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    सूरए इसरा, आयतें 74-77, (कार्यक्रम 495)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 74 और 75 की तिलावत सुनें।

    وَلَوْلَا أَنْ ثَبَّتْنَاكَ لَقَدْ كِدْتَ تَرْكَنُ إِلَيْهِمْ شَيْئًا قَلِيلًا (74) إِذًا لَأَذَقْنَاكَ ضِعْفَ الْحَيَاةِ وَضِعْفَ الْمَمَاتِ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ عَلَيْنَا نَصِيرًا (75)

    और यदि हमने आपको सुदृढ़ न रखा होता तो (मानवीय रूप से) आप उनकी ओर कुछ न कुछ अवश्य ही झुक जाते। (17:74) उस स्थिति में हम इस सांसारिक जीवन में भी और मृत्यु (के पश्चात प्रलय में) भी दोहरे दंड का स्वाद चखाते, फिर आप हमारे दंड के मुक़ाबले में अपने लिए कोई सहायक भी न पाते।(17:75)

    पिछली आयतों में बताया गया था कि मक्के के अनेकेश्वरवादी, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को अपनी ओर आकृष्ट करने और उनसे मित्रता प्रकट करने के प्रयास में थे ताकि उन्हें लोगों को ईश्वरीय धर्म की ओर आमंत्रित करने से रोक दें। यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है कि हमने आपको शत्रुओं के उकसावों के प्रभाव से सुरक्षित कर रखा था और यदि हमारी यह विशेष कृपा न होती तो संभव था कि मानव प्रवृत्ति के अनुसार आप उनकी ओर थोड़ा बहुत झुक जाते और उस स्थिति में लोक-परलोक में हमारा दंड दुगना होता क्योंकि सत्य के मार्ग से आपका विचलित होना, सभी ईमान वालों के विचलित होने का कारण बनता और इस बात की संभावना थी कि वे ईमान से पलट जाते।

    स्पष्ट है कि ये आयतें, पैग़म्बरों के पाप और हर प्रकार की ग़लती से सुरक्षित रहने पर बल देती हैं, यह विशेषता है जो ईश्वर ने लोगों तक अपनी बात के वास्तविक रूप में पहुंचने तथा उसमें फेर बदल को रोकने के लिए पैग़म्बरों को प्रदान की है। यह आयत सूचनात्मक रूप में नहीं बल्कि शर्त के रूप में पैग़म्बर से कहती है कि यदि हम आपको सुरक्षित न रखते तो आप ग़लती कर सकते थे, इस प्रकार के वाक्य, जो क़ुरआने मजीद में कई स्थानों पर आए हैं, पैग़म्बरों के पापों से सुरक्षित रहने से विरोधाभास नहीं रखते। उदाहरण स्वरूप सूरए ज़ुमर की आयत नंबर 65 में कहा गया है कि हे पैग़म्बर! यदि आपने किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराया तो आपके सारे कर्म अकारत हो जाएंगे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि शत्रुओं के उकसावों से सुरक्षित रहना, पैग़म्बरों और उनके सच्चे साथियों की विशेषताओं में से हैं।

    ग़लती पर क्षमा व अनदेखी, ईमान वालों के समाज में ही अर्थपूर्ण है किंतु शत्रु के मुक़ाबले में किसी भी प्रकार की ढिलाई, काफिरों की ओर झुकने तथा धार्मिक मान्यताओं से पीछे हटने का कारण बनती है।

    इस्लामी समाज के नेताओं व अधिकारियों पर अधिक भारी दायित्व होता है क्योंकि कभी-कभी उनकी छोटी सी ग़लती का दंड, लोगों की बड़ी गलतियों के दंड से भी अधिक होता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 76 और 77 की तिलावत सुनें।

