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    सूरए कह्फ़, आयतें 107-110, (कार्यक्रम 525)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 107 और 108 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ كَانَتْ لَهُمْ جَنَّاتُ الْفِرْدَوْسِ نُزُلًا (107) خَالِدِينَ فِيهَا لَا يَبْغُونَ عَنْهَا حِوَلًا (108)

    निश्चित रूप से जो लोग ईमान लाए और भले कर्म करते रहे उनके सत्कार के लिए स्वर्ग के बाग़ उनका ठिकाना होंगे (18:107) जिनमें वे सदैव रहेंगे (और) वहां से कहीं और नहीं जाना चाहेंगे। (18:108)

    इससे पहले कुफ़्र अपनाने और सत्य के इन्कार के परिणाम का वर्णन किया गया। पिछली आयतों में मनुष्यों के इस गुट के नरक में जाने और उसके कर्मों के अकारत होने की बता कही गई थी। ये आयतें काफ़िरों के विपरीत गुट अर्थात अच्छे कर्म करने वाले मोमिनों की ओर संकेत करते हुए कहती है कि हृदय से ईमान और भले कर्म मनुष्य को स्वर्ग का अतिथि बना देते हैं। वह स्वर्ग जो भले कर्म करने वाले व पवित्र लोगों का स्थायी ठिकाना है और जिसमें किसी भी प्रकार की कमी, दुख व त्रुटि नहीं है ताकि स्वर्ग वालों को किसी अन्य व बेहतर ठिकाने के बारे में सोचना न पड़े।

    पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कथनानुसार स्वर्ग के कई दर्जे हैं और उसके सबसे उच्च दर्जे का नाम फ़िरदौस है जिसकी ओर इन आयतों में संकेत किया गया है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि स्वर्ग दावे के बदले में नहीं अपितु कर्मों के बदले में दिया जाता है। स्वर्ग में प्रवेश के लिए ईमान और भले कर्म दोनों की आवश्यकता है। कर्म के बिना ईमान स्वीकार्य नहीं है और कर्म चाहे भला ही क्यों न हो यदि ईश्वर पर ईमान के साथ न हो तो प्रलय तक नहीं पहुंचेगा।

    स्वर्ग की व्यापकता तथा उसकी अनुकंपाओं की विविधता इतनी अधिक है कि स्वर्ग में रहने वाले कभी भी उनसे ऊबेंगे नहीं और किसी बेहतर ठिकाने की खोज में नहीं रहेंगे।

    आइये अब कह्फ़ की आयत नंबर 109 की तिलावत सुनें।

    قُلْ لَوْ كَانَ الْبَحْرُ مِدَادًا لِكَلِمَاتِ رَبِّي لَنَفِدَ الْبَحْرُ قَبْلَ أَنْ تَنْفَدَ كَلِمَاتُ رَبِّي وَلَوْ جِئْنَا بِمِثْلِهِ مَدَدًا (109)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि मेरे पालनहार के शब्दों (को लिखने) के लिए समुद्र, सियाही बन जाए तो इससे पूर्व कि मेरे पालनहार के शब्द समाप्त हों, समुद्र समाप्त हो जाएगा, चाहे उस जैसे ही (समुद्र) को सहायता के लिए ले आएं। (18:109)

    सूरए कह्फ़ के अंत में और असहाबे कह्फ़, हज़रत मूसा व ख़िज़्र तथा हज़रत ज़ुलक़रनैन की घटनाओं के वर्णन के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहा गया है कि वे लोगों को, चाहे वे मुसलमान हों अथवा काफ़िर, दो बातें बता दें। इसी कारण इस आयत और अगली आयत के आरंभ में जो इस सूरे की अंतिम आयत है, क़ुल शब्द आया है, अर्थात हे पैग़म्बर आप कह दीजिए।

    यद्यपि यह शब्द न भी होता तब भी स्पष्ट है कि पैग़म्बर अपनी ओर से कोई बात नहीं कहते और क़ुरआने मजीद पूरा का पूरा ईश्वरीय कथन है जो पैग़म्बरे इस्लाम के हृदय पर उतरा है और उनके द्वारा लोगों तक पहुंचाया गया है।

    यह आयत कहती है कि ईश्वर के शब्द की गणना नहीं की जा सकती और मनुष्य की कल्पना से परे हैं, इस प्रकार से कि यदि समुद्र का पानी सियाही बन जाए तब भी उन सभी शब्दों को लिखना संभव नहीं है। समुद्र का पानी समाप्त हो जाएगा किंतु ईश्वरीय शब्द समाप्त नहीं होंगे। यहां प्रश्न यह उठता है कि ईश्वरीय शब्दों से तात्पर्य क्या है?

