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    सूरए इसरा, आयतें 53-55, (कार्यक्रम 489)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 53 की तिलावत सुनें।

    وَقُلْ لِعِبَادِي يَقُولُوا الَّتِي هِيَ أَحْسَنُ إِنَّ الشَّيْطَانَ يَنْزَغُ بَيْنَهُمْ إِنَّ الشَّيْطَانَ كَانَ لِلْإِنْسَانِ عَدُوًّا مُبِينًا (53)

    और (हे पैग़म्बर!) मेरे बंदों से कह दीजिए कि वह बात कहें जो उत्तम हो (क्योंकि) निश्चित रूप से शैतान उनके बीच बुराई डालता है। निसंदेह शैतान, मनुष्य के लिए खुला हुआ शत्रु रहा है।(17:53)

    इससे पूर्व भी कई बार कहा जा चुका है कि इस्लाम धर्म की शिक्षाओं का एक भाग, ईमान वालों के सामाजिक संबंधों को व्यवस्थित बनाने पर आधारित है ताकि समाज के विभिन्न गुटों के साथ उनके व्यवहार की शैली, शांति व सुरक्षा की स्थापना और झड़प और टकराव की समाप्ति का कारण बन सके।

    बात करने की शैली, सामाजिक संबंधों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी कारण ईश्वर इस आयत में अपने पैग़म्बर से कहता है कि आपका दायित्व केवल यह नहीं है कि लोगों को उपासना और धार्मिक दायित्वों के निर्वाह का निमंत्रण दें बल्कि आप मेरे ईमान वाले बंदों से कह दीजिए कि अच्छी बातें किया करें ताकि शैतान उनकी बातों से ग़लत लाभ न उठा सके और समाज के सदस्यों के बीच द्वेष और बुराई उत्पन्न न कर सके।

    क़ुरआने मजीद में बात करने के संबंध में अनेक आयतें मौजूद हैं जिनमें से कुछ में इस बात की ओर संकेत किया गया है कि किस प्रकार बात करनी चाहिए और कुछ में इस ओर संकेत किया गया है कि किस प्रकार की बात करनी चाहिए। चूंकि ईश्वर स्वयं सर्वोत्तम है अतः वह चाहता है कि हम भी सबसे अच्छा कर्म और सबसे अच्छी बात करें।

    इस आयत से हमने सीखा कि अच्छी बात प्रेम व मित्रता का मार्ग प्रशस्त करती है और बुरी बात शैतानी उकसावे का कारण बनती है।

    जो कोई अपनी अनुचित बातों से समाज में शत्रुता व टकराव उत्पन्न करता है वह शैतान का सहयोगी व सहभागी है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 54 की तिलावत सुनें।

    رَبُّكُمْ أَعْلَمُ بِكُمْ إِنْ يَشَأْ يَرْحَمْكُمْ أَوْ إِنْ يَشَأْ يُعَذِّبْكُمْ وَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ وَكِيلًا (54)

    तुम्हारा पालनहार तुम्हारे बारे में अधिक जानने वाला है। यदि वह चाहे तो तुम पर दया करे और यदि चाहे तो तुम्हें दंडित करे और हमने आपको लोगों का उत्तरदायी बना कर नहीं भेजा है।(17:54)

    दूसरों के साथ बुरी बात करने और कड़ाई के साथ बात करने का एक कारण स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को तुच्छ समझना है। इस अनुचित व्यवहार का कारण ज्ञान अथवा धर्म संबंधी अहं व घमंड हो सकता है। यह सोच, कि चूंकि मैं मोमिन हूं अतः मुझे अवश्य ही स्वर्ग में जाना है और दूसरा पक्ष चूंकि काफ़िर है अतः अवश्य ही नरक में जाएगा, मनुष्य के भीतर झूठा अहं एवं घमंड उत्पन्न कर देती है और इस ग़लत विचार के चलते मनुष्य स्वयं को यह अधिकार देता है कि वह दूसरों के साथ जिस प्रकार का भी चाहे, व्यवहार करे और यदि आवश्यकता हो तो उन्हें बुरा-भला कहे।

