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    सूरए इसरा, आयतें 89-93, (कार्यक्रम 499)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 89 की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ صَرَّفْنَا لِلنَّاسِ فِي هَذَا الْقُرْآَنِ مِنْ كُلِّ مَثَلٍ فَأَبَى أَكْثَرُ النَّاسِ إِلَّا كُفُورًا (89)

    और निश्चित रूप से हमने इस क़ुरआन में लोगों के (समझने के) लिए हर उपमा और उदाहरण का वर्णन तरह तरह से किया है किंतु अधिकांश लोगों ने कुफ़्र के अतिरिक्त हर बात का इन्कार किया।(17:89)

    पिछली आयतों में कहा गया था कि ईश्वर ने कहा है कि यदि सभी मनुष्य और जिन्न मिल कर भी क़ुरआने मजीद जैसी कोई किताब लाना चाहें तो वे ऐसा नहीं कर सकेंगे। यह आयत कहती है कि क़ुरआने मजीद की एक विशेषता यह है कि उसने मानव जीवन से संबंधित सभी मामलों के बारे में बातें की हैं, चाहे वे व्यक्तिगत मामले हों अथवा सामाजिक मामले हों। क़ुरआने मजीद की वर्णन की शैली और उसमें विविधता ने उसे एक विशेष रोचकता प्रदान कर दी है। यह स्वयं क़ुरआने मजीद के चमत्कार का एक आयाम है।

    आगे चलकर आयत कहती है कि इन सबके बावजूद लोगों के भीतर अकृतज्ञता की भावना इस बात का कारण बनती है कि वे ईश्वरीय कथन और क़ुरआने मजीद पर ध्यान देने के बजाए उसकी ओर से मुंह मोड़ लें और उसकी वास्तविकताओं का इन्कार कर दें।

    इस आयत से हमने सीखा कि शिक्षा व प्रशिक्षण की एक उचित शैली अपनी बात का वर्णन उपमाओं के माध्यम से करना है, जिससे क़ुरआने मजीद ने बहुत अधिक लाभ उठाया है।

    लोगों की कृतघ्नता और उनकी ओर से कुफ़्र अपनाए जाने से क़ुरआने मजीद की सच्चाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि सत्य और असत्य को लोगों की संख्या की कसौटी पर नहीं तौला जाता।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 90 और 91 की तिलावत सुनें।

    وَقَالُوا لَنْ نُؤْمِنَ لَكَ حَتَّى تَفْجُرَ لَنَا مِنَ الْأَرْضِ يَنْبُوعًا (90) أَوْ تَكُونَ لَكَ جَنَّةٌ مِنْ نَخِيلٍ وَعِنَبٍ فَتُفَجِّرَ الْأَنْهَارَ خِلَالَهَا تَفْجِيرًا (91)

    और उन्होंने कहा कि हम कदापि तब तक आप पर ईमान नहीं लाएंगे जब तक आप धरती से हमारे लिए एक सोता बाहर न निकाल दें (17:90) या आपके पास खजूर और अंगूर का बाग़ हो जिसके बीच से आप नहरें जारी कर दें।(17:91)

    चूंकि अनेकेश्वरवादी, क़ुरआने मजीद के ईश्वरीय चमत्कार होने का इन्कार करते थे, अतः उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहा कि हम केवल उसी स्थिति में आपके ईश्वरीय पैग़म्बर होने की बात को स्वीकार करेंगे जब आप पिछले पैग़म्बरों की भांति भौतिक रूप से दिखाई देने वाले चमत्कार दिखाएंगे, जैसे सूखी ज़मीन से पानी का सोता निकाल दें या बाग़ के बीच से नहर जारी कर दें।

    सभी ईश्वरीय पैग़म्बर ईश्वर के आदेश पर और अपनी पैग़म्बरी को सिद्ध करने के लिए लोगों के समक्ष चमत्कार प्रस्तुत करते थे और ऐसा नहीं था कि लोग जिस बात की भी मांग करते वे उसे तुरंत पूरा कर देते थे, और यदि कभी ऐसा हुआ भी था तो उसी के साथ यह चेतावनी भी दी गई थी कि यदि लोगों की इच्छा पर कोई चमत्कार प्रस्तुत किया गया और बाद में उन्होंने उसका इन्कार किया तो ईश्वरीय दंड उन्हें अपनी लपेट में ले लेगा, जैसा कि हज़रत सालेह की जाति के लोगों के साथ हुआ था।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का लक्ष्य लोगों का मार्गदर्शन करना था किंतु अधिकांश लोग बड़े-2 बाग़ों, सोने और धन संपत्ति को शक्ति व महानता का चिन्ह समझते हैं तथा पैग़म्बरों के वास्तविक लक्ष्यों की ओर से निश्चेत रहते हैं।

