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    सूरए इसरा, आयतें 71-73, (कार्यक्रम 494)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 71 की तिलावत सुनें।

    يَوْمَ نَدْعُوا كُلَّ أُنَاسٍ بِإِمَامِهِمْ فَمَنْ أُوتِيَ كِتَابَهُ بِيَمِينِهِ فَأُولَئِكَ يَقْرَءُونَ كِتَابَهُمْ وَلَا يُظْلَمُونَ فَتِيلًا (71)

    (प्रलय का दिन वह होगा) जिस दिन हम लोगों के हर गुट को उसके इमाम अर्थात मार्गदर्शक के साथ बुलाएंगे। तो जिनका कर्मपत्र उनके दाहिने हाथ में दिया जाएगा तो वे अपने कर्मपत्र को (प्रसन्नता से पढ़ेंगे) और उन पर कण बराबर भी अत्याचार नहीं किया जाएगा।(17:71)

    हर मनुष्य अपने वैचारिक व सामाजिक मामलों में किसी न किसी को अपना नेता व मार्गदर्शक बनाता है तथा उसका अनुसरण करता है। इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि प्रलय के दिन लोगों को उनके उन्हीं नेताओं के साथ बुलाया जाएगा क्योंकि प्रलय इसी सांसारिक जीवन का साक्षात रूप है। यदि उसका वैचारिक नेता, प्रकाश व मार्गदर्शन का नेता हुआ तो उसे मुक्ति प्राप्त होगी और वह स्वर्ग में जाएगा किंतु यदि उसका नेता बुरा व पथभ्रष्ट हुआ तो वह नरक में जाएगा।

    आगे चलकर आयत कहती है कि प्रलय के न्यायालय में ईश्वरीय न्याय के आधार पर फ़ैसले किए जाएंगे और किसी के साथ कण बराबर भी अत्याचार नहीं किया जाएगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक नेताओं और वैचारिक मार्गदर्शकों के अनुसरण का प्रभाव प्रलय तक बाक़ी रहता है तथा प्रलय के दिन लोगों का वर्गीकरण उनके नेताओं के अनुसार किया जाएगा।

    मार्गदर्शन एवं नेतृत्व लोगों के जीवन में मूल भूमिका निभाता है और उनके अनंतकालीन सौभाग्य या दुर्भाग्य का कारण बनता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 72 की तिलावत सुनें।

    وَمَنْ كَانَ فِي هَذِهِ أَعْمَى فَهُوَ فِي الْآَخِرَةِ أَعْمَى وَأَضَلُّ سَبِيلًا (72)

    और जो कोई इस संसार में अंधा (व पथभ्रष्ट) होगा वह प्रलय में भी अंधा और सबसे अधिक पथभ्रष्ट होगा।(17:72)

    पिछली आयत में परलोक में मनुष्य के सौभाग्य या दुर्भाग्य में उसके नेता की भूमिका का वर्णन किया गया था। यह आयत मनुष्य के सौभाग्य व दुर्भाग्य के आंतरिक कारण की ओर संकेत करते हुए कहती है कि जिस प्रकार मनुष्य का नेता उसके बाहरी कारण के रूप में उसके भविष्य को प्रभावित करता है, उसी प्रकार से पवित्र व सत्य को स्वीकार करने पर तैयार हृदय अथवा इसके विपरीत अपवित्र व सत्य को स्वीकार करने से इन्कार करने वाला हृदय भी मनुष्य के जीवन में इसी प्रकार की भूमिका निभाता है।

    यही कारण है कि जिस प्रकार से प्रलय में मनुष्य को अपने सांसारिक नेताओं के साथ बुलाया जाएगा, उसी प्रकार से यदि मनुष्य संसार में दिल का अंधा हुआ तो प्रलय में भी वह अंधा व पथभ्रष्ट रहेगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय, हमारे सांसारिक कर्मों का प्रतिबिंबन है, हम यहां जो बोएंगे, वहां वही काटेंगे।

