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    सूरए कह्फ़, आयतें 102-106, (कार्यक्रम 524)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 102 की तिलावत सुनें।

    أَفَحَسِبَ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنْ يَتَّخِذُوا عِبَادِي مِنْ دُونِي أَوْلِيَاءَ إِنَّا أَعْتَدْنَا جَهَنَّمَ لِلْكَافِرِينَ نُزُلًا (102)

    क्या काफ़िरों ने यह समझ रखा है कि वे मेरे स्थान पर मेरे बंदों को अपना अभिभावक बना लेंगे? निश्चित रूप से हमने नरक को काफ़िरों के लिए तैयार कर रखा है? (18:102)

    इससे पहले काफ़िरों तथा नरकवासियों की कुछ विशेषताओं का वर्णन किया गया था। यह आयत उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि क्या जिन लोगों ने सत्य का इन्कार कर दिया है और सत्य को देखने व सुनने तक के लिए तैयार नहीं हैं, उन्होंने यह समझ रखा है कि यदि वे ईश्वर के स्थान पर उसके बंदों की शरण में चले जाएंगे तो वे उन्हें मुक्ति प्रदान कर देंगे और उनकी समस्याओं का समाधान कर देंगे?

    उन्होंने किस तर्क से ईश्वर को छोड़ कर उसकी रचनाओं की उपासना आरंभ कर दी है? जिस दिन वे यह देखेंगे कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य सुरक्षित शरण नहीं है उस दिन वे स्वयं को कितना धिक्कारेंगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर तथा प्रलय के इन्कार के लिए काफ़िरों के पास कोई सही तर्क नहीं है और उन्होंने केवल अपने विचारों और कल्पनाओं के आधार पर इस मार्ग का चयन किया है।

    कुफ़्र, केवल ईश्वर के इन्कार को नहीं कहते, बल्कि ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य को अपना स्वामी समझना भी एक प्रकार का कुफ़्र ही है क्योंकि ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य को उसके स्थान पर नहीं रखा जा सकता।

    आइये अब सूरए कहफ़ की आयत नंबर 103 और 104 की तिलावत सुनें।

    قُلْ هَلْ نُنَبِّئُكُمْ بِالْأَخْسَرِينَ أَعْمَالًا (103) الَّذِينَ ضَلَّ سَعْيُهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَهُمْ يَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ يُحْسِنُونَ صُنْعًا (104)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि क्या मैं तुम्हें इस बात की सूचना दूं कि कौन सबसे अधिक घाटा उठाने वाला है? (18:103) वे लोग, सांसारिक जीवन में जिनके प्रयास निरर्थक हैं और वे सोचते हैं कि वे बड़े भले कर्म कर रहे हैं। (18:104)

    ये आयतें उन लोगों की ओर संकेत करती हैं जो इस विचार में रहते हैं कि इस संसार में उनके कार्य अच्छे और भले रहे हैं, चाहे वे आसमानी किताब वाले हों, जो ग़लत धारणाओं और अंधविश्वासों में ग्रस्त हो गए हैं, अथवा वे मुसलमान हों जो सही मार्ग से विचलित हो गए हैं और उन्होंने अक्षम लोगों की अभिभावकता को स्वीकार कर लिया है।

    मनुष्य के समक्ष सदैव जो ख़तरे होते हैं उनमें से एक यह है कि वह अपने कार्यों को अच्छा समझने लगे और यह सोचे कि उसे मुक्ति एवं कल्याण प्राप्त होगा किंतु जब पर्दे हट जाएंगे तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि वह निश्चेतना एवं घमंड में ग्रस्त था और उसके सभी प्रयास व कर्म अकारथ हो गए हैं।

    स्पष्ट है कि इस प्रकार के लोगों को भारी घाटा हुआ है क्योंकि वे संसार तथा सांसारिक आनंदों से भी वंचित रहे हैं और प्रलय में भी उन्हें स्वर्ग तथा स्थाई अनुकंपाएं प्राप्त नहीं हुई हैं।

