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    सूरए कह्फ़, आयतें 1-6, (कार्यक्रम 504)

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    ईश्वर की कृपा से क़ुरआने मजीद के सत्रहवें सूरे अर्थात सूरए इसरा की आयतों की व्याख्या समाप्त हुई और अब हम अगले सूरे अर्थात सूरए कह्फ़ की आयतों की व्याख्या आरंभ करेंगे। ईश्वर की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास ये सूरा भेजने का कारण यह बताया गया है कि मक्के के अनेकेश्वरवादियों ने कुछ लोगों को मदीना नगर भेजा ताकि वे हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी और उनकी सच्चाई के चिन्हों के बारे में यहूदियों के धर्मगुरुओं से पूछें।

    यहूदी धर्मगुरुओं ने उनसे कहा कि मुहम्मद से तीन बातों, असहाबे कह्फ़ अर्थात गुफ़ा वालों, ज़ुलक़रनैन तथा रूह अर्थात आत्मा के बारे में प्रश्न करो । यदि उन्होंने प्रथम दो बातों के बारे में जो कुछ हमने कहा है, वही बताया और रूह के बारे में मौन धारण किया तो समझ लो कि वे पैग़म्बर हैं।

    जब वे लोग मक्का नगर वापस पहुंचे और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से उक्त तीन प्रश्न पूछे तो ईश्वर की ओर से यह सूरा भेजा गया। इस सूरे में असहाबे कह्फ़ और ज़ुलक़रनैन की घटना के अतिरिक्त हज़रत मूसा व हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम की घटना का भी वर्णन हुआ है। तो आइये इस सूरे की आरंभिक तीन आयतों की तिलावत सुनें।

    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَنْزَلَ عَلَى عَبْدِهِ الْكِتَابَ وَلَمْ يَجْعَلْ لَهُ عِوَجًا (1) قَيِّمًا لِيُنْذِرَ بَأْسًا شَدِيدًا مِنْ لَدُنْهُ وَيُبَشِّرَ الْمُؤْمِنِينَ الَّذِينَ يَعْمَلُونَ الصَّالِحَاتِ أَنَّ لَهُمْ أَجْرًا حَسَنًا (2) مَاكِثِينَ فِيهِ أَبَدًا (3)

    अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। समस्त प्रशंसाएं उस ईश्वर के लिए विशेष हैं जिसने इस किताब को अपने दास पर उतारा है और इसमें किसी भी प्रकार का दिशाभेद नहीं रखा। (18:1) यह एक सीधी और सटीक किताब है ताकि (बुरे कर्म करने वालों को) उसकी ओर से कड़े दंड से डराए और ईमान वालों को, जो अच्छे कर्म करते हैं, शुभ सूचना दे दे कि उनके लिए भला प्रतिफल है। (18:2) जिसमें वे सदैव रहेंगे। (18:3)

    यह सूरा, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास ईश्वरीय संदेश वहि भेजने के कारण ईश्वर के गुणगान और उसकी प्रशंसा के साथ आरंभ हुआ है ताकि हम यह सीखें कि केवल भौतिक व सांसरिक अनुकंपाओं के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञ नहीं रहना चाहिए बल्कि यह जानना चाहिए कि मार्गदर्शन की अनुकंपा सबसे बड़ी अनुकंपा है और वह भी ऐसा मार्गदर्शन जो पूर्ण रूप से संकलित व स्पष्ट रूप से मौजूद है और हर प्रकार के दिशाभेद से सुरक्षित रखा गया है। क़ुरआने मजीद एक सुदृढ़ व ठोस किताब है जो एक व्यापक धर्म पर आधारित है।

    ईश्वर ने क़ुरआने मजीद में अनेक बार इस्लाम के बारे में कहा है कि यह एक सुदृढ़ धर्म है और सबसे सीधी व टिकाऊ राह की ओर मनुष्य का मार्गदर्शन करता है। यह वही मार्ग है जो हर प्रकार की कमी और अतिशयोक्ति से परे है और पैग़म्बर स्वर्ग की शुभ सूचना देकर तथा नरक से डरा कर लोगों के बीच आशा और भय की भावना को जीवित रखते हैं ताकि धर्म में संतुलन बना रहे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद की अनुकंपा इतनी महान व महत्वपूर्ण है कि ईश्वर ने इसके लिए स्वयं की सराहना की है।

    पैग़म्बर द्वारा लोगों को स्वर्ग की शूभ सूचना देना और नरक से डराना, उनकी अपनी ओर से नहीं बल्कि क़ुरआन की ओर से है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 4 और 5 की तिलावत सुनें।

