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    सूरए इसरा, आयतें 34-36, (कार्यक्रम 484)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 34 की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَقْرَبُوا مَالَ الْيَتِيمِ إِلَّا بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ حَتَّى يَبْلُغَ أَشُدَّهُ وَأَوْفُوا بِالْعَهْدِ إِنَّ الْعَهْدَ كَانَ مَسْئُولًا (34)

    और अनाथ के माल के निकट (भी) न जाओ सिवाय सबसे उत्तम शैली के (जो उसके हित में हो) यहां तक कि वह व्यस्कता को पहुंच जाए। और प्रतिज्ञा को पूरा करो कि निश्चित रूप से प्रतिज्ञा के बारे में प्रश्न किया जाएगा।(17:34)

    पिछली आयतों में हत्या और व्यभिचार जैसे बुरे व अप्रिय कृत्यों से रोकने संबंधी कुछ ईश्वरीय आदेशों का वर्णन किया गया था। यह आयत कहती है कि अनाथ के माल के संबंध में ऐसे हर कार्य से दूर रहो जो उसके अहित में हो तथा अनाथ के माल का इस प्रकार आदर करो कि उसके संबंध में ऐसा कोई भी आदान-प्रदान या क्रय-विक्रय न हो जिसमें उसके हितों को दृष्टिगत न रखा गया हो।

    यह भी उल्लेखनीय है कि सीमा से अधिक सतर्कता व शंका, अनाथ को क्षति पहुंचने का कारण बनती है। उदाहरण स्वरूप अनाथ के माल को बिना किसी लाभ के यूं ही रख दिया जाए ताकि जब वह बड़ा हो जाए तो उसके हवाले कर दिया जाए, या यह कि अनाथ का माल प्रयोग करने के भय से उसके साथ खाना भी न खाया जाए कि जिससे उसका हृदय दुखेगा व अलग-थलग हो जाएगा।

    इसी कारण अनाथ के अधिकारों की पूर्ण रक्षा करते हुए तथा उसके माल से किसी भी प्रकार का अनुचित लाभ उठाने से दूर रहते हुए, उसके साथ उचित पारिवारिक एवं सामाजिक संबंध स्थापित करने चाहिए। इन चेतावनियों का अर्थ यह नहीं है कि कोई अनाथों के दायित्वों को स्वीकार ही न करे और उनके माल को उनकी स्थिति पर छोड़ दे।

    इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम अनाथों और वंचितों के अधिकारों का समर्थक है और वह अनाथ पर अत्याचार को हत्या एवं व्यभिचार के समान समझता है।

    बच्चों को भी स्वामित्व का अधिकार प्राप्त है, चाहे वे अनाथ ही क्यों न हों किंतु जब तक वे व्यस्क न हो जाएं उन्हें अपने माल को ख़र्च करने का अधिकार नहीं है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 35 की तिलावत सुनें।

    وَأَوْفُوا الْكَيْلَ إِذَا كِلْتُمْ وَزِنُوا بِالْقِسْطَاسِ الْمُسْتَقِيمِ ذَلِكَ خَيْرٌ وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا (35)

    और जब तुम नाप के माध्यम से कोई वस्तु बेचो तो पूरी नाप दो और सीधी व सही तुला से तौलो। यह (तुम्हारे लिए) उत्तम है और इसका अंत भी सबसे भला है।(17:35)

    यह आयत समाज के लोगों के बीच आर्थिक संबंधों को व्यवस्थित करने के संबंध में कहती है कि क्रय-विक्रय के दौरान नापी और तौली जाने वाली वस्तुओं के संबंध में बहुत अधिक ध्यान दो और नाप तथा तौल में तनिक भी कमी न करो।

    एक रोचक बात यह है कि क़ुरआने मजीद ने अनेक आयतों में लेन-देन और क्रय-विक्रय में लोगों के अधिकारों के पालन पर विशेष ध्यान दिया है, यहां तक कि क़ुरआने मजीद की सबसे बड़ी आयत भी इसी संबंध में है।

