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    सूरए इसरा, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 476)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 7 की तिलावत सुनें।

    إِنْ أَحْسَنْتُمْ أَحْسَنْتُمْ لِأَنْفُسِكُمْ وَإِنْ أَسَأْتُمْ فَلَهَا فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ الْآَخِرَةِ لِيَسُوءُوا وُجُوهَكُمْ وَلِيَدْخُلُوا الْمَسْجِدَ كَمَا دَخَلُوهُ أَوَّلَ مَرَّةٍ وَلِيُتَبِّرُوا مَا عَلَوْا تَتْبِيرًا (7)

    यदि तुम कोई भलाई करोगे तो वह अपने लिए ही करोगे और यदि कोई बुराई करोगे तो वह भी अपने लिए ही करोगे, तो जब दूसरा वचन पूरा होने को आएगा तो (एक शक्तिशाली गुट आएगा जिसके लोग) तुम्हारे चेहरों को बुरा बना देंगे और मस्जिदुल अक़सा में प्रविष्ट हो जाएंगे, जिस प्रकार से कि वे पहली बार प्रविष्ट हुए थे और वे जिस वस्तु को भी अपने नियंत्रण में लेंगे उसे बड़ी कठोरता से तबाह कर देंगे।(17:7)

    पिछली आयतों में बताया गया था कि ईश्वर ने बनी इस्राईल को सूचना दी थी कि वे दो बार धरती में बुराई फैलाएंगे और दोनों ही बार उनसे अधिक शक्तिशाली लोग आ कर उन्हें अपने नियंत्रण में ले लेंगे तथा उनके घर-बार को ध्वस्त कर देंगे। यह आयत बनी इस्राईल द्वारा दूसरी बार बुराई फैलाने के बाद के समय की ओर संकेत करते हुए कहती है कि संसार में हर कार्य की प्रतिक्रिया और हर कर्म का प्रतिफल मिलता है। यदि तुम भलाई करोगे तो तुम्हारे साथ भी भलाई की जाएगी और यदि तुम बुराई करोगे तो इस बात की आशा मत रखो कि लोग तुम्हारे साथ भलाई करेंगे, नहीं बल्कि तुम्हारे साथ भी बुराई का व्यवहार ही किया जाएगा।

    आगे चलकर आयत कहती है कि एक बार तुमने धरती में बुराई फैलाई थी और उसका परिणाम भी देख लिया था किंतु तुमने उससे पाठ नहीं सीखा और फिर बुराई करने लगे। अतः इस बार भी तुम्हें इस बात की प्रतीक्षा करनी चाहिए कि तुम पर कुछ ऐसे लोग अपना वर्चस्व जमा लेंगे जो तुम्हें अत्यधिक अपमानित करेंगे। वे मस्जिदुल अक़सा को तुम से छीन लेंगे और तुम्हें अपने अधीन कर लेंगे।

    क़ुरआने मजीद में इस घटना के समय और ब्योरे का उल्लेख नहीं किया गया है क्योंकि ऐतिहासिक घटनाओं में जो बात महत्वपूर्ण होती है वह उनसे मिलने वाले पाठ हैं जिनसे सभी राष्ट्रों और जातियों को शिक्षा लेनी चाहिए और यह जान लेना चाहिए कि साम्राज्य और कुफ़्र निरुत्तर नहीं रहता और धरती में बुराई फैलाने का दंड इसी संसार में अवश्य ही मिल जाता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि हमारी अच्छाई और बुराई से ईश्वर को कोई लाभ अथवा हानि नहीं होती बल्कि इसका परिणाम स्वयं हमें प्राप्त होता है।

    इतिहास तथा समाज के बारे में ईश्वर की परंपराएं तथा क़ानून स्थिर हैं और जो कोई भी बुराई फैलाने का प्रयास करता है, स्वयं तबाह हो जाता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 8 की तिलावत सुनें।

    عَسَى رَبُّكُمْ أَنْ يَرْحَمَكُمْ وَإِنْ عُدْتُمْ عُدْنَا وَجَعَلْنَا جَهَنَّمَ لِلْكَافِرِينَ حَصِيرًا (8)

    शायद तुम्हारा पालनहार तुम पर दया करे और यदि तुम पलट आए तो हम भी पलट आएंगे और हमने नरक को काफ़िरों के लिए एक कड़ा कारावास बनाया है।(17:8)

