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    सूरए इसरा, आयतें 49-52, (कार्यक्रम 488)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 49 की तिलावत सुनें।

    وَقَالُوا أَئِذَا كُنَّا عِظَامًا وَرُفَاتًا أَئِنَّا لَمَبْعُوثُونَ خَلْقًا جَدِيدًا (49)

    और उन्होंने कहा कि जब हम (मर कर) हड्डी और मिट्टी हो जाएंगे तो क्या हम फिर एक नई सृष्टि के साथ उठाए जाएंगे?(17:49)

    इससे पहले की आयतों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनकी पैग़म्बरी के बारे में विरोधियों की अनुचित एवं तर्कहीन बातों का वर्णन किया गया था। इन आरोपों और अपमानों के उत्तर में ईश्वर ने अपने पैग़म्बर का समर्थन करते हुए कहा था कि ये लोग हठधर्म और द्वेष में ग्रस्त हो गए हैं जिसके चलते ये न तो सत्य को देख पा रहे हैं और न ही वास्तविकता को सुन रहे हैं।

    यह आयत कहती है कि ये लोग न केवल पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी बल्कि प्रलय के बारे में विभिन्न प्रकार के प्रश्न और भ्रम उत्पन्न करके लोगों को शंका में डालने का प्रयास करते हैं जबकि उनके पास प्रलय के इन्कार का कोई तर्क नहीं है।

    क़ुरआने मजीद की केवल इसी आयत में ही नहीं बल्कि दूसरी आयतों में भी प्रलय का इन्कार करने वालों की ओर से किसी तर्क का वर्णन नहीं किया गया बल्कि इस संबंध में उनकी ओर से केवल प्रश्न व आश्चर्य व्यक्त किया गया या फिर प्रलय को असंभव बताया गया है।

    इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों की तर्कसंगत एवं ईश्वरीय बातों के मुक़ाबले में विरोधी सदैव ही प्रश्न और शंका उत्पन्न करके लोगों के ईमान और आस्था को कमज़ोर करने का प्रयास करते हैं।

    आसमानी धर्मों के विरोधी, मानव जीवन को इसी भौतिक व नश्वर संसार तक सीमित समझते हैं और वे मनुष्य के अमर जीवन को समझने में अक्षम हैं।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 50 और 51 की तिलावत सुनें।

    قُلْ كُونُوا حِجَارَةً أَوْ حَدِيدًا (50) أَوْ خَلْقًا مِمَّا يَكْبُرُ فِي صُدُورِكُمْ فَسَيَقُولُونَ مَنْ يُعِيدُنَا قُلِ الَّذِي فَطَرَكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ فَسَيُنْغِضُونَ إِلَيْكَ رُءُوسَهُمْ وَيَقُولُونَ مَتَى هُوَ قُلْ عَسَى أَنْ يَكُونَ قَرِيبًا (51)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि तुम पत्थर या लोहा बन जाओ (17:50) या फिर तुम्हारे विचार और मन में जो उससे बड़ी रचना हो वह बन जाओ, (ईश्वर तुम्हें फिर भी जीवित कर सकता है) तो ये शीघ्र ही कहेंगे कि कौन हमें पुनः वापस ला सकता है? कह दीजिए कि वही जिसने पहली बार तुम्हारी रचना की है। तो ये लोग (परिहास की दशा में) अपने सिर हिलाएंगे और कहेंगे कि ये कब होगा? कह दीजिए कि शायद वह निकट ही हो।(17:51)

    इन आयतों में कहा गया है कि जो लोग यह कहते हैं कि मर कर हड्डी व मिट्टी में परिवर्तित हो चुका मनुष्य किस प्रकार से पुनः जीवित हो सकता है? क्या वे यह बात भूल गए हैं कि वे पहले भी मिट्टी थे और ईश्वर ने उन्हें पैदा किया है? क्या उन्हें ईश्वर की शक्ति में शंका है कि इस प्रकार के प्रश्न करते हैं? हड्डी और मिट्टी तो सरल है यदि तुम पत्थर और लोहे में परिवर्तित हो जाओ तब भी ईश्वर तुम्हें जीवन प्रदान करने में सक्षम है।