    ये आयतें मनुष्य को ग़लत धारणाओं और सत्य के प्रति निश्चेतना के ख़तरों की ओर से सचेत करती हैं और उसे सावधान करती हैं कि निराधार एवं खोखले विचारों व कल्पनाओं में ग्रस्त न हो, तथा बुद्धि व ईश्वरीय संदेश वहि पर भरोसा किए बिना कोई कार्य न करे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि अधिक प्रयास से मनुष्य को मुक्ति प्राप्त नहीं होती, महत्वपूर्ण बात मार्ग की सही पहचान तथा भले कर्म करने में ईश्वरीय प्रेरणाओं का होना है।

    हमें कल्पनाओं पर विश्वास करने के स्थान पर सत्य को स्वीकार करने वाला बनना चाहिए। हमें अपनी कल्पनाओं पर बहुत अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि इस बात की काफ़ी संभावना है कि हमारी कल्पनाएं, सत्य के अनुसार न हों।

    आइये अब सूरए कहफ़ की आयत नंबर 105 और 106 की तिलावत सुनें।

    أُولَئِكَ الَّذِينَ كَفَرُوا بِآَيَاتِ رَبِّهِمْ وَلِقَائِهِ فَحَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فَلَا نُقِيمُ لَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَزْنًا (105) ذَلِكَ جَزَاؤُهُمْ جَهَنَّمُ بِمَا كَفَرُوا وَاتَّخَذُوا آَيَاتِي وَرُسُلِي هُزُوًا (106)

    ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने पालनहार की निशानियों और (प्रलय में) उससे भेंट को झुठलाया तो उनके सारे कर्म अकारथ हो गए। तो हम प्रलय में उनके लिए कोई तूलिका नहीं स्थापित करेंगे। (18:105) उन्होंने जो कुफ़्र अपनाया और मेरी निशानियों तथा पैग़म्बरों का जो परिहास किया उसके लिए उनका बदला नरक है। (18:106)

    ये आयतें उन लोगों का अंजाम नरक बताती है जिनकी आस्था या कर्म या दोनों ही में समस्याएं थीं क्योंकि इस प्रकार के लोगों के कार्य विदित रूप से और स्वयं उनकी दृष्टि में तो भले थे किंतु प्रलय में ईश्वर के हिसाब-किताब की दृष्टि से उनका कोई महत्व नहीं है अतः इस बात की कोई आवश्यकता ही नहीं है कि उनका हिसाब-किताब किया जाए।

    कर्मों का अकारथ या तबाह होना, एक ऐसा ख़तरा है जो सदैव भले कर्म करने वालों के समक्ष मौजूद रहता है। कुफ़्र और सत्य का इन्कार, कर्मों की बर्बादी के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक है। उस व्यक्ति की भांति जिसने एक लम्बे समय तक अपने मालिक के पास काम किया किंतु अंतिम समय में उसे बुरा भला कह कर उससे अलग हो गया। उसका यही बुरा व्यवहार उसकी दसियों वर्ष की सेवा को बर्बाद कर देता है और उसके लिए कुछ बाक़ी नहीं बचता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि कर्मों के विदित रूप को नहीं देखना चाहिए क्योंकि संभव है कि वे हमें बहुत बड़े और सुंदर दिखाई दें किंतु भीतर से खोखले और महत्वहीन हों। भीतर से ख़ाली ढोल की भांति जिसकी आवाज़ बहुत ऊंची और कानों को बुरी लगने वाली होती है।

    ईश्वर के इन्कार और पैग़म्बरों व ईश्वरीय निशानियों के परिहास का परिणाम, सभी अच्छे कर्मों के बर्बाद होने के रूप में निकलता है।

    मनुष्य का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि संसार में उसका अंत कैसा होता है।