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    सूरए इसरा, आयतें 68-70, (कार्यक्रम 493)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 68 की तिलावत सुनें।

    أَفَأَمِنْتُمْ أَنْ يَخْسِفَ بِكُمْ جَانِبَ الْبَرِّ أَوْ يُرْسِلَ عَلَيْكُمْ حَاصِبًا ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ وَكِيلًا (68)

    क्या तुम इस बात से सुरक्षित हो गए हो कि ईश्वर तुम्हें थल में ही धंसा दे या तुम पर पत्थरों की बौछार कर दे और फिर तुम्हें कोई बचाने वाला न मिले?(17:68)

    इससे पहले की आयतों में क़ुरआने मजीद की आयतों में इस बात का वर्णन किया गया था कि ईश्वर ने समुद्रों को लोगों के लिए बनाया है ताकि वे उनसे लाभान्वित हो सकें और यदि वे समुद्र में किसी ख़तरे में ग्रस्त हुए तो केवल ईश्वर ही उन्हें मुक्ति दिला सकता है। यह आयत कहती है कि यह मत सोचो कि ख़तरे केवल समुद्रों में ही होते हैं, संभव है कि थल में ही तुम्हारे लिए ईश्वरीय कोप सामने आ जाए और क़ारून की भांति तुम्हें निगल ले, या फिर आंधी आए और आकाश से तुम पर रेत व कंकरों की वर्षा हो जाए। इन अवसरों पर, ईश्वर के अतिरिक्त कौन तुम्हारी सहायता कर सकता है और तुम्हें इन ख़तरों से बचा सकता है?

    इस आयत से हमने सीखा कि हम जहां कहीं भी रहें, ईश्वर के नियंत्रण और वर्चस्व से बाहर नहीं हैं और हममें ईश्वरीय इच्छा का मुक़ाबला करने की क्षमता नहीं है, अतः हमें उसके प्रति उद्दंडता नहीं करना चाहिए।

    दंड से सुरक्षित रहने का आभास, निश्चेतना और ईश्वरीय सीमाओं से आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 69 की तिलावत सुनें।

    أَمْ أَمِنْتُمْ أَنْ يُعِيدَكُمْ فِيهِ تَارَةً أُخْرَى فَيُرْسِلَ عَلَيْكُمْ قَاصِفًا مِنَ الرِّيحِ فَيُغْرِقَكُمْ بِمَا كَفَرْتُمْ ثُمَّ لَا تَجِدُوا لَكُمْ عَلَيْنَا بِهِ تَبِيعًا (69)

    या फिर तुम इस ओर से सुरक्षित हो गए हो कि ईश्वर तुम्हें पुनः समुद्र में लौटा दे, फिर तीव्र चक्रवात भेज कर तुम्हें तुम्हारे कुफ़्र के कारण डुबा दे और फिर तुम्हें हमारे उस (दंड से) बचाने वाला कोई भी न मिले।(17:69)

    पिछली आयतों के क्रम को जारी रखते हुए यह आयत कहती है कि यदि ईश्वर द्वारा तुम्हें मुक्ति दिलाने और थल में पहुंचाने के बाद तुमने उसके प्रति कृतघ्नता से काम लिया तो वह तुम्हें पुनः समुद्र में लौटाने में सक्षम है। इसी प्रकार वह तुम्हारे ऊपर इस प्रकार का चक्रवात भेज सकता है कि जिससे बचने का तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं होगा और तुम समुद्र में डूब जाओगे।

    जी हां, ईश्वरीय दंड के लिए कोई विशेष समय या स्थान नहीं होता और ईश्वर का इन्कार करने वालों को इसी संसार में बहुत कड़े दंड का सामना करना पड़ता है। यदि मनुष्य ऐसे दंड में ग्रस्त हो गया तो फिर उसके बचने का कोई मार्ग नहीं होता।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य की तबाही और बर्बादी का मुख्य कारण, स्वयं उसी का अनुचित व्यवहार है। ईश्वर, मनुष्य को अपनी दया व कृपा का पात्र बनाता है किंतु उसकी कृतघ्नता, अनुकंपाओं को मुसीबतों में परिवर्तित कर देती हैं।

