islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए इसरा, आयतें 78-80, (कार्यक्रम 496)

    सूरए इसरा, आयतें 78-80, (कार्यक्रम 496)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 78 की तिलावत सुनें।

    أَقِمِ الصَّلَاةَ لِدُلُوكِ الشَّمْسِ إِلَى غَسَقِ اللَّيْلِ وَقُرْآَنَ الْفَجْرِ إِنَّ قُرْآَنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا (78)

    सूरज ढलने से लेकर रात का अन्धकार फैलने तक नमाज़ पढ़ो, और भोर समय की नमाज़ भी पढ़ो कि फ़ज्र की नमाज़ की गवाही दी जाएगी।(17:78)

    यह आयत जिसमें प्रति दिन पढ़ी जाने वाली नमाज़ों के समय की ओर संकेत किया गया है, कहती है कि दोपहर में सूरज के पश्चिम की ओर ढलने के बाद से ज़ुहर की नमाज़ का समय आरंभ होता है, यह समय रात तक जारी रहता है और इसमें अस्र की नमाज़ का समय भी शामिल होता है। आगे चलकर आयत रात के अन्धकार अर्थात आधी रात को नमाज़ की समाप्ति का समय बताती है, अर्थात जब हर ओर रात का अन्धकार छा जाए और अंधेरा सबसे अधिक हो तो वह आधी रात का समय होता है। इससे पहले मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़ ली जानी चाहिए।

    आरंभिक चार नमाज़ों अर्थात ज़ुहर, अस्र, मग़रिब और इशा के समय एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, आधी रात होने के साथ ही इशा की नमाज़ का समय समाप्त हो जाता है और भोर समय होने तक मनुष्य पर कोई नमाज़ अनिवार्य नहीं होती अलबत्ता भोर होते ही फ़ज्र की नमाज़ का समय हो जाता है।

    आयत के अंत में एक रोचक बिंदु की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि फ़ज्र की नमाज़ की गवाही दी जाएगी। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों के कथनों के अनुसार, रात और दिन दोनों समय के फ़रिश्ते फ़ज्र की नमाज़ को देखते हैं। रात्रि के फ़रिश्ते जाते समय और दिन के फ़रिश्ते आते समय फ़ज्र की नमाज़ और इस नमाज़ को पढ़ने वालों को देखते हैं और वे इसकी गवाही देंगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक आदेशों का मानदंड, सूर्य व चंद्रमा जैसी भौतिक बातें हैं ताकि सभी लोग सरलता से उन्हें समझ सकें। प्रति दिन की नमाज़ों के समय का मानदंड भी सूर्योदय व सूर्यास्त जैसी बातें हैं।

    धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य कर्मों के लिए समय निर्धारित किया गया है, इससे पता चलता है कि इस्लाम के पास लोगों की प्रगति एवं विकास के लिए निर्धारित कार्यक्रम हैं और वह उन्हें अनुशासन सिखाता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 79 की तिलावत सुनें।

    وَمِنَ اللَّيْلِ فَتَهَجَّدْ بِهِ نَافِلَةً لَكَ عَسَى أَنْ يَبْعَثَكَ رَبُّكَ مَقَامًا مَحْمُودًا (79)

    और रात का कुछ भाग क़ुरआने मजीद की तिलावत के साथ जागते हुए बिताइये कि यह आपके लिए अतिरिक्त दायित्व है, निकट है कि आपका पालनहार आपको प्रशंसनीय स्थान तक पहुंचा दे।(17:79)

    पिछली आयत में प्रति दिन की नमाज़ों के समय का वर्णन करने के पश्चात यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि पैग़म्बर होने के नाते आप पर कुछ अतिरिक्त दायित्व है और वह रात में जाग कर उपासना करना है। आपको रात के एक भाग में जाग कर क़ुरआने मजीद की तिलावत करनी होगी ताकि आप उच्च व प्रशंसनीय स्थान तक पहुंच सकें।

    यद्यपि इस आयत में आधी रात के बाद पढ़ी जाने वाली नमाज़ या नमाज़े शब का उल्लेख नहीं किया गया है और केवल रात में जागने की बात कही गई है किंतु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों के कथनों में इसका अर्थ केवल जागना नहीं है बल्कि नमाज़े शब पढ़ना है जिसमें ईश्वर से पापों को क्षमा किए जाने की प्रार्थना की जाती है।