    संसार में सूझबूझ व अंतर्दृष्टि, प्रलय में सूझबूझ व अंतर्दृष्टि का कारण बनती है, इसी प्रकार से संसार में दिल का अंधा व्यक्ति प्रलय में भी अंधा और मार्ग से भटका हुआ रहता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 73 की तिलावत सुनें।

    وَإِنْ كَادُوا لَيَفْتِنُونَكَ عَنِ الَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ لِتَفْتَرِيَ عَلَيْنَا غَيْرَهُ وَإِذًا لَاتَّخَذُوكَ خَلِيلًا (73)

    और बहुत निकट था कि वे आपको उस बात की ओर से निश्चेत कर देते जो हमने अपने विशेष संदेश वहि द्वारा आपके पास भेजी थी ताकि आप वहि के अतिरिक्त किसी अन्य बात को हमारी ओर संबंधित कर दें और फिर वे आपको अपना मित्र बना लेते।(17:73)

    पैग़म्बरों की एक विशेषता उनका पाप और पथभ्रष्टता से सुरक्षित होना है। अपने बंदों तक अपनी बातों को पूर्ण रूप से और सही ढंग से पहुंचवाने के लिए ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों को हर प्रकार के पाप, ग़लती और भटकाव से सुरक्षित रखा है। ऐसा इस लिए है कि वह ईश्वरीय संदेश को लोगों तक पहुंचाने में किसी भी प्रकार की कोई ग़लती न करें। इसी प्रकार व्यवहार में भी वे किसी प्रकार की भूल का शिकार न हों अन्यथा उन पर से लोगों का विश्वास उठ जाएगा।

    यह आयत कहती है कि अनेकेश्वरवादी प्रयास कर रहे थे कि अपनी धूर्ततापूर्ण बातों व झूठे वादों के माध्यम से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को लोगों को ईश्वर की ओर बुलाने से रोक दें। जैसा कि इतिहास में वर्णित है कि मक्के के प्रतिष्ठित लोगों ने कुछ लोगों को पैग़म्बर के पास भेज कर यह कहलवाया कि यदि वे धन-दौलत चाहते हैं तो जो वे चाहते हैं उन्हें दिया जाएगा और यदि सुंदर महिला से शादी करना चाहते हैं तो मक्के की जिस महिला की ओर वे संकेत करेंगे उससे उनकी शादी करा दी जाएगी किंतु वे लोगों को अपने धर्म की ओर बुलाना छोड़ दें।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने उनके उत्तर में कहा था कि ईश्वर की सौगंध यदि मेरे एक हाथ में सूर्य और दूसरे में चन्द्रमा दे दिया जाए तो भी मैं अपने दायित्व के पालन से पीछे नहीं हटूंगा। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के 23 वर्षों के दौरान भी, चाहे वे मक्के में रहे हों अथवा मदीने में, अनेकेश्वरवादियों ने विभिन्न मार्गों से लोभ या फिर धमकी देकर, उन्हें उनके दायित्व निर्वाह से रोकने का प्रयास किया किंतु वे अपने दायित्व से एक क़दम भी पीछे नहीं हटे।

    यह आयत भी कहती है कि अनेकेश्वरवादियों ने इस बात का बहुत प्रयास किया कि पैग़म्बर से मित्रता प्रकट करके उन्हें धोखा दे दें और ईश्वरीय मार्ग से विचलित कर दें किंतु ईश्वर ने उन्हें शत्रुओं के षड्यंत्रों से सुरक्षित रखा और इस बात की अनुमति नहीं दी कि उनके उकसावे पैग़म्बर को प्रभावित करें।

    इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी समाज के नेताओं को सचेत और जागरूक रहना चाहिए और इस बात को दृष्टिगत रखना चाहिए कि शत्रु, विदित रूप से मित्रता प्रकट करके इस्लाम और मुसलमानों को क्षति पहुंचाने के प्रयास में हैं।

    क़ुरआने मजीद की दृष्टि में ऐसी हर दोस्ती व मित्रता अस्वीकार्य है जिससे मनुष्य की धार्मिक आस्थाएं व मानवीय मान्यताएं कमज़ोर होती हों।