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    सूरए इसरा, आयतें 45-48, (कार्यक्रम 487)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 45 और 46 की तिलावत सुनें।

    وَإِذَا قَرَأْتَ الْقُرْآَنَ جَعَلْنَا بَيْنَكَ وَبَيْنَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآَخِرَةِ حِجَابًا مَسْتُورًا (45) وَجَعَلْنَا عَلَى قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَنْ يَفْقَهُوهُ وَفِي آَذَانِهِمْ وَقْرًا وَإِذَا ذَكَرْتَ رَبَّكَ فِي الْقُرْآَنِ وَحْدَهُ وَلَّوْا عَلَى أَدْبَارِهِمْ نُفُورًا (46)

    और (हे पैग़म्बर!) जब भी आप क़ुरआन पढ़ते हैं तो हम आपके और प्रलय पर ईमान न रखने वालों के बीच एक अदृश्य पर्दा डाल देते हैं (17:45) और उनके हृदयों पर पर्दे डाल देते हैं कि वे कुछ न समझ सकें और उनके कानों को बहरा बना देते हैं। और जब आप क़ुरआन में अपने पालनहार का अनन्य होने के रूप में गुणगान करते हैं तो वे पीठ दिखा कर भाग जाते हैं।(17:46)

    इन आयतों में ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहता है कि अनेकेश्वरवादी तथा प्रलय को स्वीकार न करने वाले लोग, क़ुरआने मजीद की वास्तविकताओं को समझने में अक्षम हैं अतः जब कभी आप अपने पालनहार के अनन्य होने का गुणगान करते हैं तो जो लोग अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त हैं, आप से दूर भाग जाते हैं। वे क़ुरआने मजीद की वास्तविकताओं को सुनने तक के लिए तैयार नहीं हैं तो क़ुरआन की शिक्षाओं को समझने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

    दूसरे शब्दों में, प्रलय का इन्कार, धर्म के अन्य मूल सिद्धांतों अर्थात ईश्वर के अनन्य होने तथा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के इन्कार का भी कारण बनता है अतः ईश्वर का कथन अर्थात क़ुरआन मजीद इस प्रकार के लोगों के लिए बहुत कठिन है, इस प्रकार से कि मानो उनके तथा क़ुरआने मजीद के बीच एक अदृश्य पर्दा पड़ा हुआ है और वे क़ुरआन की वास्तविकताओं को देखने व सुनने की क्षमता नहीं रखते।

    इन आयतों से हमने सीखा कि यदि मनुष्य वास्तविकताओं का इन्कार करे तो वह मार्गदर्शन की प्राप्ति की क्षमता खो देता है। यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की ज़बान से क़ुरआने मजीद की तिलावत सुन कर भी उस पर कोई प्रभाव नहीं होता।

    क़ुरआने मजीद की वास्तविकताओं को समझने से वंचित रहना, हठधर्मी व द्वेष रखने वालों के लिए एक प्रकार से ईश्वरीय दंड है।

    यद्यपि अनेकेश्वरवादी, ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते थे किंतु प्रलय के इन्कार और व्यवहार में अनेकेश्वरवाद के कारण ईश्वर के कथन को स्वीकार नहीं करते थे।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 47 की तिलावत सुनें।

    نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَسْتَمِعُونَ بِهِ إِذْ يَسْتَمِعُونَ إِلَيْكَ وَإِذْ هُمْ نَجْوَى إِذْ يَقُولُ الظَّالِمُونَ إِنْ تَتَّبِعُونَ إِلَّا رَجُلًا مَسْحُورًا (47)

    हम भली भांति समझते हैं कि जब ये लोग आपकी बातों को ध्यान से सुनते हैं तो क्या सुनते हैं और जब ये लोग आपस में कानाफूसी करते हैं तो हम उसे भी जानते हैं। ये अत्याचारी आपस में कहते हैं कि तुम लोग एक जादू किए गए व्यक्ति का अनुसरण करते हो।(17:47)

    इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल में ईश्वर का इन्कार करने वालों के नेताओं की बातों और व्यवहार की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि जिस समय पैग़म्बरे इस्लाम क़ुरआने मजीद की तिलावत करते थे, वे भी कभी कभी उनकी तिलावत को सुनते थे किंतु चूंकि वे हठधर्म और इन्कार की भावना से उस तिलावत को सुनते थे अतः उसमें वर्णित बातों को स्वीकार नहीं करते थे बल्कि दूसरों को भी क़ुरआन सुनने से रोकते थे। वे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को ऐसा जादूगर बताते थे जो अपनी बातों से लोगों पर जादू कर देता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर सभी के मन की बातों से अवगत है और उससे कोई भी बात छिपाई नहीं जा सकती। वह सभी के लक्ष्यों और उद्देश्यों को भी जानता है।

    धर्म के शत्रु आरोप और अपमान के माध्यम से ईश्वर के प्रिय बंदों के व्यक्तित्व को बिगाड़ने का प्रयास करते हैं किंतु उनके प्रयासों के मुक़ाबले में पीछे नहीं हटना चाहिए बल्कि इस बात पर विश्वास रखना चाहिए कि हर बात ईश्वर के नियंत्रण में है।

    आइए अब सूरए इसरा की आयत नंबर 48 की तिलावत सुनें।

    انْظُرْ كَيْفَ ضَرَبُوا لَكَ الْأَمْثَالَ فَضَلُّوا فَلَا يَسْتَطِيعُونَ سَبِيلًا (48)

    (हे पैग़म्बर!) देखिए कि विरोधियों ने आपके लिए किस प्रकार की उपमाएं दी हैं, तो ये (इस प्रकार) पथभ्रष्ट हो गए हैं कि (सत्य का) मार्ग खोज ही नहीं पाएंगे।(17:48)

    पिछली आयत का क्रम जारी रखते हुए यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सान्तवना देती है और कहती है कि यद्यपि वे आपको जादूगर अथवा पागल कहते हैं और इसी प्रकार की उपमाएं देते हैं किंतु इससे वे आपको कोई क्षति नहीं पहुंचा सकते बल्कि वे स्वयं पथभ्रष्टता में ग्रस्त हो कर वास्तविकताओं को समझने की क्षमता खो बैठेंगे।

    विरोधियों को जान लेना चाहिए कि किसी पर आरोप लगा कर या उसके संबंध में अफ़वाहें फैला कर उन्हें कोई लाभ नहीं होगा और सत्य तथा वास्तविकता ऐसी वस्तु नहीं है जिसे निराधार बातों से छिपाया या समाप्त किया जा सके।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद की आयतों और ईश्वर के प्रिय बंदों से मुक़ाबले हेतु शत्रुओं की एक शैली, अनुचित अनुकंपाओं का प्रयोग है।

    जिनके पास कोई तर्क नहीं होता वे अनुचित अनुकंपाओं या लतीफ़ों के माध्यम से ईश्वर के प्रिय बंदों के व्यक्तित्व को बिगाड़ने का प्रयास करते हैं।

    ईश्वरीय नेताओं का अपमान, मनुष्य के पथभ्रष्ट होने और सत्य के मार्ग से उसके विचलित हो जाने का कारण बनता है। अलबत्ता यह पथभ्रष्टता अचानक ही अस्तित्व में नहीं आती बल्कि मनुष्य धीरे-2 सत्य के मार्ग से दूर होता जाता है, यहां तक कि फिर उसकी वापसी की संभावना नहीं रह जाती।