islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए इसरा, आयतें 64-67, (कार्यक्रम 492)

    सूरए इसरा, आयतें 64-67, (कार्यक्रम 492)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 64 की तिलावत सुनें।

    وَاسْتَفْزِزْ مَنِ اسْتَطَعْتَ مِنْهُمْ بِصَوْتِكَ وَأَجْلِبْ عَلَيْهِمْ بِخَيْلِكَ وَرَجِلِكَ وَشَارِكْهُمْ فِي الْأَمْوَالِ وَالْأَولَادِ وَعِدْهُمْ وَمَا يَعِدُهُمُ الشَّيْطَانُ إِلَّا غُرُورًا (64)

    और (हे शैतान!) उन में से जिसको भी बन पड़े अपनी आवाज़ से उकसा (कर पथभ्रष्ट कर) दे, अपने सवारों और प्यादों से उन पर आक्रमण कर दे, उनकी संपत्ति तथा संतान में भागीदार बन जा और उनसे (झूठे) वादे कर, और (हे लोगो! जान लो कि) शैतान उनसे जो वादा करता है वह एक धोखे के अतिरिक्त कुछ नहीं है।(17:64)

    पिछली आयतों में बताया गया था कि इब्लीस द्वारा हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के समक्ष नतमस्तक होने से इन्कार के बाद ईश्वर ने उसे अपने दरबार से निकाल दिया जिसके पश्चात शैतान ने ईश्वर से आग्रह किया कि वह उसे प्रलय तक के लिए मोहलत दे। ईश्वर ने भी उसकी यह बात स्वीकार कर ली किंतु हज़रत आदम तथा उनके वंश को सचेत किया कि वे शैतान के धोखे में न आएं।

    यह आयत कहती है कि इब्लीस लोगों को धोखा देने के लिए केवल एक ही मार्ग का प्रयोग नहीं करता है बल्कि वह विभिन्न हथकंडों से लाभ उठाता है। शैतान अपनी बातों को मनवाने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रचार करता है। जिस प्रकार से सेना में सवार और प्यादे सैनिक होते हैं, उसी प्रकार से शैतानों की टोली भी विभिन्न साधनों और शस्त्रों से मनुष्य पर आक्रमण करती है।

    शैतान विभिन्न प्रकार के उकसावों और झूठे वादों के साथ मनुष्य को पथभ्रष्ट करने का प्रयास करता है। अवैध मार्गों से धन प्राप्त करना, महिला व पुरुष के बीच अवैध संबंध, उच्छृंखलता का प्रचार कि जो समाज में अवैध संतानों की संख्या में वृद्धि का कारण बनती है, ये सबके सब शैतान के षड्यंत्र हैं। अल्बत्ता ईश्वर ने बारंबार मनुष्य को शैतान के ख़तरे से सचेत किया है और उसे मानव जाति का मुख्य शत्रु बताया है।

    इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु का प्रचारिक व सांस्कृतिक आक्रमण, उसके सैनिक आक्रमण से पहले होता है जैसा कि इस आयत में शैतान के सवारों से पहले उसकी आवाज़ का उल्लेख किया गया है।

    धोखा देना शैतान की शैली है। एक ओर तो शैतान मनुष्य को पाप करने पर उकसाता है और दूसरी ओर झूठे वादे करके उसे तौबा से रोकता रहता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 65 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ وَكَفَى بِرَبِّكَ وَكِيلًا (65)

    निश्चित रूप से मेरे (निष्ठावान) बंदों पर तुझे वर्चस्व प्राप्त नहीं होगा और उनकी रक्षा व समर्थन के लिए तेरा पालनहार पर्याप्त है।(17:65)

    चूंकि शैतान का ख़तरा बहुत गंभीर है इस लिए ईश्वर ने इस आयत में अपने पवित्र व निष्ठावान दासों को शुभ सूचना दी है कि शैतान उन पर वर्चस्व नहीं जमा सकेगा और उनके पथभ्रष्ट होने की संभावना नहीं है क्योंकि उन्हें ईश्वर का पूरा समर्थन प्राप्त है।

