islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए इसरा, आयतें 56-59, (कार्यक्रम 490)

    सूरए इसरा, आयतें 56-59, (कार्यक्रम 490)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 56 की तिलावत सुनें।

    قُلِ ادْعُوا الَّذِينَ زَعَمْتُمْ مِنْ دُونِهِ فَلَا يَمْلِكُونَ كَشْفَ الضُّرِّ عَنْكُمْ وَلَا تَحْوِيلًا (56)

    कह दीजिए कि तुम ईश्वर को छोड़ कर जिन लोगों को (पूज्य) समझते थे, उन्हें पुकारो, वे न तो तुम्हारी किसी समस्या को दूर कर सकते हैं और न ही उसमें कोई परिवर्तन ला सकते हैं।(17:56)

    वास्तविक ईमान वालों का एक चिन्ह, कठिनाइयों और संकटों के समय ईश्वर पर भरोसा करना है। इसके विपरीत काफ़िर और अनेकेश्वरवादी बल्कि कमज़ोर ईमान वाले भी कुछ अन्य मनुष्यों को अथवा पशुओं या जड़ वस्तुओं को पवित्र मानते और उन्हें विशेष स्थान का स्वामी समझते हैं तथा सोचते हैं कि वे उनकी समस्याओं का निदान कर सकते हैं। यही कारण है कि वे ईश्वर को छोड़ कर उनकी शरण में जाते हैं और आशा करते हैं कि वे उनके जीवन में परिवर्तन ले आएंगे।

    यह आयत, सभी मनुष्यों को सचेत करती है कि अनन्य व सक्षम ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी और कुछ भी, अपने आप में किसी भी कार्य की शक्ति व क्षमता नहीं रखता तथा ईश्वर की इच्छा के बिना कोई भी न तो किसी को क्षति पहुंचा सकता है न किसी की समस्या को समाप्त कर सकता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी आशा रखना, एक ऐसा भ्रम है जिसमें अनेकेश्वरवादी ग्रस्त होते हैं।

    केवल महिमामयी ईश्वर ही समस्याओं के निदान की क्षमता रखता है, अलबत्ता उसके प्रिय बंदे भी ईश्वर की अनुमति से इस प्रकार का काम कर सकते हैं।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 57 की तिलावत सुनें।

    أُولَئِكَ الَّذِينَ يَدْعُونَ يَبْتَغُونَ إِلَى رَبِّهِمُ الْوَسِيلَةَ أَيُّهُمْ أَقْرَبُ وَيَرْجُونَ رَحْمَتَهُ وَيَخَافُونَ عَذَابَهُ إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ كَانَ مَحْذُورًا (57)

    जिन्हें अनेकेश्वरवादी, ईश्वर के स्थान पर पुकारते हैं, वे स्वयं अपने पालनहार से सामिप्य के लिए वसीला या साधन खोजते हैं, ऐसा वसीला जो ईश्वर से अधिक निकट हो, वे स्वयं उसकी दया की आशा रखते हैं तथा उसके दंड से डरते हैं। निश्चित रूप से तुम्हारे पालनहार का दंड डरने और बचने योग्य है।(17:57)

    विदित रूप से यह आयत ईसाइयों की ओर संकेत करती है जो हज़रत ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र समझते हैं और उनकी पूजा करते हैं। ईश्वर इस आयत में कहता है कि जिस ईसा को तुम पूज्य समझते हो, वही ईसा मसीह ऐसे मार्ग और साधन की खोज में रहते थे कि जिसके माध्यम से वे ईश्वर से अधिक से अधिक निकट हो सकें। वे ईश्वर की दया व कृपा की ओर से आशावान भी थे और उसके दंड से भयभीत भी रहते थे, तो किस प्रकार तुम उन्हें ईश्वर समझते हो?