    यहां यह बात उल्लेखनीय है कि पत्थर और लोहा बहुत कड़े होते हैं और जीवन से दूर हैं, इस आयत में उनके नाम का प्रयोग इस बात को दर्शाता है कि सृष्टि की सभी वस्तुएं, जीवन पाने की क्षमता रखती हैं। अलबत्ता मिट्टी जैसी कुछ वस्तुएं जीवन से अधिक निकट हैं जबकि पत्थर और लोहे जैसी कुछ अन्य वस्तुएं जीवन से अधिक दूर हैं।

    प्रलय के विरोधियों द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला एक अन्य प्रश्न यह है कि प्रलय का समय क्या है? क़ुरआने मजीद ने इस आयत में और कुछ अन्य आयतों में कहा है कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी को भी प्रलय आने के समय का ज्ञान नहीं है किंतु स्पष्ट है कि प्रलय के समय का ज्ञान न होने से उसके आने में शंका नहीं की जा सकती, जिस प्रकार से कि किसी को भी यह ज्ञात नहीं है कि वह कब मरेगा किंतु किसी को भी यह संदेह नहीं है कि एक दिन उसे मरना है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मिट्टी तो जीवन का आधार है, यदि मनुष्य मरने के पश्चात पत्थर और लोहे में भी परिवर्तित हो जाता, जिनमें जीवन की संभावना बहुत कम है, तब भी उसकी पुनः रचना ईश्वर के लिए कोई कठिन कार्य नहीं थी।

    ईमान वालों के तर्क के मुक़ाबले में विरोधियों की शैली परिहास करने और उस बात को असंभव बताने की है क्योंकि उनके पास अपने दावों को सिद्ध करने का कोई प्रमाण व तर्क नहीं होता।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 52 की तिलावत सुनें।

    يَوْمَ يَدْعُوكُمْ فَتَسْتَجِيبُونَ بِحَمْدِهِ وَتَظُنُّونَ إِنْ لَبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًا (52)

    जिस दिन ईश्वर तुम सब को बुलाएगा और तुम उसका गुणगान करते हुए उसका उत्तर दोगे और सोचोगे कि बहुत कम समय संसार में रहे हो।(17:52)

    यह आयत काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों का उत्तर जारी रखते हुए कहती है कि जिस दिन का तुम इन्कार कर रहे हो वह शीघ्र ही आएगा और तुम सब क़ब्रों से बाहर निकाले जाओगे और इस बात के लिए कि ईश्वर ने तुम्हें जीवित करके पुनः जीवन प्रदान किया है, तुम उसका गुणगान करोगे।

    आयत कहती है कि जिस बात को तुम बहुत दूर एवं असंभव समझ रहे थे, तुम देखोगे कि वह दूर नहीं थी और तुम्हारी मृत्यु एवं प्रलय के बीच बहुत कम अंतर रहा है। उस दिन मनुष्य समझ जाएगा कि यद्यपि सांसारिक जीवन और मृत्यु के पश्चात और क़ब्र से उठाए जाने से पहले का जीवन लम्बा था किंतु सदैव बाक़ी रहने वाले संसार के अनंत जीवन के मुक़ाबले में वह कुछ क्षणों से अधिक नहीं था।

    इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय, संसार के पहले मनुष्य अर्थात हज़रत आदम से लेकर अंतिम मनुष्य तक को एक स्थान पर एकत्रित करने का दिन है।

    परलोक के जीवन में प्रवेश के साथ ही मनुष्य को संसार तथा मृत्यु के पश्चात का जीवन बहुत छोटा व क्षणिक प्रतीत होगा।