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    सूरए इसरा, आयतें 60-63, (कार्यक्रम 491)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 60 की तिलावत सुनें।

    وَإِذْ قُلْنَا لَكَ إِنَّ رَبَّكَ أَحَاطَ بِالنَّاسِ وَمَا جَعَلْنَا الرُّؤْيَا الَّتِي أَرَيْنَاكَ إِلَّا فِتْنَةً لِلنَّاسِ وَالشَّجَرَةَ الْمَلْعُونَةَ فِي الْقُرْآَنِ وَنُخَوِّفُهُمْ فَمَا يَزِيدُهُمْ إِلَّا طُغْيَانًا كَبِيرًا (60)

    और जब हमने आपसे कहा कि निश्चित रूप से आपका पालनहार लोगों के बारे में संपूर्ण ज्ञान रखता है और जो स्वप्न हमने आपको दिखाया है वह केवल लोगों की परीक्षा के लिए है, और इसी प्रकार क़ुरआने (मजीद) में वर्णित धिक्कारा हुआ वंश वृक्ष भी इसी लिए है। और हम उन्हें डराते हैं किंतु उनकी भारी उद्दंडता में वृद्धि ही होती है।(17:60)

    इस आयत के आरंभ में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके अनुयाइयों को सान्तवना देते हुए कहा गया है कि तुम्हारी सत्य बातों के मुक़ाबले में शत्रुओं का हठधर्म और दुराग्रह कोई नई बात नहीं है और ईश्वर उससे पूर्ण रूप से अवगत है तथा समय आने पर उन लोगों का अवश्य ही उत्तर देगा।

    आगे चलकर आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के एक स्वप्न की ओर संकेत करती है जो लोगों की परीक्षा का माध्यम था। क़ुरआने मजीद में पैग़म्बरे इस्लाम के दो सपनों का उल्लेख किया गया है जिनमें से एक बद्र नामक युद्ध आरंभ होने के अवसर पर उन्होंने देखा था और दूसरा मक्का नगर पर विजय प्राप्त करने और मस्जिदुल हराम में प्रवेश करने से संबंधित था। पहला सपना मदीने में देखा था और दूसरा मक्के में, क्योंकि यह सूरा अर्थात सूरए इसरा मक्के में उतरा है।

    दूसरी ओर आयत में शजरए मलऊना अर्थात धिक्कारे गए वंश-वृक्ष की ओर भी संकेत किया गया है जिसे क़ुरआने मजीद की दूसरी आयतों में शजरए ख़बीसा या अत्यंत बुरे वंश वृक्ष के नाम से भी याद किया गया है। इससे तात्पर्य ऐसी जाति और वंश है जिसकी वृक्ष की भांति जड़ और शाखाएं हैं किंतु वह बुराई के अतिरिक्त कुछ और नहीं करता और सदैव उस पर धिक्कार होती रहती है।

    प्रख्यात शीया और सुन्नी धर्म गुरूओं ने अपनी किताबों में लिखा है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने स्वप्न देखा कि उनके मिम्बर अर्थात भाषण देते समय उनके बैठने के विशेष स्थान पर बंदर कूद रहे हैं। वे इस स्वप्न से बहुत दुखी और चिंतित हुए और ईश्वरीय संदेश लाने वाले विशेष फ़रिश्ते जिब्रईल से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि पैग़म्बर के बाद, बनी उमैया वंश के लोग, उनके उत्तराधिकारी के स्थान पर बैठेंगे।

    इतिहास के अध्ययन से भी यह बात भली भांति सिद्ध हो जाती है कि इस वंश ने अपनी एक हज़ार महीनों की सत्ता के दौरान, बुराई के अतिरिक्त कुछ नहीं किया और लाखों निर्दोष लोगों का रक्तपात किया तथा इस्लाम धर्म की वास्तविक शिक्षाओं में फेर-बदल के निरंतर विफल प्रयास किए। बनी उमैया में सबसे अधिक भ्रष्ट शासक मुआविया का पुत्र यज़ीद था उसने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के नाती हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तथा उनके 72 साथियों को कर्बला में शहीद करके इतिहास का सबसे बड़ा पाप किया।

    इस आयत से हमने सीखा कि कभी कभी ईश्वर स्वप्न के माध्यम से अपने पैग़म्बरों और प्रिय बंदों को वास्तविकताओं से अवगत कराता है।

    डरावा और चेतावनी यदि ईश्वर की ओर से और उसके पवित्र पैग़म्बर की ज़बान से भी हो तब भी अपवित्र लोगों पर उसका प्रभाव नहीं होता बल्कि उनकी उद्दंडता में वृद्धि ही होती जाती है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 61 की तिलावत सुनें।

    وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَائِكَةِ اسْجُدُوا لِآَدَمَ فَسَجَدُوا إِلَّا إِبْلِيسَ قَالَ أَأَسْجُدُ لِمَنْ خَلَقْتَ طِينًا (61)

