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    सूरए इसरा, आयतें 37-40, (कार्यक्रम 485)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 37 और 38 की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَمْشِ فِي الْأَرْضِ مَرَحًا إِنَّكَ لَنْ تَخْرِقَ الْأَرْضَ وَلَنْ تَبْلُغَ الْجِبَالَ طُولًا (37) كُلُّ ذَلِكَ كَانَ سَيِّئُهُ عِنْدَ رَبِّكَ مَكْرُوهًا (38)

    और धरती पर घमंड से अकड़ कर न चलो, निश्चित रूप से न तो तुम धरती को फाड़ सकते हो और न ही पर्वतों की उंचाइयों तक पहुंच सकते हो।(17:37) (तुम्हारे) इन सब (कर्मों) की बुराई ईश्वर के निकट अत्यंत अप्रिय हैं।(17:38)

    पिछली आयतों में व्यभिचार, हत्या, अनाथों पर अत्याचार और डंडी मारने जैसे कुछ बुरे व अप्रिय कार्यों से दूर रहने के संबंध में इस्लामी आदेशों का वर्णन किया गया था, यह आयत एक महत्वपूर्ण सामाजिक एवं शिष्टाचारिक आदेश की ओर संकेत करते हुए कहती है कि लोगों के बीच रास्ता चलते समय अहंकारी एवं घमंडी लोगों की भांति अकड़ कर न चलो। न तो इस प्रकार धरती पर पैर मार कर चलो कि मानो उसे फाड़ देना चाहते हो और न ही इस प्रकार गर्दन अकड़ा कर चलो कि मानो स्वयं को पर्वतों से भी ऊंचा दिखाना चाहते हो बल्कि बड़ी विनम्रता और आराम के साथ क़दम उठा कर चलना चाहिए कि यह ईश्वर के भले बंदों का चिन्ह है और इस बात की ओर सूरए फ़ुरक़ान की 63वीं आयत में भी संकेत किया गया है।

    जी हाँ, इस्लाम ने वाजिब और हराम अर्थात अनिवार्य और वर्जित जैसे कार्यों के अतिरिक्त भी विभिन्न आदेश दिए हैं और यदि इन आदेशों का पालन किया जाए तो मनुष्य शिष्टाचारिक रूप से परिपूर्ण हो जाता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि केवल बात करने और देखने में ही नहीं बल्कि रास्ता चलने में भी घमंड एक अप्रिय एवं निंदनीय कार्य है।

    बुरे कार्य, सभी धर्मों में अप्रिय समझे जाते हैं क्योंकि वस्तुतः ये कार्य ईश्वर की दृष्टि में अप्रिय हैं।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 39 की तिलावत सुनें।

    ذَلِكَ مِمَّا أَوْحَى إِلَيْكَ رَبُّكَ مِنَ الْحِكْمَةِ وَلَا تَجْعَلْ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آَخَرَ فَتُلْقَى فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَدْحُورًا (39)

    ये आदेश, उन तत्वदर्शिताओं में से हैं जो तुम्हारे पालनहार ने अपने विशेष संदेश वहि द्वारा तुम्हारे पास भेजे हैं और कदापि ईश्वर के साथ किसी को पूज्य न ठहराना कि तुम ऐसी स्थिति में नरक में डाल दिए जाओगे कि तुम धिक्कारे व दुत्कारे हुए होगे।(17:39)

    सूरए इसरा की आयत नंबर 22 से लेकर आयत नंबर 38 तक ईश्वर की ओर से विभिन्न आदेशों का वर्णन किया गया है। यह आयत इन आदेशों को ईश्वरीय तत्वदर्शिता बताती है कि जो ईश्वर के विशेष संदेश वहि के रूप में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास भेजी गई हैं।

    रोचक बात यह है कि इन आयतों का सबसे पहला विषय अनेकेश्वरवाद से दूर रहने पर आधारित था, इस आयत में भी एक बार फिर अनेकेश्ववाद से दूर रहने पर बल दिया गया है और कहा गया है कि अनेकेश्वरवादी धिक्कारा व दुत्कारा हुआ तथा ईश्वरीय दया से दूर होता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के आदेश, अकारण और तर्कहीन नहीं बल्कि तत्वदर्शिता के आधार पर हैं, अलबत्ता संभव है कि कभी हम ईश्वरीय आदेश में निहित तत्वदर्शिता को समझ न पाएं किंतु चूंकि हम ईश्वर के तत्वदर्शी होने पर विश्वास रखते हैं अतः हम उस आदेश को भी स्वीकार करते हैं।