    ख़तरा सदैव घात में रहता है। तूफ़ान के बाद की शांति पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि किसी ख़तरे से बच जाने का अर्थ उस ख़तरे का पूर्ण रूप से समाप्त होना नहीं होता।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 70 की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ كَرَّمْنَا بَنِي آَدَمَ وَحَمَلْنَاهُمْ فِي الْبَرِّ وَالْبَحْرِ وَرَزَقْنَاهُمْ مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَى كَثِيرٍ مِمَّنْ خَلَقْنَا تَفْضِيلًا (70)

    और निश्चित रूप से आदम की संतान को प्रतिष्ठा प्रदान की है और उन्हें थल और जल में (सवारियों पर) उठाया है, उन्हें पवित्र वस्तुओं में से आजीविका प्रदान की है और अपनी असंख्य रचनाओं पर उन्हें श्रेष्ठता दी है।(17:70)

    यह आयत, जो ईश्वर की अन्य रचनाओं से मनुष्य के श्रेष्ठ होने की ओर संकेत करती है, कहती है कि ईश्वर ने मनुष्य को इतनी प्रतिष्ठा दी है कि उसे प्रकृति पर वर्चस्व प्रदान कर दिया है, इस प्रकार से कि वह प्रकृति की सभी वस्तुओं को अपनी सेवा में रख कर उनसे लाभ उठा सकता है। जल और थल दोनों मनुष्य के पैरों के नीचे हैं और वह पशुओं, नौकाओं तथा यातायात के अन्य साधनों जैसी विभिन्न सवारियों के माध्यम से धरती और समुद्रों में यात्रा कर सकता है।

    अलबत्ता इस आयत में जिस प्रतिष्ठा की बात की गई है वह सार्वजनिक और ईश्वर द्वारा प्रदान की गई प्रतिष्ठा है और उसमें सभी मनुष्य शामिल हैं किंतु एक प्रकार की प्रतिष्ठा ऐसी है जिसे पवित्र लोग अपने प्रयासों से प्राप्त करते हैं। इस प्रतिष्ठा के बारे में क़ुरआने मजीद कहता है कि ईश्वर के निकट तुममें सबसे प्रतिष्ठित वह है जो सबसे अधिक पवित्र और ईश्वर से सबसे अधिक डरता है।

    निश्चित रूप से मनुष्य न केवल धरती पर ईश्वर की अन्य रचनाओं बल्कि फ़रिश्तों से भी श्रेष्ठ है, यही कारण है कि फ़रिश्तों को उसके समक्ष नतमस्तक होने का आदेश दिया गया था और ईश्वर ने कुछ फ़रिश्तों को मनुष्य की सेवा के लिए निर्धारित किया था।

    यह बात भी ध्यान योग्य है कि जो लोग इस प्रतिष्ठा का सम्मान नहीं करते और मानवता के मार्ग से विचलित हो जाते हैं वे क़ुरआने मजीद के शब्दों में चौपायों से भी तुच्छ हैं क्योंकि वे कथनी, करनी और अन्य मामलों में अपने अनुचित चयन द्वारा अपनी मानवीय प्रतिष्ठा को खो देते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य द्वारा अपने उच्च स्थान और प्रतिष्ठा पर ध्यान देने से ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने और कृतघ्नता से दूर रहने का मार्ग प्रशस्त होता है।

    ईश्वर ने प्रगति व परिपूर्णता के सभी गुण मनुष्य के अस्तित्व में रखे हैं और उसे प्रकृति एवं अपने से बाहर के वातावरण से लाभान्वित होने की संभावनाएं प्रदान की हैं।

    यात्रा के साधन, चाहे वे धरती में हों अथवा समुद्र में, ईश्वर की उन अनुकंपाओं में से हैं जिन्हें उसने मनुष्य के नियंत्रण में दिया है ताकि वह अपनी आवश्यकताएं पूरी करने और अनुभव प्राप्त करने के लिए उनसे लाभ उठाए।