    और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम के समक्ष नतमस्तक हो जाओ तो सब नतमस्तक हो गए सिवाए इब्लीस के, जिसने कहा कि क्या मैं उसके समक्ष नतमस्तक हो जाऊं जिसे तूने मिट्टी से बनाया है?(17:61)

    पिछली आयत में धिक्कारे हुए वंश वृक्ष की ओर संकेत करने के पश्चात इस आयत में कहा गया है कि ईश्वरीय आदेश के मुक़ाबले में घमंड और उद्दंडता का संपूर्ण उदाहरण शैतान है जिसने आरंभ से ही ईश्वरीय आदेश को स्वीकार नहीं किया और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को सज्दा करने के संबंध में उसके आदेश की अवहेलना की।

    रोचक बात यह है कि इतिहास के सभी घमंडियों और अहंकारियों के बीच एक बिंदु संयुक्त रहा है और वह है दूसरों का अपमान एवं अनादर। शैतान भी स्वयं को हज़रत आदम से श्रेष्ठ समझता था और उसने बड़े अंहकार भरे स्वर में कहा था कि क्या वह उस जीव के समक्ष नतमस्तक हो जिसे मिट्टी से बनाया गया है? आज भी वर्चस्ववादी स्वयं को साधारण लोगों से श्रेष्ठ समझते हैं और जनता के समक्ष विनम्रता के स्थान पर कि जो धार्मिक नेताओं और ईश्वर के प्रिय बंदों के चरित्र का भाग रहा है, सदैव ही स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय आदेश के समक्ष नतमस्तक रहना, फ़रिश्तों के समान प्रवृत्ति का सूचक है जबकि ईश्वर के आदेश के मुक़ाबले में उद्दंडता और बहानेबाज़ी, शैतानी प्रवृत्ति को दर्शाती है।

    इब्लीस द्वारा स्वयं को श्रेष्ठ समझना एवं ईर्ष्या करना इस बात का कारण बना कि वह मिट्टी से मनुष्य की रचना पर तो ध्यान दे किंतु उसकी ईश्वरीय आत्मा को न देखे।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 62 और 63 की तिलावत सुनें।

    قَالَ أَرَأَيْتَكَ هَذَا الَّذِي كَرَّمْتَ عَلَيَّ لَئِنْ أَخَّرْتَنِ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ لَأَحْتَنِكَنَّ ذُرِّيَّتَهُ إِلَّا قَلِيلًا (62) قَالَ اذْهَبْ فَمَنْ تَبِعَكَ مِنْهُمْ فَإِنَّ جَهَنَّمَ جَزَاؤُكُمْ جَزَاءً مَوْفُورًا (63)

    इब्लीस ने कहा क्या तूने उसे देखा है जिसे तूने मुझ पर श्रेष्ठता प्रदान की है? यदि तू मुझे प्रलय के दिन तक के लिए अवसर प्रदान कर दे तो निश्चित रूप से मैं इसके वंश में से कुछ को छोड़ कर सभी को अपने वश में कर लूंगा।(17:62) ईश्वर ने कहा, जा उनमें से जो कोई तेरे पद चिन्हों पर चलेगा तो निश्चित रूप से तुम सब का बदला नरक होगा कि जो संपूर्ण बदला होगा।(17:63)

    जब इब्लीस ने देखा कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को सज्दा न करने के कारण उसे ईश्वर के दरबार से निकाल दिया गया है तो उसने कहा कि यदि मुझे अवसर दिया जाए तो मैं आदम की संतान और उसके वंश को प्रलय तक पथभ्रष्ट करता रहूंगा, उनमें से केवल कुछ ही ऐसे होंगे जिन्हें मैं अपने वश में नहीं कर सकूंगा।

    अल्बत्ता ईश्वर ने भी अपनी तत्वदर्शिता के आधार पर कि उसने मनुष्य की परिपूर्णता को उसकी इच्छा व संकल्प के अधीन रखा है तथा परीक्षा को इस परिपूर्णता के अधिक खुल कर सामने आने का मार्ग बनाया है, इब्लीस की बात को स्वीकार कर लिया और कहा कि जो कोई भी तेरे मार्ग पर चलेगा और तेरा अनुसरण करेगा, वह तेरी ही भांति नरक में जाएगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि शैतान मनुष्य और उसके वंश का पक्का शत्रु रहा है अतः हमें उसकी ओर से अत्यधिक सचेत रहना चाहिए।

    अधिकांश लोग, शैतान के उकसावों से प्रभावित हो जाते हैं और केवल कुछ ही लोग होते हैं जो शैतान के जाल में नहीं फंसते।

    मनुष्य, ईश्वर का आदेश या शैतान का उकसावा स्वीकार करने में स्वतंत्र है और शैतान के उकसावे मनुष्य से उसके चयन के अधिकार को नहीं छीनते।