    यह आयत कहती है कि तुम्हें कभी भी ईश्वर की दया की ओर से निराश नहीं होना चाहिए बल्कि सदैव उसकी दया व कृपा की ओर से आशावान रहना चाहिए। अलबत्ता इस संबंध में तुम्हारा व्यवहार और कर्म, ईश्वरीय दया की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यदि तुम ने बुराई को छोड़ दिया तो इस बात की आशा है कि ईश्वर तुम्हें अपनी दया का पात्र बनाए किंतु यदि तुम ने बुराई को जारी रखा तो जान लो कि ईश्वरीय दया तुम्हारी ओर से पलट जाएगी और इस संसार में तबाह होने के अतिरिक्त तुम्हें प्रलय में भी नरक में जाना होगा जहां अत्यंत कड़ा दंड तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर अपने बंदों के साथ दया व प्रेम से काम लेता है किंतु बंदे ही पाप और बुराई द्वारा ईश्वरीय दया का मार्ग बंद कर देते हैं।

    ईश्वरीय दया की शुभ सूचना देने के साथ ही उसके दंड की ओर से भी सचेत करते रहना आवश्यक है ताकि मनुष्य को बुराई के परिणाम का ज्ञान रहे।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 9 और 10 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ هَذَا الْقُرْآَنَ يَهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ وَيُبَشِّرُ الْمُؤْمِنِينَ الَّذِينَ يَعْمَلُونَ الصَّالِحَاتِ أَنَّ لَهُمْ أَجْرًا كَبِيرًا (9) وَأَنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآَخِرَةِ أَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا (10)

    निश्चित रूप से यह क़ुरआन सबसे सुदृढ़ राह की ओर मार्गदर्शन करता है और भले कर्म करने वाले ईमान वालों को यह शुभ सूचना देता है कि उनके लिए बड़ा बदला है।(17:9) और जो लोग प्रलय पर ईमान नहीं रखते, हमने उनके लिए अत्यंत पीड़ादायक दंड तैयार कर रखा है।(17:10)

    सूरए इसरा की बनी इस्राईल से संबंधित आयतों के समाप्त हो जाने के बाद इन आयतों में मनुष्य के मार्गदर्शन में क़ुरआने मजीद के स्थान की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि क़ुरआने मजीद की मार्गदर्शन की शैली, एक अत्यंत सुदृढ़ व स्थिर शैली है जो समय व स्थान के परिवर्तनों से प्रभावित नहीं होती। स्पष्ट है कि ईश्वरीय वाणी और रचयिता के कथन को इतनी सृदृढ़ता प्राप्त है कि कोई भी बात उसे डगमगा नहीं सकती।

    क़ुरआन की आयतों के रूप में मनुष्य के लिए प्रस्तुत की जाने वाली ईश्वरीय शिक्षाओं और वास्तविकताओं का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य, कल्याण व परिपूर्णता की ओर उसका मार्गदर्शन है और वे इस संबंध में पूर्णतः संपूर्ण हैं। इस प्रकार ईश्वर ने मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए किसी भी वस्तु की कमी नहीं छोड़ी है और उसकी रचना अर्थात मनुष्य को जिस बात की भी आवश्यकता थी, उसे उसने उसके हवाले कर दिया है।

    अलबत्ता स्वाभाविक है कि इन शिक्षाओं और वास्तविकताओं से लाभ उठाने में मनुष्य को स्वतंत्र छोड़ा गया है। कुछ लोग इन्हें स्वीकार करके इनके अनुसार काम करते हैं और लोक-परलोक में सफल हो जाते हैं किंतु कुछ लोग कुफ़्र एवं द्वेष के कारण इन्हें स्वीकार नहीं करते और अपनी या दूसरों की आंतरिक इच्छाओं का पालन करते हैं। स्पष्ट सी बात है कि दूसरे गुट के लोग, जिन्होंने रचयिता के मार्गदर्शन से मुंह मोड़ लिया है, ग़लत रास्ते पर चल पड़ते हैं और उन्हें लोक-परलोक में उसके कुपरिणामों और दंड को सहन करना पड़ता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद का मार्गदर्शन, सुदृढ़ तर्क पर आधारित है और उसमें अंधविश्वासों और कल्पनाओं का कोई स्थान नहीं है।

    क़ुरआने मजीद एक अमर और वैश्विक किताब है और उसकी शिक्षाएं किसी जाति, समुदाय या भाषा से विशेष नहीं हैं।

    ईश्वरीय दया का एक चिन्ह, उसकी ओर से मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए किताब का भेजा जाना है किंतु इस अनंत दया से लाभ उठाना, स्वयं मनुष्य की इच्छा और इरादे पर निर्भर है जो ईमान अथवा कुफ़्र के माध्यम से अपने लिए स्वर्ग या नरक तैयार करता है।