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    सूरए इसरा, आयतें 85-88, (कार्यक्रम 498)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 85 की तिलावत सुनें।

    وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الرُّوحِ قُلِ الرُّوحُ مِنْ أَمْرِ رَبِّي وَمَا أُوتِيتُمْ مِنَ الْعِلْمِ إِلَّا قَلِيلًا (85)

    और वे आपसे आत्मा के बारे में पूछते हैं, कह दीजिए कि (आत्मा) मेरे पालनहार के आदेश से है और तुम्हें ज्ञान का बहुत थोड़ा ही भाग दिया गया है।(17:85)

    लोग सदैव पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से विभिन्न प्रकार के प्रश्न करते रहते थे। ईमान वाले लोग, धर्म की सही पहचान के लिए उनसे प्रश्न करते थे जबकि विरोधी और काफ़िर, लोगों के बीच भ्रम उत्पन्न करने एवं पैग़म्बर की छवि को बिगाड़ने के लिए प्रश्न किया करते थे। यह आयत इन्हीं में से एक प्रश्न की ओर संकेत करते हुए कहती है कि पैग़म्बर से रूह अर्थात आत्मा के बारे में प्रश्न किया जाता था।

    क़ुरआने मजीद में रूह शब्द 20 बार तथा तीन वस्तुओं के बारे में प्रयोग किया गया है। एक वह प्राण अथवा आत्मा जो मनुष्य के शरीर में फूंकी जाती है, दूसरे वह महान फ़रिश्ता जिस पर ईश्वरीय संदेश अर्थात वहि को पहुंचाने का दायित्व होता है और तीसरे स्वयं क़ुरआने मजीद व ईश्वरीय संदेश जो पैग़म्बर के पास भेजा गया है।

    रूह या आत्मा का अर्थ होता है जीवन का स्रोत और उक्त तीनों बातें, मनुष्य और मानव समाज के जीवन का स्रोत हैं। प्रश्नकर्ता पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से या तो मानवीय आत्मा के बारे में प्रश्न करते थे कि वह क्या है और कैसी है? या फिर उस फ़रिश्ते के बारे में प्रश्न करते थे जो क़ुरआन की आयतें ले कर आया करता था कि वह कैसा है और किस प्रकार क़ुरआन लेकर आता है?

    ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि इस प्रकार के प्रश्न करने वालों से कह दीजिए कि रूह या आत्मा, भौतिक वस्तु नहीं है जिसका आभास इंद्रियों के माध्यम से किया जा सके, बल्कि यह अलौकिक मामलों में से एक है जिसकी रचना ईश्वर ने की है और यह कैसी और किस प्रकार की होती है, यह समझना तुम्हारी क्षमता में नहीं है। मूल रूप से यह कहा जाना चाहिए कि इस सृष्टि की वास्तविकताओं के बारे में तुम्हारा ज्ञान बहुत सीमित है अतः यह मत सोचो कि तुम हर बात जानते हो या हर बात को समझ सकते हो।

    इस आयत से हमने सीखा कि आत्मा एक जटिल व अज्ञात वस्तु तथा ईश्वरीय रहस्यों में से एक है और उसे समझना मनुष्य की क्षमता से बाहर है।

    सभी मानवीय ज्ञान, ईश्वर की ओर से मनुष्य को प्रदान किए जाने वाले उपहार हैं।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 86 और 87 की तिलावत सुनें।

    وَلَئِنْ شِئْنَا لَنَذْهَبَنَّ بِالَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَكَ بِهِ عَلَيْنَا وَكِيلًا (86) إِلَّا رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَ إِنَّ فَضْلَهُ كَانَ عَلَيْكَ كَبِيرًا (87)

    और यदि हम चाहें तो जो कुछ हमने आपकी ओर वहि के रूप में भेजा है, उसे (आपकी याद से) मिटा दें। फिर हमारे प्रति आप कोई रक्षक भी न पाएंगे।(17:86) सिवाए अपने पालनहार की दया के। निश्चित रूप से आप पर उसकी कृपा बहुत अधिक है।(17:87)

    ये दो आयतें इस बात की ओर संकेत करती हैं कि पैग़म्बरी, वहि व पैग़म्बरे इस्लाम का अंतिम ईश्वरीय दूत होना यह सब ईश्वरीय कृपाओं में से हैं। पैग़म्बर का अपना कुछ नहीं होता बल्कि उनके पास जो कुछ भी होता है वह ईश्वर की ओर से होता है और यदि वह चाहे तो जो कुछ उसने उन्हें प्रदान किया है, वापस ले सकता है।

