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    सूरए इसरा, आयतें 41-44, (कार्यक्रम 486)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 41 की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِي هَذَا الْقُرْآَنِ لِيَذَّكَّرُوا وَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا نُفُورًا (41)

    और निश्चित रूप से इस क़ुरआन में (सत्य को) विभिन्न शैलियों में दोहरा कर बयान किया गया है कि वे इस से नसीहत प्राप्त करें किंतु (इससे सत्य की ओर से) उनके भागने के अतिरिक्त (किसी अन्य बात की) वृद्धि नहीं हुई।(17:41)

    क़ुरआने मजीद की एक विशेषता, विभिन्न प्रकार से अपनी बातों को दोहराना है क्योंकि यह मार्गदर्शन एवं नसीहत की किताब है और मार्गदर्शन केवल बातों को जान लेने से ही प्राप्त नहीं होता बल्कि एक वास्तविकता को विभिन्न रूपों और विभिन्न शैलियों में बयान किया जाना चाहिए ताकि वह मन और आत्मा तक में अपना प्रभाव डाल दे। इसी कारण आगे चल कर आयत कहती है कि इन बातों को इस लिए दोहराया जा रहा है कि लोग नसीहत प्राप्त करें।

    अलबत्ता स्पष्ट है कि सत्य को स्वीकार करने के लिए पवित्र हृदय की आवश्यकता होती है और घमंडी, हठधर्मी तथा संकीर्ण दृष्टि वाले लोग कदापि सत्य और वास्तविकता को स्वीकार नहीं करते, इस आधार पर उनके समक्ष सत्य का जितना भी वर्णन किया जाए वे उसके विरुद्ध ही नीति अपनाते हैं और उनके हठधर्म में वृद्धि होती जाती है।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य को सदैव ही नसीहत और उपदेश की आवश्यकता होती है और सत्य को बारंबार कह कर और सुन कर नसीहत प्राप्त की जा सकती है।

    शत्रुओं की ओर से सत्य का विरोध, सत्य की कमज़ोरी का चिन्ह नहीं है बल्कि यह उनकी दूषित एवं हठधर्मी प्रवृत्ति की निशानी है।

    प्रशिक्षण के उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए केवल एक ही शैली का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इस बात के दृष्टिगत कि लोगों के विभिन्न प्रकार के विचार और योग्यताएं होती हैं, अतः नाना प्रकार की शैलियों और माध्यमों से लाभ उठाना चाहिए।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 42 और 43 की तिलावत सुनें।

    قُلْ لَوْ كَانَ مَعَهُ آَلِهَةٌ كَمَا يَقُولُونَ إِذًا لَابْتَغَوْا إِلَى ذِي الْعَرْشِ سَبِيلًا (42) سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يَقُولُونَ عُلُوًّا كَبِيرًا (43)

    (हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि यदि ईश्वर के साथ कुछ दूसरे पूज्य भी होते, जैसा कि अनेकेश्वरवादी कहते हैं, तो उस स्थिति में वे अर्श अर्थात सर्वोच्च आकाश के स्वामी तक पहुंचने का कोई मार्ग खोज चुके होते।(17:42) ईश्वर पवित्र व महान तथा जो कुछ वे कहते हैं उससे कहीं अधिक उच्च व बड़ा है।(17:43)

    मक्के के अनेकेश्वरवादी, ईश्वर को सृष्टि के रचयिता के रूप में स्वीकार करते थे किंतु उनकी यह भी आस्था थी कि सृष्टि के संचालन में कुछ अन्य ईश्वर उसके समकक्ष हैं जिन्हें वे अपने और ईश्वर के बीच माध्यम समझते थे और इसी आधार पर उनकी उपासना करते थे।

    यह आयत उनके उत्तर में कहती है कि यदि ऐसा होता तो उन माध्यमों को ईश्वर के अधीन रह कर उसके आदेशों का पालन करने के स्थान पर उसके दरबार में घुसपैठ करने और उससे सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए था। दूसरे शब्दों में यदि अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य ईश्वर होता तो वह भी पूरी सृष्टि पर राज करना चाहता और इस प्रकार उन दोनों के बीच सत्ता को और अपने राज के विस्तार को लेकर टकराव होता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सदैव ईश्वर का गुणगान करते रहना चाहिए और विचार अथवा कथन में किसी को भी उसका समकक्ष ठहराने से बचना चाहिए क्योंकि अनन्य ईश्वर विचारों अथवा बातों में जो कुछ भी आता है उससे कहीं अधिक उच्च है।