    وَإِنْ كَادُوا لَيَسْتَفِزُّونَكَ مِنَ الْأَرْضِ لِيُخْرِجُوكَ مِنْهَا وَإِذًا لَا يَلْبَثُونَ خِلَافَكَ إِلَّا قَلِيلًا (76) سُنَّةَ مَنْ قَدْ أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ مِنْ رُسُلِنَا وَلَا تَجِدُ لِسُنَّتِنَا تَحْوِيلًا (77)

    और बहुत निकट था कि अनेकेश्वरवादी आपका हृदय मक्के की धरती से उचाट कर देते ताकि आपको वहां से बाहर कर दें जबकि आपके बाद वे स्वयं भी वहां थोड़े समय से अधिक न टिकते।(17:76) (हमारी) यह परंपरा आपसे पहले वाले हमारे पैग़म्बरों के बारे में भी रही है और आप हमारी परंपरा में कोई परिवर्तन नहीं पाएंगे।(17:77)

    मक्के के अनेकेश्वरवादियों का एक षड्यंत्र यह था कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को मक्के से दूर किसी स्थान पर निर्वासित कर दें ताकि वे लोगों से दूर रहें और कोई भी उनके ईश्वरीय निमंत्रण को न सुन सके किंतु ईश्वर ने उनके इस षड्यंत्र को विफल बना दिया।

    आगे चलकर आयत कहती है कि सभी पैग़म्बरों और उनकी जातियों के संबंध में ईश्वर की परंपरा यह है कि यदि पैग़म्बरों के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जाता है तो अल्पावधि में ईश्वरीय दंड उस क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेता है और उस जाति का कोई चिन्ह तक बाक़ी नहीं बचता।

    जैसा कि सूरए इब्राहीम की आयत नंबर 13 में कहा गया है कि काफ़िरों ने अपने पैग़म्बरों से कहा कि निश्चित रूप से हम तुम्हें अपनी धरती से बाहर निकाल देंगे अन्यथा तुम हमारे धर्म की ओर पलट आओ किंतु ईश्वर ने उन (पैग़म्बरों) के पास वहि अर्थात अपना विशेष संदेश भेजा कि निश्चित रूप से हम अत्याचारियों को विनष्ट कर देंगे।

    स्पष्ट है कि जो लोग पैग़म्बरों की अनुकंपा का महत्व नहीं समझते और उनके मार्गदर्शनों से लाभ उठाने के बजाए, उनके विरुद्ध खड़े हो जाते हैं तथा उन्हें क्षति पहुंचाने का प्रयास करते हैं, वे ईश्वरीय दया व कृपा के पात्र नहीं बन सकते अतः कड़ा दंड उनकी प्रतीक्षा में है। यह नियम किसी जाति या समुदाय से विशेष नहीं है क्योंकि ईश्वर की दृष्टि में और उसके क़ानून में सभी समान हैं, यही कारण है कि आगे चलकर आयत कहती है कि पूरे इतिहास में यह ईश्वरीय क़ानून व परंपरा समान रूप से जारी रही है और इसमें कोई परिवर्तन नहीं आया है जबकि मानवीय क़ानून जो किसी व्यक्ति या किसी गुट के हितों व इच्छाओं के अंतर्गत बनाए जाते हैं, सदैव परिवर्तित होते रहते हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि शत्रु आरंभ में इस्लामी समाज के नेताओं को अपनी ओर आकृष्ट करने का प्रयास करते हैं किंतु जब वे इसमें सफल नहीं होते तो उनकी हत्या करने का प्रयास करते हैं।

    लोगों के बीच पैग़म्बर का अस्तित्व, ईश्वरीय दंड व कोप के मार्ग में बाधा है। ईश्वर के अन्य प्रिय बंदों को भी, ईश्वर से उनके सामिप्य के अनुरूप ही यह विशेषता प्राप्त होती है।

    ऐतिहासिक घटनाओं की, ईश्वरीय परंपराओं के आधार पर समीक्षा की जा सकती है और उनसे मानव भविष्य को बेहतर बनाने के लिए लाभ उठाया जा सकता है।