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    सूरए इसरा, आयतें 81-84, (कार्यक्रम 497)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत संख्या 81 की तिलावत सुनें

    وَقُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ إِنَّ الْبَاطِلَ كَانَ زَهُوقًا (81)

    और कह दीजिए कि सत्य आ गया और असत्य तबाह हो गया निश्चित रूप से असत्य तो तबाह होने वाला ही है।(17:81)

    यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए उनसे कहती है कि वे सभी को इस बात की शुभ सूचना दे दें कि सत्य की विजय होगी और असत्य तबाह हो जाएगा। आयत ईमान वालों को शुभ सूचना देती है कि उन्हें समस्त कठिनाइयों और दुखों के बावजूद भविष्य के प्रति आशावान रहना चाहिए क्योंकि असत्य अपनी समस्त झूठी शक्तियों और वैभव के बावजूद अंततः तबाह होकर ही रहेगा और वह अनंतकालीन नहीं है। इस आयत में सत्य के लिए प्रयोग होने वाले शब्द हक़ का अर्थ होता है स्थायी और सदैव बाक़ी रहने वाली बात, चूंकि केवल ईश्वर ही अमर व अनंत है और अन्य सभी बातें परिवर्तित होती रहती हैं, अतः ईश्वर का एक नाम हक़ भी है। इसी प्रकार से जो बात उससे संबंधित होगी वह भी हक़ और अमर होगी।

    इस आयत से हमने सीखा कि सत्य का बाक़ी रहना और असत्य का मिट जाना, एक ईश्वरीय क़ानून और परंपरा है, चाहे सत्य के मानने वाले कम और असत्य का अनुसरण करने वाले बहुत अधिक क्यों न हों।

    सत्य के आते ही असत्य मिट जाता है, अतः सत्य के अनुयाइयों को समाज में सत्य का प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत संख्या 82 की तिलावत सुनते हैं।

    وَنُنَزِّلُ مِنَ الْقُرْآَنِ مَا هُوَ شِفَاءٌ وَرَحْمَةٌ لِلْمُؤْمِنِينَ وَلَا يَزِيدُ الظَّالِمِينَ إِلَّا خَسَارًا (82)

    और जो कुछ हम क़ुरआने (मजीद) द्वारा भेजते हैं वह ईमान वालों के लिए शिफ़ा अर्थात रोगमुक्ति का साधन और दया है तथा उससे अत्याचारियों के लिए घाटे के अतिरिक्त किसी अन्य बात की वृद्धि नहीं होती।(17:82)

    पिछली आयत में सत्य के अमर होने व असत्य के तबाह होने पर बल दिया गया था। यह आयत सत्य के सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ईश्वर की ओर से जो क़ुरआन मजीद भेजा गया है, वह केवल सत्य का अनुसरण करने वालों अर्थात ईमान वालों के लिए ही लाभदायक है। वे क़ुरआन की शिक्षाओं की छाया में मार्गदर्शन के प्रकाश से लाभान्वित होते हैं और उसके माध्यम से उनके आत्मिक रोगों का उपचार होता है और वे ईश्वर की विशेष दया के पात्र बनते हैं।

    किन्तु सत्य के विरोधी, काफ़िर तथा अनेकेश्वरवादी जो अपने द्वेष और हठधर्म के कारण क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं को महत्त्व नहीं देते बल्कि उनका विरोध करते हैं, उनकी आत्मिक अपवित्रता और गंदगी में वृद्धि होती है और वे अधिक घाटे और क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।

    जिस प्रकार से कि उपजाऊ भूमि पर होने वाली वर्षा से पेड़-पौधे बढ़ते हैं और फ़स्ल अच्छी होती है किन्तु यही वर्षा जब गंदगी वाले स्थान पर होती है तो उससे केवल उस स्थान पर गंदगी में ही वृद्धि होती है।

    अलबत्ता क़ुरआने मजीद की रोगमुक्त करने की विशेषता केवल मनुष्य के मन और उसकी आत्मा से विशेष नहीं है बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनों के अनुसार क़ुरआने मजीद की तिलावत करने से अनेक शारीरिक पीड़ाओं और रोगों से भी मुक्ति मिलती है। यह बात आज वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हो चुकी है और कई अवसरों पर चिकित्सक रोगी को अच्छी पुस्तकें पढ़ने की सलाह देते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर पर ईमान, उसकी विशेष दया व कृपा की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

    चूंकि काफ़िर ईश्वरीय आदेशों का पालन नहीं करते अतः उनके द्वारा सत्य के विरोध से उनके अपराध में वृद्धि हो जाती है और वे अधिक कड़े दंड के पात्र बनते हैं।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 83 की तिलावत सुनें।