    स्पष्ट है कि ईश्वर के इन विशेष बंदों में पहले चरण में तो पैग़म्बर व अन्य पवित्र बंदे शामिल हैं और फिर हर वह ईमान वाला व्यक्ति इस श्रेणी में आता है जो अपने ईमान और कर्म पर सुदृढ़ रहे। जैसा कि सूरए नह्ल की आयत नंबर 99 में कहा गया है कि निश्चित रूप से उन वास्तविक ईमान वालों पर शैतान का कोई वर्चस्व नहीं है जो ईश्वर पर ही भरोसा करते हैं। इसी प्रकार सूरए आराफ़ की आयत नंबर 201 में कहा गया है कि यदि उन्हें शैतान की ओर से कोई उकसावा छू भी जाता है तो वे सचेत हो जाते हैं और उन्हें सूझ आ जाती है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की उपासना मनुष्य को शैतान के उकसावों से सुरक्षित रखती है और उसके प्रभाव को निष्क्रिय बना देती है।

    ईश्वर ने वचन दिया है कि वह अपने पवित्र बंदों की रक्षा और उनका समर्थन करेगा।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 66 और 67 की तिलावत सुनें।

    رَبُّكُمُ الَّذِي يُزْجِي لَكُمُ الْفُلْكَ فِي الْبَحْرِ لِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِهِ إِنَّهُ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا (66) وَإِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فِي الْبَحْرِ ضَلَّ مَنْ تَدْعُونَ إِلَّا إِيَّاهُ فَلَمَّا نَجَّاكُمْ إِلَى الْبَرِّ أَعْرَضْتُمْ وَكَانَ الْإِنْسَانُ كَفُورًا (67)

    तुम्हारा पालनहार वह है जो तुम्हारे लिए समुद्र में नौकाएं चलाता है ताकि तुम (अपने प्रयासों द्वारा) उसकी कृपा से लाभान्वित हो सको। निश्चित रूप से वह तुम्हारे प्रति अत्यंत दयावान है।(17:66) और जब भी समुद्र में तुम्हें कोई क्षति पहुंचती है तो ईश्वर के अतिरिक्त वे सब ग़ायब हो जाते हैं जिन्हें तुम पुकारा करते हो तो जब ईश्वर तुम्हें मुक्ति प्रदान करके थल में पहुंचा देता है तो तुम उसकी ओर से मुंह फेर लेते हो और मनुष्य तो बहुत अधिक कृतघ्न है।(17:67)

    इन आयतों में क़ुरआने मजीद, ईश्वर की एक बड़ी अनुकंपा अर्थात समुद्रों की ओर संकेत करते हुए कि जो यातायात का सबसे व्यापक व बड़ा साधन हैं और साथ ही मानव आहार का एक बड़ा स्रोत अपने भीतर रखे हुए हैं, कहता है कि ईश्वर की इतनी अधिक कृपा के बाद भी मनुष्य कृतघ्न है। जब कभी वह समुद्र में फंस जाता है तो ईश्वर को पुकारता है किंतु जब ईश्वर उसे मुक्ति दिला कर समुद्र से बाहर ले आता है तो वह उसे भूल कर पुनः अपनी आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति करने लगता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की कृपा सर्वकालिक है तथा जल व थल दोनों ही ईश्वरीय अनुकंपाएं हैं जो मनुष्य के लिए आजीविका प्राप्त करने का उचित साधन हैं।

    ख़तरे और दुर्घटनाएं, निश्चेतना के पर्दों को हटा देती हैं और मनुष्य अपने वास्तविक स्वामी एवं पालनहार को पहचान जाता है। इसी को ईश्वर की प्राकृतिक पहचान कहा गया है।