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    सूरए इसरा, आयतें 98-101, (कार्यक्रम 501)

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    आइये पहले सूरए इसरा की आयत नंबर 98 और 99 की तिलावत सुनें।

    ذَلِكَ جَزَاؤُهُمْ بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا بِآَيَاتِنَا وَقَالُوا أَئِذَا كُنَّا عِظَامًا وَرُفَاتًا أَئِنَّا لَمَبْعُوثُونَ خَلْقًا جَدِيدًا (98) أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ اللَّهَ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ قَادِرٌ عَلَى أَنْ يَخْلُقَ مِثْلَهُمْ وَجَعَلَ لَهُمْ أَجَلًا لَا رَيْبَ فِيهِ فَأَبَى الظَّالِمُونَ إِلَّا كُفُورًا (99)

    वह (नरक) उनका प्रतिफल है, इस कारणवश कि उन्होंने हमारी आयतों का इन्कार किया और कहा कि जब हम गली हुई हड्डियां और मिट्टी बन चुके होंगे तो क्या हमें पुनः एक नई रचना के रूप में उठाया जाएगा? (17:98) क्या वे नहीं देखते कि (जिस) ईश्वर ने निश्चित रूप से आकाशों और धरती की रचना की है, वह इस बात की क्षमता रखता है कि उन्हीं की भांति (किसी रचना की) सृष्टि कर दे और उसने उनके लिए एक समय निर्धारित कर दिया है जिसमें कोई संदेह नहीं है, तो अत्याचारी कुफ़्र के अतिरिक्त किसी बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए।(17:99)

    यह आयत प्रलय के बारे में एक सबसे पुराने प्रश्न व शंका का उत्तर देते हुए कहती है कि काफ़िर सोचते हैं कि ईश्वर की शक्ति केवल इसी संसार तक सीमित है अतः जब वे इस संसार से चले जाएंगे और उनका शरीर मिट्टी में परिवर्तित हो जाएगा तो फिर ईश्वर के पास उन्हें पुनः जीवित करने, प्रलय के न्यायालय में उनका हिसाब-किताब करने और उन्हें दंडित करने या पारितोषिक देने की शक्ति नहीं होगी जबकि मनुष्य का जीवन और मृत्यु दोनों ईश्वर ही के हाथ में है।

    उसकी शक्ति, संपूर्ण सृष्टि पर छाई हुई है और उसके लिए एक रचना की पुनः सृष्टि करना बहुत सरल है किंतु कुफ़्र एवं हठधर्म की भावना इस बात का कारण बनती है कि पापी एवं अत्याचारी लोग इस वास्तविकता का इन्कार करते हैं और उसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि इस बात को स्वीकार करने की स्थिति में वे अपने ग़लत मार्ग को जारी नहीं रख सकते।

    इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय के इन्कार का मूल कारण, ईश्वर की शक्ति को सीमित समझना है अन्यथा काफ़िरों के पास प्रलय के इन्कार का कोई तर्कसंगत कारण नहीं है।

    प्रलय में सभी लोगों को उनके शरीर और आत्मा दोनों के साथ उपस्थित किया जाएगा और फिर उन्हें उनके पापों पर दंड मिलेगा।

    कुफ़्र का मुख्य कारण पाप और अत्याचार है। पापी, पाप का मार्ग खोलने के लिए सत्य बात का इन्कार कर देता है।

    आइये अब सूरए इसरा की आयत नंबर 100 की तिलावत सुनें।

    قُلْ لَوْ أَنْتُمْ تَمْلِكُونَ خَزَائِنَ رَحْمَةِ رَبِّي إِذًا لَأَمْسَكْتُمْ خَشْيَةَ الْإِنْفَاقِ وَكَانَ الْإِنْسَانُ قَتُورًا (100)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि तुम मेरे पालनहार की दया के ख़ज़ानों के मालिक होते तो उस स्थिति में तुम ख़र्च हो जाने के भय से उन्हें रोके ही रखते। निसंदेह मनुष्य बड़ा ही कन्जूस है।(17:100)

    यह आयत कुफ़्र के एक अन्य कारण का उल्लेख करते हुए कहती है कि यदि तुम लोग संपूर्ण सृष्टि के स्वामी होते और हर वस्तु तुम्हारे नियंत्रण में होती तब भी तुम्हारा धनप्रेम व मायामोह तुम्हें इस बात की अनुमति न देता कि तुम उसमें से कुछ दूसरों को दो बल्कि तुम हर वस्तु को केवल अपने लिए ही सुरक्षित रखते।