    धार्मिक नेताओं को लोगों को आकृष्ट करने के लिए उनकी अनुचित अपेक्षाओं पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 92 और 93 की तिलावत सुनें।

    أَوْ تُسْقِطَ السَّمَاءَ كَمَا زَعَمْتَ عَلَيْنَا كِسَفًا أَوْ تَأْتِيَ بِاللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ قَبِيلًا (92) أَوْ يَكُونَ لَكَ بَيْتٌ مِنْ زُخْرُفٍ أَوْ تَرْقَى فِي السَّمَاءِ وَلَنْ نُؤْمِنَ لِرُقِيِّكَ حَتَّى تُنَزِّلَ عَلَيْنَا كِتَابًا نَقْرَؤُهُ قُلْ سُبْحَانَ رَبِّي هَلْ كُنْتُ إِلَّا بَشَرًا رَسُولًا (93)

    या अपने विचार में हमारे ऊपर आकाश को टुकड़े-2 करके गिरा दो, या ईश्वर तथा फ़रिश्तों को हमारे सामने ले आओ।(17:92) या तुम्हारे पास सोने का कोई घर हो या तुम आकाश पर चढ़ जाओ, अलबत्ता हम तुम्हारे (आसमान के) ऊपर चढ़ जाने पर भी ईमान नहीं लाएंगे जब तक तुम हमारे लिए ऐसी एक किताब न ले आओ जिसे हम पढ़ सकें। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मेरा पालनहार इन सब बातों से कहीं महान व पवित्र है और क्या मैं एक मनुष्य के अतिरिक्त कुछ हूं जिसे पैग़म्बर बनाया गया है?(17:93)

    पिछली आयतों में भी पैग़म्बर के विरोधियों की कुछ अनुचित मांगों का वर्णन किया गया था। यह आयतें उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं कि विरोधी पैग़म्बर से कहते थे कि आप जिस ईश्वरीय दंड की बात कर रहे हैं कहिए कि वह आकाश से आए और हमें तबाह कर दे या जिस ईश्वर और फ़रिश्तों के बारे में आप दावा करते हैं कि वे ईश्वरीय संदेश वहि लेकर आते हैं उन्हें धरती पर बुलाइये ताकि हम उन्हें देख सकें। या स्वयं आप आकाश की ओर चले जाइये और हमारे लिए ऐसी कोई किताब ले आइये जिसे हम पढ़ सकें।

    इस प्रकार की बातों के मुक़ाबले में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का उत्तर यह होता था कि वे स्वयं उनकी ही भांति मनुष्य और ईश्वर के बंदे हैं, अंतर यह है कि ईश्वर ने उन्हें अपना पैग़म्बर बनाया है ताकि वे उसका कथन उन तक पहुंचा सकें। पैग़म्बर कहते थे कि वे जो कुछ कह रहे हैं वह स्वयं लोगों के हित में है वे उनसे इसके बदले में अपने लिए कुछ भी नहीं चाहते।

    सैद्धांतिक रूप से चमत्कार एक ऐसा कार्य है जो बुद्धि की दृष्टि से असंभव नहीं है किंतु प्राकृतिक रूप से वह इस भौतिक संसार में नहीं होता जबकि विरोधियों की कुछ मांगें, बौद्धिक दृष्टि से असंभव थीं। उदाहरण स्वरूप उनकी यह मांग कि ईश्वर और फ़रिश्ते धरती पर आएं और लोग उन्हें देखें। क्योंकि ईश्वर व फ़रिश्ते निराकार हैं और हमारी आंखें केवल भौतिक वस्तुओं को ही देख सकती हैं बल्कि हर भौतिक वस्तु भी हमें दिखाई नहीं देती जैसे गुरुत्वाकर्षण शक्ति या वस्तुओं की चुम्बकीय विशेषता, ये दोनों ही बातें भौतिक हैं किंतु हमारी आंखें इन्हें नहीं देख सकतीं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि बहुत से लोगों की बुद्धि उनकी आंखों में होती है और जिस बात को उनकी आंखें देखती हैं, उसी को वे स्वीकार करते हैं जबकि सृष्टि में ऐसी अनेक वास्तविकताएं हैं जो आंखों से नहीं देखी जा सकतीं।

    पैग़म्बर स्वयं अपनी ओर से कोई काम नहीं करते, वे केवल ईश्वरीय आदेशों का पालन करते हैं तथा ईश्वर बिना तत्वदर्शिता एवं तर्क के कोई कार्य नहीं करता।