    स्पष्ट सी बात है कि वह व्यक्ति और समाज, कल्याण व सौभाग्य की ओर क़दम आगे बढ़ाता है जिसकी अर्थव्यवस्था का आधार सही एवं स्वस्थ होता है तथा उसके आर्थिक संबंधों में डंडी मारने, धोखा देने, घूस देने और व्याज लेने व देने जैसी बातें नहीं होतीं।

    इस आयत से हमने सीखा कि वस्तु को तौलते समय उसे सही वज़न करने और आर्थिक मामलों पर सही ढंग से ध्यान देने से कारोबार में प्रगति होती है।

    यद्यपि डंडी मारने से लाभ होता है किंतु यह सांसारिक साख समाप्त हो जाने और प्रलय के दंड में ग्रस्त होने का कारण बनता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 36 की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ إِنَّ السَّمْعَ وَالْبَصَرَ وَالْفُؤَادَ كُلُّ أُولَئِكَ كَانَ عَنْهُ مَسْئُولًا (36)

    और जिस बात का तुम्हें ज्ञान न हो उसका अनुसरण न करो कि निश्चित रूप से कान, आंख और हृदय इन सबके बारे में प्रश्न किया जाएगा।(17:36)

    परिवार अथवा समाज के स्तर पर मानव समाजों की एक बड़ी समस्या, जल्दबाज़ी में निर्णय करना, व्यक्तिगत पूर्वाग्रह तथा अनुचित ढंग से जल्दी विश्वास कर लेना है और इनमें से प्रत्येक का आधार देखी व सुनी हुई बातें होती हैं। जबकि बहुत सी सुनी हुई बातों का कोई प्रमाण व तर्क नहीं होता और कहने वाला व्यक्ति अपनी कल्पना और विचार के अनुसार कोई बात कह देता है और जब हम उसकी जांच करते हैं तो पता चलता है कि वह बात ग़लत थी।

    देखी हुई बातों का महत्व, सुनी हुई बातों से अधिक है किंतु उसकी भी शर्त यह है कि हमारी दृष्टि, साधारण और केवल विदित बातों को देखने वाली न हो और हम देखी हुई बातों की सही ढंग से समीक्षा कर सकें। खेद के साथ कहना पड़ता है कि दोमुखी लोग और धर्म के शब्दों में मिथ्याचारी लोग, समाज में बहुत अधिक हैं जिनका विदित रूप अच्छा होता है और वे भोले तथा साधारण लोगों को सरलता से धोखा दे देते हैं अतः बहुत अधिक होशियारी की आवश्यकता है कि मनुष्य इस प्रकार के लोगों के धोखे में न आए।

    यह आयत कहती है कि यदि देखी व सुनी हुई बातों से तुम पूर्ण रूप से संतुष्ट हो और तुम्हें उन पर विश्वास हो जाए तो तुम उनके आधार पर काम कर सकते हो, किंतु केवल देखते और सुनते ही निष्कर्ष निकाल कर कोई काम न करो कि तुम्हें उसके परिणाम के प्रति उत्तरदायी होना पड़ेगा।

    मनुष्य न केवल यह कि अपनी आंखों और कानों के प्रति बल्कि अपने मन में विचारों के प्रति भी उत्तरदायी है क्योंकि कभी कभी ऐसा भी होता है कि मनुष्य कहता तो कुछ नहीं है किंतु उसके मन में किसी के प्रति बुरा विचार होता है और वह उस विचार को समाप्त करने के स्थान पर उसे बल प्रदान करता रहता है जबकि उसके पास इसके लिए कोई तर्कसंगत कारण भी नहीं होता।

    इस आयत से हमने सीखा कि जीवन में मनुष्य के कर्म एवं व्यवहार का मानदंड, केवल सुनी हुई एवं देखी हुई बातें एवं कल्पनाएं नहीं बल्कि ज्ञान एवं विश्वास होना चाहिए।

    न केवल आंखें और कान बल्कि हाथ और ज़बान जैसे मनुष्य के अंगों के बारे में भी प्रश्न किया जाएगा और उसे प्रलय में अपनी सभी करनी और कथनी का उत्तर देना होगा।