज में निरंकुशता के बढ़ने का कारण है।

    इसके अतिरिक्त व्यभिचार के कारण समाज में अवैध संतानों की संख्या बढ़ती है और ये बच्चे बड़े होकर समाज में बहुत से अप्रिय कार्य और अपराध करते हैं।

    इन सब बुराइयों के मुक़ाबले में इस्लाम ने सदैव इस बात की सिफ़ारिश की है कि युवाओं का सही समय पर विवाह कर दिया जाए ताकि प्रथम तो यह कि उनकी प्राकृतिक, शारीरिक व मानसिक इच्छाएं पूरी हो जाएं और दूसरे यह कि वे जीवन साथी के संबंध में अपने दायित्वों का आभास करें और अप्रिय व निंदनीय बातों से दूर रहें।

    इस आयत से हमने सीखा कि कुछ पापों का ख़तरा इतना अधिक है कि उनके निकट जाना भी उचित नहीं है और उन बातों से भी दूर रहना चाहिए जो इस प्रकार के पापों का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

    व्यभिचार, साधारण सा पाप नहीं है बल्कि यह अन्य पापों तथा समाज में पाप व अपराध फैलने का मार्ग प्रशस्त करता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 33 की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَمَنْ قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِفْ فِي الْقَتْلِ إِنَّهُ كَانَ مَنْصُورًا (33)

    और बिना अधिकार के उसकी हत्या न करो जिसकी हत्या को ईश्वर ने वर्जित किया है और जो अत्याचार ग्रस्त होकर मारा जाता है उसके उत्तराधिकारी को हमने (बदले का) अधिकार दे दिया है तो उसे (बदले में हत्या करने में) अतिश्योक्ति नहीं करनी चाहिए निश्चय ही उसकी सहायता की जाएगी।(17:33)

    पिछली आयत में व्यभिचार से दूर रहने की सिफ़ारिश करने के बाद, क़ुरआने मजीद इस आयत में हत्या से रोकता है और कहता है कि ईश्वर सभी लोगों की जान को सम्मानीय समझता है और किसी को भी किसी भी दशा में दूसरे की जान लेने का अधिकार नहीं है सिवाय इसके कि ईश्वर ने उसे यह अधिकार दिया हो और यह अधिकार केवल मृतक के उत्तराधिकारी को है कि वह हत्यारे की जान ले ले किंतु वह भी ईश्वरीय आदेशों के अनुसार। अर्थात हत्यारे को न तो यातनाएं दी जानी चाहिए, न उसे जलाना चाहिए और न ही उसके शरीर के अंगों को काटना चाहिए क्योंकि ये बातें अतिश्योक्ति की परिधि में आती हैं।

    इसी प्रकार मतभेद को हत्यारे और मृतक के परिवारों या फिर उनकी जाति और क़बीले तक फैला देना भी अतिश्योक्ति है। उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में यही परंपरा थी और कभी कभी किसी क़बीले के एक व्यक्ति की हत्या के कारण दो या कई क़बीलों के बीच वर्षों तक युद्ध होता रहता था।

    अलबत्ता हत्या के बदले में हत्यारे की हत्या इस संसार में उसके लिए न्यूनतम दंड है और प्रलय में मिलने वाला दंड उसकी प्रतीक्षा में है। रोचक बात यह है कि इस आयत के अंत में ईश्वर कहता है कि मृतक के परिवार को ईश्वरीय सहायता व समर्थन प्राप्त है अतः वह उन्हें यह अधिकार देता है कि वे हत्यारे की जान ले लें अथवा उससे मृतक की जान का पैसा ले लें। इस प्रकार मतभेद और झगड़े को बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    इस आयत से हमने सीखा कि हर मनुष्य को चाहे वह मुसलमान हो या न हो, जीवन का अधिकार है और किसी को भी ईश्वर के आदेश के बिना किसी की जान लेने का अधिकार नहीं है।

    जिस प्रकार से दूसरों की हत्या वर्जित है उसी प्रकार से आत्म हत्या भी वर्जित है क्योंकि ईश्वर ने किसी को भी यह अधिकार नहीं दिया है कि वह अपनी हत्या करे।

    समाज को अत्याचारग्रस्त का समर्थन करना चाहिए क्योंकि यही ईश्वर की इच्छा है।