    وَإِذَا أَنْعَمْنَا عَلَى الْإِنْسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَى بِجَانِبِهِ وَإِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ كَانَ يَئُوسًا (83)

    और जब भी हमने मनुष्य को कोई अनुकंपा प्रदान की तो उसने मुंह मोड़ लिया और (घमंड से) अपने कंधों को घुमा लिया और जब कभी उसे कोई बुराई छू जाती है तो वह निराश हो जाता है।(17:83)

    यह आयत, उन लोगों की एक विशेषता की ओर संकेत करती है जिन्हें धार्मिक व ईश्वरीय प्रशिक्षण प्राप्त नहीं हुआ है। आयत कहती है कि यद्यपि सभी अनुकंपाएं ईश्वर की ओर से हैं किन्तु कुछ लोगों की घमंडी प्रवृत्ति इस बात का कारण बनती है कि वे अनुकंपा प्रदान करने वाले को भूल जाएं ईश्वर के समक्ष अकड़ कर खड़े हों तथा उसके आदेशों की अवहेलना करें।

    स्वाभाविक सी बात है कि इस प्रकार के लोग समस्याओं और कठिनाइयों में ग्रस्त होते हैं तो चूंकि उनके पास कोई ठोस वैचारिक सहारा नहीं होता अतः वे शीघ्र ही निराश हो जाते हैं किन्तु ईमान वाले ईश्वर पर ईमान और भरोसे के कारण अत्यंत कठिन व जटिल परिस्थितियों में भी डटे रहते हैं और कभी भी भविष्य की ओर से निराश नहीं होते।

    इस आयत से हमने सीखा कि अधिकांश लोग, अनुकंपाओं पर ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहने के स्थान पर अपनी धन-संपत्ति और अन्य साधनों को अपने विचारों, क्षमता व प्रयासों का परिणाम समझते हैं तथा ईश्वर को भूल जाते हैं। इस प्रकार की भावनाओं को स्वयं के भीतर उत्पन्न नहीं होने देना चाहिए।

    ईश्वर के बिना मनुष्य, कमज़ोर है। तुच्छ प्रवृत्ति के लोग, ऐश्वर्य में, निश्चेतना में ग्रस्त हो जाते हैं तथा कठिनाइयों व संकटों में निराश हो जाते हैं।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत संख्या 84 की तिलावत सुनते हैं।

    قُلْ كُلٌّ يَعْمَلُ عَلَى شَاكِلَتِهِ فَرَبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَنْ هُوَ أَهْدَى سَبِيلًا (84)

    कह दीजिए कि हर कोई अपने ढंग से (और अपनी प्रवृत्ति के अनुसार) कर्म करता है तो तुम्हारा पालनहार भलीभांति जानता है कि कौन अधिक सीधे मार्ग पर है।(17:84)

    यह आयत लोगों के कर्म एवं व्यवहार में उनकी प्रवृत्ति की भूमिका की ओर संकेत करते हुए कहती है कि मनुष्य की आंतरिक प्रवृत्ति एवं उसका स्वभाव, जीवन में उसके कर्म एवं व्यवहार की शैली को निर्धारित करता है। यह प्रवृत्ति एवं स्वभाव दो महत्त्वपूर्ण कारकों के अधीन होता है। प्रथम पारिवारिक संस्कार और दूसरे प्रशिक्षण।

    पहला कारक अर्थात पारिवारिक संस्कार, स्वाभाविक रूप से परिवार से प्राप्त होता है जबकि दूसरा कारक मनुष्य को उसके आस-पास के वातावरण अर्थात पारिवारिक वातावरण, सामाजिक वातावरण, काम के वातावरण और स्कूल व कालेज इत्यादि के वातावरण से प्राप्त होता है। इसी के साथ यह बात भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि इन दोनों कारकों को जो बात नियंत्रित कर सकती है वह स्वयं मनुष्य का अधिकार है। अर्थात पारिवारिक संस्कार और आस-पास के वातावरण दोनों ही में मनुष्य विवश नहीं होता बल्कि अपनी इच्छा और अपने अधिकार से अपने स्वभाव और प्रवृत्ति का निर्माण करता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य का व्यवहार उसके वैचारिक व्यक्तित्व एवं उसकी नैतिक व आत्मिक विशेषताओं का दर्पण होता है।

    बुरे विचार, बुरी सोच व बुरे उकसावे, ग़लत एवं अनुचित व्यवहार का मार्ग प्रशस्त करते हैं अतः हमें उनसे बचना चाहिए।