    स्पष्ट है कि इस सृष्टि की सभी रचनाएं, चाहे वे अणु का छोटे से छोटा कण हों या महान आकाश गंगाएं, सबकी सब ईश्वर के अस्तित्व की निशानी और सृष्टि की पुस्तक के शब्द हैं। सभी आसमानी किताबें और ईश्वरीय संदेश वहि के माध्यम से पैग़म्बरों के पास भेजे गए संदेश, ईश्वरीय शब्द हैं और दूसरे शब्दों में जिसमें भी ईश्वर का चिन्ह हो वह ईश्वरीय शब्द है। अतः क़ुरआने मजीद के शब्दों में हज़रत ईसा मसीह, ईश्वरीय शब्द हैं क्योंकि वे लोगों के बीच ईश्वरीय चमत्कारों में से एक हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि संपूर्ण सृष्टि, ईश्वरीय शब्द और ब्रह्मांड के रचयिता की निशानी है। यदि मनुष्य की आंखें और कान इन शब्दों को देखें और सुनें तो विकास व परिपूर्णता के मार्ग पर इनसे लाभ उठाया जा सकता है।

    मनुष्य के ज्ञान में जितना विस्तार होता जाता है उतना ही उसके समक्ष अज्ञात व अपरिचित बातें आती रहती हैं तथा वह कभी भी ज्ञान की अंतिम सीमा तक नहीं पहुंचता।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 110 की तिलावत सुनें।

    قُلْ إِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ مِثْلُكُمْ يُوحَى إِلَيَّ أَنَّمَا إِلَهُكُمْ إِلَهٌ وَاحِدٌ فَمَنْ كَانَ يَرْجُوا لِقَاءَ رَبِّهِ فَلْيَعْمَلْ عَمَلًا صَالِحًا وَلَا يُشْرِكْ بِعِبَادَةِ رَبِّهِ أَحَدًا (110)

    (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि निःसंदेह मैं तो तुम्हारी ही भांति एक मनुष्य हूं, (अंतर यह है कि) मेरे पास (ईश्वर का विशेष संदेश) वहि आती है कि निश्चित रूप से तुम्हारा ईश्वर, वही अनन्य ईश्वर है। तो जो कोई अपने पालनहार से मिलने की आशा रखता है, उसे भले कर्म करने चाहिए और अपने पालनहार की उपासना में किसी को भी सहभागी नहीं बनाना चाहिए। (18:110)

    इस आयत में, जो सूरए कह्फ़ की अंतिम आयत है, पैग़म्बरे इस्लाम से कहा गया है कि वे स्पष्ट रूप से इस बात की घोषणा कर दें कि वे अन्य लोगों की भांति ही एक मनुष्य हैं किंतु उनके व अन्य लोगों के बीच अंतर यह है कि ईश्वर उनके पास अपना विशेष संदेश वहि भेजता है और उन्हें ईश्वरीय संदेश को लोगों तक पहुंचाने का दायित्व दिया गया है। यह संदेश अनेकेश्वरवाद व मूर्तिपूजा से दूरी और भले कर्म करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यदि वे ये काम करें अर्थात अनेकेश्वरवाद से दूर रहें और भले कर्म करें तो प्रलय में ईश्वर की कृपा का पात्र बनेंगे और स्वर्ग में जाएंगे।

    इस आयत में एकेश्वरवाद के पालन और अनेकेश्वरवाद से दूरी पर बल दिया गया है ताकि ईमान वालों को कर्म में निष्ठा का निमंत्रण दिया जा सके और उन्हें दिखावे से रोका जा सके जो एक प्रकार का अनेकेश्वरवाद ही है।

    इस आयत से हमने सीखा कि हमें कभी भी स्वयं को वैसा नहीं दर्शाना चाहिए जैसे हम नहीं हैं। पैग़म्बरों ने भी स्वयं को परामानव नहीं बल्कि मनुष्य ही बताया है। और यह बात उनके लिए परिपूर्णता समझी जाती है क्योंकि मनुष्य ही दूसरे मनुष्यों के लिए आदर्श बन सकता है, फ़रिश्ते या अन्य जीव नहीं।

    बिना भले कर्मों के स्वर्ग की आशा रखना एक अनुचित आशा है। वास्तविक आशा, मनुष्य के प्रयासों और परिश्रमों में प्रकट होती है।