    ईश्वरीय क़ानूनों को छोड़ कर मानवीय क़ानूनों का पालन एक प्रकार से अनेकेश्वरवाद है जिसका परिणाम पछताने और अपमानित होने के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 40 की तिलावत सुनें।

    أَفَأَصْفَاكُمْ رَبُّكُمْ بِالْبَنِينَ وَاتَّخَذَ مِنَ الْمَلَائِكَةِ إِنَاثًا إِنَّكُمْ لَتَقُولُونَ قَوْلًا عَظِيمًا (40)

    क्या तुम्हारे पालनहार ने तुम्हारे लिए पुत्रों को चुना है और अपने लिए फ़रिश्तों में से लड़कियों का चयन किया है? निश्चित रूप से तुम लोग बहुत ही बड़ी और कठिन बात कह रहे हो।(17:40)

    प्राचीन काल में अनेकेश्वरवादियों के बीच प्रचलित एक आस्था जो आज भी फ़रिश्तों के चित्रों और मूर्तियों में दिखाई देती है, यह है कि वे फ़रिश्तों को स्त्री समझते थे। जबकि फ़रिश्तों की सृष्टि मानव सृष्टि से पूर्णतः भिन्न है और उनमें मनुष्यों के विपरीत में स्त्री या पुरुष होने की कोई कल्पना ही नहीं है।

    रोचक बात यह है कि अनेकेश्वरवादी ऐसी स्थिति में फ़रिश्तों को ईश्वर की लड़कियां बताते थे, जब वे लड़कियों को अपने लिए लज्जा और अपमान का कारण समझते थे। यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि पुत्रों की भांति ही पुत्रियां भी ईश्वरीय अनुकंपा हैं और मानवीय मूल्यों की दृष्टि से दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। इसी कारण अज्ञानता के काल की भांति लड़कियों का अपमान एक ग़लत विचार और अनुचित व्यवहार है किंतु क़ुरआने मजीद का लक्ष्य यह है कि वह उन्हीं के तर्क से उनकी आलोचना करे कि तुम किस प्रकार के लोग हो कि अपने पालनहार के संबंध में उस बात की आस्था रखते हो जिसे स्वयं के लिए अपमान समझते हो।

    प्रत्येक दशा में यह आयत इस प्रकार की ग़लत आस्थाओं को नकारते हुए कहती है कि क्या ईश्वर ने तुम्हारे लिए लड़कों का चयन किया है जो शक्ति का प्रतीक तथा धन कमाने का साधन हैं और अपने लिए लड़कियों अर्थात फ़रिश्तों को रखा है? तुमने कितना अन्यायपूर्ण फ़ैसला किया है।

    बड़ी दुखद बात है कि इस्लाम से पूर्व के कुछ धर्मों में यह आस्था प्रचलित हो गई थी कि ईश्वर के संतान है। इस आस्था के कारण इन धर्मों की शुद्ध ईश्वरीय शिक्षाओं में फेर-बदल हो गया। जैसा कि क़ुरआने मजीद कहता है कि इतिहास के एक काल में, यहूदी हज़रत उज़ैर को, जो ईश्वरीय पैग़म्बर थे, ईश्वर का पुत्र समझते थे। हज़रत ईसा मसीह के पश्चात भी ईसाइयों ने उन्हें, जो एक महान ईश्वरीय पैग़म्बर थे, ईश्वर का पुत्र कह कर उनकी उपासना आरंभ कर दी। आसमानी धर्मों के अनुयाइयों के बीच, अनेकेश्वरवादी विचारों के ये कुछ उदाहरण हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के बारे में यह आस्था रखना कि उसके संतान है, चाहे पुत्र हो या पुत्री, एक अत्यंत निरर्थक एवं आधारहीन बात है।

    जो बात हम अपने लिए पसंद नहीं करते उसे ईश्वर के लिए किस प्रकार पसंद कर सकते हैं? किस प्रकार फ़रिश्तों के लिए लिंग का निर्धारण किया जा सकता है जबकि वे मनुष्य ही नहीं हैं और उनकी सृष्टि ही अलग है?