    अलबत्ता यह प्रवृत्ति प्रायः सभी लोगों में होती है अतः जो कोई परिपूर्णता एवं विकास तक पहुंचना चाहता है उसे इस प्रवृत्ति से संघर्ष करना चाहिए ताकि उसके भीतर दान दक्षिणा और दूसरों को प्रदान करने की भावना सुदृढ़ हो। यह बात ठीक ज्ञान व अज्ञान की भांति है कि सभी मनुष्य जब इस संसार में आते हैं तो अज्ञानी होते हैं और वे अपने अथक प्रयासों से ज्ञान प्राप्त करते हैं और विकास एवं परिपूर्णता तक पहुंचते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि धन व संपत्ति का मोह, मनुष्य के भीतर कन्जूसी की भावना को बढ़ाता है और यह बात ईश्वरीय शिक्षाओं से मेल नहीं खाती। यही कारण है कि अधिकांश धनाड्य लोग, धर्म की शिक्षाओं का पालन नहीं करते।

    यद्यपि स्वाभाविक रूप से मनुष्य में कन्जूसी की भावना होती है किंतु ईश्वर ने दानी होने की क्षमता सभी के भीतर रखी है और जो भी चाहे अपने संकल्प से इस सदगुण को प्राप्त कर सकता है।

    आइए अब सूरए इसरा की आयत नंबर 101 की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ آَتَيْنَا مُوسَى تِسْعَ آَيَاتٍ بَيِّنَاتٍ فَاسْأَلْ بَنِي إِسْرَائِيلَ إِذْ جَاءَهُمْ فَقَالَ لَهُ فِرْعَوْنُ إِنِّي لَأَظُنُّكَ يَا مُوسَى مَسْحُورًا (101)

    निश्चित रूप से हमने मूसा को नौ स्पष्ट चमत्कार प्रदान किए। तो बनी इस्राईल से पूछो कि जब मूसा उनके पास आए तो (वे किस प्रकार थे और) फ़िरऔन ने उनसे कहा कि हे मूसा! मेरे विचार में अवश्य ही तुम पर जादू कर दिया गया है।(17:101)

    यह आयत और इसके बाद की कुछ आयतें, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तथा फ़िरऔन के बीच होने वाली वार्ता से संबंधित हैं जिनसे सत्य और असत्य के गुटों के विचारों तथा उनके सोचने की शैली का पता चलता है। यह आयत कहती है कि हज़रत मूसा को ईश्वर की ओर से नौ चमत्कार दिए गए थे जिनका ईश्वरीय चमत्कार होना सबके लिए स्पष्ट था। लाठी का अजगर बन जाना, लाठी मारने से नील नदी के पानी का फट जाना, पत्थर पर लाठी मारने से बारह सोतों का फूट पड़ना इत्यादि हज़रत मूसा के चमत्कार थे किंतु जब वे फ़िरऔन के पास गए तो उसने कहा कि यह सब जादू है और तुम भी दूसरे जादूगरों की ही भांति हो, और हो सकता है कि तुम पर भी जादू किया गया हो।

    यह वही अहं व घमंड की भावना है जो मनुष्य को सत्य और तर्कसंगत बात स्वीकार करने नहीं देती। फ़िरऔन भी ईश्वर पर ईमान और बनी इस्राईल को स्वतंत्र करने के संबंध में हज़रत मूसा की तर्कसंगत बात को स्वीकार करने पर तैयार नहीं हुआ और उसने उनके स्पष्ट चमत्कारों को जादू बताया बल्कि हज़रत मूसा का अनादर व परिहास भी किया।

    इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का मुख्य दायित्व चमत्कार दिखाना नहीं है कि लोग उन्हें जादूगरों के समान समझने लगें बल्कि उनका उत्तरदायित्व मनुष्यों का मार्गदर्शन करना है तथा वे केवल अपनी पैग़म्बरी को सिद्ध करने के लिए ईश्वर के आदेश से चमत्कार दिखाते हैं।

    पैग़म्बर, घरों में नहीं बैठे रहते थे कि लोग उनके पास आएं बल्कि वे हितैषी चिकित्सकों की भांति स्वयं लोगों के पास जाया करते थे।