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के अनेक मार्ग और साधन हैं और हमें उनमें से उस मार्ग और साधन का चयन करना चाहिए जो ईश्वर से सबसे निकट हो।

    ईश्वर की दया उसके क्रोध पर प्राथमिकता रखती है अतः ईश्वर की दया से आशा, उसके दंड के भय से अधिक होनी चाहिए।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 58 की तिलावत सुनें।

    وَإِنْ مِنْ قَرْيَةٍ إِلَّا نَحْنُ مُهْلِكُوهَا قَبْلَ يَوْمِ الْقِيَامَةِ أَوْ مُعَذِّبُوهَا عَذَابًا شَدِيدًا كَانَ ذَلِكَ فِي الْكِتَابِ مَسْطُورًا (58)

    और कोई भी बस्ती ऐसी नहीं है जिसे हम प्रलय से पहले तबाह न कर दें या (उस में रहने वालों के पापों के कारण) उसे कड़ा दंड न दें कि निश्चित रूप से यह बात ईश्वरीय किताब में लिखी जा चुकी है।(17:58)

    क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार संसार का जीवन नश्वर तथा इस धरती की आयु सीमित और समाप्त होने वाली है। अतः इस आयत के आरंभ में कहा गया है कि प्रलय आने से पूर्व धरती की हर बस्ती तबाह हो जाएगी और सभी मनुष्य मर जाएंगे और कोई भी स्थान इससे अपवाद नहीं होगा।

    किंतु यह भी संभव है कि संसार के जिन स्थानों पर अधिक पाप, बुराई व अपराध फैला हुआ हो, वे संसार की समाप्ति अर्थात प्रलय से पूर्व ही ईश्वरीय दंड और कोप के पात्र बन जाएं तथा उनमें रहने वाले सभी लोगों का अंत हो जाए। यह सब बातें, ईश्वर के ज्ञान में हैं और पूर्व निर्धारित हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि संसार के किसी भी स्थान पर किसी के लिए भी जीवन अनंत व अमर नहीं है।

    सृष्टि का अंत, कोई संयोग नहीं है बल्कि यह ईश्वर की युक्ति व उसके इरादे के कारण होगा।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 59 की तिलावत सुनें।

    وَمَا مَنَعَنَا أَنْ نُرْسِلَ بِالْآَيَاتِ إِلَّا أَنْ كَذَّبَ بِهَا الْأَوَّلُونَ وَآَتَيْنَا ثَمُودَ النَّاقَةَ مُبْصِرَةً فَظَلَمُوا بِهَا وَمَا نُرْسِلُ بِالْآَيَاتِ إِلَّا تَخْوِيفًا (59)

    और हमें (लोगों के मनचाहे) चमत्कार भेजने से केवल इस बात ने रोका है कि पिछली जातियों ने उन्हें झुठलाया था (जिसके परिणाम स्वरूप वे तबाह हो गई थीं) और हमने समूद जाति को (चमत्कार स्वरूप) ऊंटनी प्रदान की थी जो उनके लिए (वास्तविकताओं को) स्पष्ट करने वाली थी किंतु उन्होंने उस पर अत्याचार किया। और हम निशानियों (और चमत्कारों) को केवल डराने के लिए भेजते हैं।(17:59)

    जैसा कि क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में भी वर्णित है, मक्के के काफ़िर और अनेकेश्वरवादी, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से विभिन्न प्रकार के चमत्कारों की मांग करते थे, उदाहरण स्वरूप वे कहते थे कि मक्के के अमुक पर्वत को सोने का बना दिया जाए।

    ईश्वर इस आयत में कहता है कि हठधर्मी लोग इस प्रकार के चमत्कार देखने के बाद भी ईमान नहीं लाएंगे और मूल रूप से चमत्कार यदि लोगों की मांग पर हो और चमत्कार देखने के बाद वे उसे झुठलाएं तो वे इसी संसार में ईश्वरीय दंड और कोप के पात्र बनेंगे। जैसा कि ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के काल में ईश्वर ने लोगों की मांग पर पर्वत से बिना माता-पिता के एक ऊंटनी निकाली किंतु उस जाति ने ऊंटनी की हत्या कर दी जिसके परिणाम स्वरूप ईश्वर ने उस पूरी जाति को विनष्ट कर दिया।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर हर काम की क्षमता रखता है किंतु उसके कार्य लोगों की इच्छा और मांग के आधार पर नहीं बल्कि तत्वदर्शिता के आधार पर होते हैं।

    पवित्र ईश्वरीय मान्यताओं व चमत्कारों का अनादर, इसी संसार में दंड मिलने का कारण बनता है।