    अलबत्ता नमाज़े शब पैग़म्बरे इस्लाम के लिए अनिवार्य थी और अन्य लोगों के लिए अनिवार्य नहीं है किंतु इसे पढ़ने का बहुत पुण्य है। क़ुरआने मजीद के सूरए मुज़्ज़म्मिल और मुद्दस्सिर जैसे अन्य सूरों में भी नमाज़े शब के महत्व की ओर संकेत किया गया है। सूरए सज्दा की आयत नंबर 17 में भी ईश्वर ने उन लोगों को, जो रातों में उपासना करते हैं और नमाज़े शब पढ़ते हैं, गुप्त पारितोषिक का वचन दिया है जो उनकी आंखों की ठंडक का कारण बनेगा किंतु किसी को भी उस पारितोषिक के बारे में ज्ञान नहीं है।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और उनके परिजनों के कथनों में नमाज़े शब के अनेक सदपरिणामों का उल्लेख किया गया है जिनमें शारीरिक स्वास्थ्य, आजीविका में वृद्धि, पापों का क्षमा किया जाना, लोगों के बीच आदर-सम्मान इत्यादि उल्लेखनीय हैं। अलबत्ता नमाज़े शब पढ़ने के लिए ईश्वरीय सहायता की आवश्यकता है जो हर एक को प्राप्त नहीं होती। हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कथन है कि दिन में किए गए पापों के कारण मनुष्य आधी रात के बाद पढ़ी जाने वाली नमाज़ से वंचित हो जाता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि आधी रात का समय, जब सब लोग सो रहे होते हैं, ईश्वर से प्रार्थना और उसकी उपासना का सबसे अच्छा समय है।

    प्रशंसनीय स्थान तक पहुंचने का मार्ग, ईश्वर की उपासना है जिससे मनुष्य को परिपूर्णता प्राप्त होती है।

    आइए अब सूरए इसरा की आयत नंबर 80 की तिलावत सुनें।

    وَقُلْ رَبِّ أَدْخِلْنِي مُدْخَلَ صِدْقٍ وَأَخْرِجْنِي مُخْرَجَ صِدْقٍ وَاجْعَلْ لِي مِنْ لَدُنْكَ سُلْطَانًا نَصِيرًا (80)

    और कहिए कि प्रभुवर! मुझे (हर काम में) भलाई (व सच्चाई) के साथ प्रविष्ट कर और भलाई (व सच्चाई) के साथ ही बाहर निकाल और अपनी ओर से मेरे लिए एक सहायक शक्ति भेज दे।(17:80)

    यह आयत एक अत्यंत महत्वपूर्ण इस्लामी आदेश अर्थात सच्चाई और अमानत की ओर संकेत करते हुए कहती है कि हर कार्य का आरंभ व अंत और सभी कार्यक्रमों का मानदंड सच्चाई व भलाई होना चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो ईश्वर भी मनुष्य की सहायता करता है और वह कठिनाइयों को नियंत्रित करके अपने लक्ष्य तक पहुंच जाता है।

    हर कार्य का आरंभ व अंत सच्चाई व निष्ठा के आधार पर होना चाहिए तथा उसमें किसी भी प्रकार का दिखावा नहीं होना चाहिए। कार्य की समाप्ति तक इस प्रकार की पवित्र एवं निष्ठापूर्ण नीयत आवश्यक है। संभावित रूप से बहुत से कार्यों का आरंभ तो निष्ठापूर्ण होता है किंतु आगे चलकर या फिर उस कार्य की समाप्ति पर मनुष्य घमंड में ग्रस्त हो जाता है, जिसके चलते उस कार्य की समस्त विभूतियां बर्बाद हो जाती हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि हमें अपने विचारों व कर्मों के पवित्र व निष्ठापूर्ण होने तथा दिखावे व मिथ्या से दूर रहने के लिए सदैव ईश्वर से प्रार्थना करते रहना चाहिए।

    कार्य के अच्छे आरंभ पर बहुत अधिक प्रसन्न नहीं होना चाहिए बल्कि हमें कार्य के अच्छे अंत के बारे में विचार करना चाहिए ताकि हम बुरे अंजाम में ग्रस्त न हो जाएं।