    यह आयत कहती है कि कौन ईश्वर की दया और कौन उसके दंड का पात्र बनेगा, यह बात ईश्वर से संबंधित है जो लोगों के मन और हृदय तक की बातों से अवगत है। किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरे व्यक्ति के बारे में यह सोचे कि चूंकि वह नरक में जाएगा अतः उसके साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार किया जा सकता है अर्थात उसका अपमान किया जा सकता है या उस पर कोई भी आरोप लगाया जा सकता है।

    न केवल यह कि साधारण लोग बल्कि पैग़म्बर भी लोगों के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं कि उन्हें ईमान लाने के लिए विवश करें या कुफ़्र के अपराध में काफ़िरों की हत्या कर दें। ईश्वर ने सभी मनुष्यों को यह अधिकार दिया है कि वे कुफ़्र एवं ईमान के बीच किसी एक का चयन करें। अलबत्ता ईश्वर ने कुफ़्र व ईमान दोनों का अंजाम भी निर्धारित करके लोगों को बता दिया है।

    इस आयत से हमने सीखा कि हमें अपने ईमान पर घमंड करके स्वयं को श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए क्योंकि किसी को भी न तो अपने और न ही दूसरों के भविष्य का ज्ञान है।

    धर्म के प्रचारक को, स्वयं को लोगों का उत्तरदायी और अभिभावक नहीं समझना चाहिए बल्कि उसे यह जान लेना चाहिए कि पैग़म्बरों तक को यह अधिकार नहीं था कि वे लोगों को ईमान लाने के लिए विवश करें।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 55 की तिलावत सुनें।

    وَرَبُّكَ أَعْلَمُ بِمَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلَقَدْ فَضَّلْنَا بَعْضَ النَّبِيِّينَ عَلَى بَعْضٍ وَآَتَيْنَا دَاوُودَ زَبُورًا (55)

    और जो कुछ आकाशों और धरती में है उससे तुम्हारा पालनहार अधिक अवगत है और निश्चित रूप से हमने कुछ पैग़म्बरों को कुछ अन्य पर प्राथमिकता दी और हमने दावूद को (आसमानी किताब) ज़बूर प्रदान की।(17:55)

    पिछली आयत में मनुष्य के मन में और उसके बाहर मौजूद बातों से ईश्वर के अवगत होने की ओर संकेत किया गया था। यह आयत धरती और आकाशों में मौजूद सृष्टि की सभी वस्तुओं के संबंध में ईश्वर के ज्ञान की ओर संकेत करती है और आगे चल कर ईश्वरीय अभियान के प्रचार व प्रसार के दायित्व में पैग़म्बरों के बीच पाए जाने वाले अंतर का उल्लेख करती है। कुछ पैग़म्बरों को ईश्वरीय किताब प्रदान की गई थी जबकि कुछ का दायित्व केवल ईश्वरीय किताबों तथा उनकी शिक्षाओं की व्याख्या और लोगों के बीच उनका प्रचार करना था।

    कुछ पैग़म्बर किसी विशेष जाति और क़बीले तक सीमित थे। कुछ अन्य का दायित्व था कि धरती के एक व्यापक क्षेत्र के लोगों का मार्गदर्शन करें। जैसा कि क़ुरआने मजीद की दूसरी आयतों में कुछ पैग़म्बरों को उलुल अज़्म अर्थात बड़े पैग़म्बर कहा गया है जिनमें हज़रत इब्राहीम और हज़रत नूह अलैहिस्सलाम सबसे महत्वपूर्ण हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर सृष्टि की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी हर वस्तु से पूर्ण रूप से अवगत है।

    अपने महत्व और दायित्व के अनुसार पैग़म्बरों के बीच भी विभिन्न श्रेणियां पाई जाती हैं और सैद्धांतिक रूप से जिस प्रकार से सृष्टि में पाए जाने वाले अंतर सार्थक एवं उद्देश्यपूर्ण हैं उसी प्रकार से धर्म के नियमों के संकलन में भी अंतर पाए जाते हैं जो सबके सब ईश्वर के ज्ञान व उसकी तत्वदर्शिता पर आधारित हैं।