    इस बात की ओर से सचेत रहना चाहिए कि ईश्वर में आस्था रखने वालों के बीच अंधविश्वासपूर्ण विचार और व्यवहार प्रचलित न होने पाएं, इसी प्रकार इस बात की भी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए कि कोई भी विचार एवं आस्था, धर्म के नाम पर समाज में प्रचलित हो जाए।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 44 की तिलावत सुनें।

    تُسَبِّحُ لَهُ السَّمَاوَاتُ السَّبْعُ وَالْأَرْضُ وَمَنْ فِيهِنَّ وَإِنْ مِنْ شَيْءٍ إِلَّا يُسَبِّحُ بِحَمْدِهِ وَلَكِنْ لَا تَفْقَهُونَ تَسْبِيحَهُمْ إِنَّهُ كَانَ حَلِيمًا غَفُورًا (44)

    सातों आकाश और धरती तथा जो कुछ उनके भीतर है, ईश्वर का गुणगान करता है और कोई वस्तु ऐसी नहीं है जो उसकी सराहना के साथ गुणगान न करती हो किंतु तुम उसके गुणगान को समझ नहीं पाते। निश्चित रूप से वह अत्यंत सहनशील एवं क्षमा करने वाला है।(17:44)

    क़ुरआने मजीद का एक महत्वपूर्ण विषय, वस्तुओं में पाया जाने वाला बोध, ईश्वर के प्रति उनकी विनम्रता व नतमस्तक रहना तथा उसका गुणगान करना है जिसकी ओर क़ुरआने मजीद की अनेक आयतों में संकेत किया गया है। यह आयत भी स्पष्ट रूप से इस विषय की ओर संकेत करते हुए कहती है कि यदि तुम इस प्रकार की बातों को समझ नहीं पाते तो उनका इन्कार न करो क्योंकि यह विषय तुम्हारी समझ से इतर है, केवल इतना समझ लो कि इस बात का अस्तित्व है और सृष्टि तथा उसमें मौजूद वस्तुओं के बारे में तुम्हारी दृष्टि बोधहीन वस्तुओं की नहीं होनी चाहिए।

    यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ लोगों का मानना है कि ईश्वर के प्रति वस्तुओं के गुणगान और नतमस्तक रहने का अर्थ यह है कि वस्तुएं, सृष्टि के क़ानूनों के प्रति प्राकृतिक रूप से नतमस्तक रहती हैं। इसके उत्तर में कहना चाहिए कि प्रथम तो यह कि सृष्टि के क़ानूनों के प्रति वस्तुओं के नतमस्तक रहने का अर्थ गुणगान नहीं है और दूसरे यह कि सृष्टि के क़ानूनों के प्रति वस्तुओं के नतमस्तक रहने को हम स्वयं भी देखते और समझते हैं जबकि इस आयत में कहा गया है कि तुममें वस्तुओं के गुणगान को समझने की क्षमता नहीं है।

    अलबत्ता ईश्वर के प्रिय बंदे, वस्तुओं के गुणगान को समझ सकते हैं, जैसा कि क़ुरआने मजीद में वर्णित है कि हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम चींटियों की बातों को समझते थे और पक्षियों से बातें करते थे। इसी प्रकार कंकरियों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के हाथों पर उनकी पैग़म्बरी की गवाही दी थी।

    इस आयत से हमने सीखा कि संपूर्ण सृष्टि, ईश्वर का गुणगान करती है तो मनुष्य, जो इस सृष्टि का ही एक भाग है, इस कारवां से पीछे क्यों रहे।

    सृष्टि और उसमें मौजूद वस्तुओं के बारे में मनुष्य का ज्ञान, अत्यंत सीमित है और अधिकांश वास्तविकताओं को भौतिक ज्ञानों से समझना संभव नहीं है बल्कि उन्हें समझने के लिए ईश्वर के विशेष संदेश वहि की आवश्यकता है।