    अलबत्ता स्पष्ट है कि पैग़म्बर ने कोई भूल या ग़लती नहीं की है कि ईश्वर ने इस प्रकार की आयतें भेजी हैं, बल्कि उसने ईमान वालों को सचेत करने के लिए ये आयतें भेजी हैं ताकि वे पैग़म्बर के बारे में न तो अतिश्योक्ति करें और न ही उनके स्थान को घटाएं, जिस प्रकार से कि ईसाइयों ने हज़रत ईसा मसीह के बारे में अतिश्योक्ति से काम लिया है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि अनुकंपाएं देना और उन्हें छीन लेना ईश्वर के हाथ में है, अतः हमें अपने पास मौजूद वस्तुओं पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि यदि ईश्वर चाहे तो एक क्षण में वह हमसे सब कुछ छीन सकता है।

    क़ुरआने मजीद, ईश्वर की महान अनुकंपाओं में से एक है और पहले पैग़म्बर तथा बाद में सभी लोग इस ईश्वरीय अनुकंपा के पात्र बने हैं।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 88 की तिलावत सुनें।

    قُلْ لَئِنِ اجْتَمَعَتِ الْإِنْسُ وَالْجِنُّ عَلَى أَنْ يَأْتُوا بِمِثْلِ هَذَا الْقُرْآَنِ لَا يَأْتُونَ بِمِثْلِهِ وَلَوْ كَانَ بَعْضُهُمْ لِبَعْضٍ ظَهِيرًا (88)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि सभी मनुष्य और जिन्न एकत्रित हो जाएं ताकि इस क़ुरआन की भांति (कोई दूसरा क़ुरआन) ले आएं तो वे इसके जैसा (क़ुरआन) नहीं ला सकते चाहे इसके लिए वे एक दूसरे की सहायता ही क्यों न करें।(17:88)

    पिछली आयत में कहा गया था कि क़ुरआने मजीद स्वयं पैग़म्बर की ओर से नहीं है बल्कि ईश्वर की ओर से है और यदि वह चाहे तो उसे पैग़म्बर से वापस ले सकता है। यह आयत कहती है कि किस प्रकार से कुछ विरोधी, क़ुरआने मजीद को पैग़म्बर व अन्य लोगों से संबंधित करने का प्रयास करते हैं जबकि न केवल मनुष्य बल्कि यदि जिन्न भी मनुष्यों की सहायता करें तो वे क़ुरआने मजीद जैसी पुस्तक लाने की क्षमता नहीं रखते।

    इसका कारण यह है कि क़ुरआने मजीद, रचयिता का कथन है और सभी मनुष्य व जिन्न ईश्वर की रचना हैं। यदि सभी मनुष्य और जिन्न एकत्रित हो जाएं तो क्या वे ईश्वर की रचना कर सकते हैं या वे ऐसा कोई काम कर सकते हैं जिससे वे ईश्वर से आवश्यकतामुक्त हो जाएं?

    खेद के साथ कहना पड़ता है कि आज के संसार में सामूहिक बुद्धिमत्ता पर बहुत अधिक बल दिया जाता है और धर्म विरोधी व्यवस्थाएं स्वयं को ईश्वरीय संदेश से आवश्यकतामुक्त समझती हैं। उनका दावा है कि सामूहिक बुद्धिमत्ता के माध्यम से संसार की सभी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। उनका विचार है कि सामूहिक बुद्धिमत्ता, ईश्वरीय संदेश वहि से अधिक या कम से कम उतनी ही मूल्यवान है और इसी लिए वे उसे वहि का विकल्प समझते हैं।

    क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि न केवल यह कि सभी मनुष्यों की सामूहिक बुद्धि बल्कि यदि सभी जिन्नों की सहायता भी ले ली जाए तब भी तुम्हारे विचारों से अस्तित्व में आने वाली वस्तु कभी भी वहि की भांति नहीं होगी जिसका स्रोत ईश्वरीय ज्ञान है।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद ईश्वर का अनंतकालीन चमत्कार है और उसने सदैव विरोधियों को चुनौती दी है कि यदि तुममें क्षमता हो तो तुम मेरे समान कथन और किताब ला कर दिखाओ। क़ुरआने मजीद की यह चुनौती केवल पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल से विशेष नहीं थी और यथावत आज भी बाक़ी है।

    मानव विचार व बुद्धि चाहे व्यक्तिगत रूप में हो अथवा सामूहिक रूप में, वहि व ईश्वरीय ज्ञान के समान कोई वस्तु लाने की क्षमता नहीं रखती।