    وَيُنْذِرَ الَّذِينَ قَالُوا اتَّخَذَ اللَّهُ وَلَدًا (4) مَا لَهُمْ بِهِ مِنْ عِلْمٍ وَلَا لِآَبَائِهِمْ كَبُرَتْ كَلِمَةً تَخْرُجُ مِنْ أَفْوَاهِهِمْ إِنْ يَقُولُونَ إِلَّا كَذِبًا (5)

    और उन लोगों को डराए जो कहते हैं कि ईश्वर ने किसी को अपनी संतान बनाया है। (18:4) इस संबंध में न तो उन्हें ज्ञान है और न ही उनके पूर्वजों को ज्ञान था। यह बहुत बड़ी बात है जो उनके मुंह से निकली है वे तो झूठ के अतिरिक्त कुछ कहते ही नहीं। (18:5)

    पिछली आयतों में पैग़म्बर द्वारा लोगों को स्वर्ग की शुभ सूचना देने और नरक से डराने के बारे में बिना किसी उदाहरण के उल्लेख किया गया था किंतु इन आयतों में उनमें से एक विषय की ओर संकेत किया गया है और वह ईश्वर पर यह आरोप लगाना है कि उसने किसी को अपनी संतान बनाया है।

    यह आरोप अनेकेश्वरवादी, ईसाई और यहूदी सभी लगाते थे। अनेकेश्वरवादी, फ़रिश्तों को ईश्वर की पुत्रियां समझते थे। ईसाई हज़रत ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र तथा यहूदी एक अन्य ईश्वरीय दूत हज़रत उज़ैर को ईश्वर का पुत्र कहते थे जबकि यह आस्था न तो पवित्र आसमानी ग्रंथों से मेल खाती है और न हीं बुद्धि व तर्क की कसौटी पर खरी उतरती है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ग़लत व भ्रामक आस्थाओं से मुक़ाबला करना, ईश्वरीय पैग़म्बरों का सबसे पहला दायित्व है और सबसे पथभ्रष्ट आस्था किसी को ईश्वर का समकक्ष समझना है जबकि सबसे शुद्ध आस्था एकेश्वरवाद पर विश्वास है।

    आस्था, ज्ञान के आधार पर होनी चाहिए अन्यथा वह पथभ्रष्टता का कारण बन जाती है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 6 की तिलावत सुनें।

    فَلَعَلَّكَ بَاخِعٌ نَفْسَكَ عَلَى آَثَارِهِمْ إِنْ لَمْ يُؤْمِنُوا بِهَذَا الْحَدِيثِ أَسَفًا (6)

    तो (हे पैग़म्बर!) मानो आप इनके कार्यों के कारण अधिक दुख के चलते अपने प्राण ही ख़तरे में डाल देंगे यदि ये लोग इस बात पर ईमान न लाए। (18:6)

    यह आयत लोगों के प्रति पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की सहानुभूति को दर्शाती है। वे जब यह देखते थे कि अनेकेश्वरवादी ईश्वर के सत्य कथन पर ईमान न लाकर उससे दूर हुए जा रहे हैं तो उन्हें बहुत दुख होता था। यद्यपि पैग़म्बर का दायित्व केवल ईश्वरीय संदेश को लोगों तक पहुंचा देना है और वे उन्हें सत्य बात को स्वीकार करने पर विवश नहीं कर सकते किंतु जब वे यह देखते थे कि अधिकांश लोग ईमान नहीं लाते तो वे बहुत अधिक दुखी हो जाते थे, यहां तक कि उनकी जान को ख़तरा हो जाता था।

    वे केवल अपने दायित्व के पालन के लिए नहीं बल्कि लोगों के मार्गदर्शन के प्रति अपने प्रेम व सहानुभूति के कारण उन्हें सही मार्ग पर लाने का प्रयास करते थे किंतु जब उनके प्रयास विफल हो जाते तो उन्हें लगता कि उनका कोई अत्यंत निकटवर्ती परिजन तबाह हो रहा है, जिससे वे व्याकुल हो जाते थे।

    इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों के मार्गदर्शन के प्रति सहानुभूति और उनके पथभ्रष्ट होने पर दुखी होना, एक मूल्यवान बात है और ईश्वरीय पैग़म्बर मानव जाति में सबसे अधिक सहानुभूति रखने वाले लोग थे।

    धार्मिक नेताओं और धर्म के प्रचारकों को सदैव ही लोगों की आस्थाओं और कर्मों में सुधार के लिए प्रयास करना चाहिए, चाहे उनके प्रयास सफल हों या न हों।