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    सूरए कह्फ़, आयतें 11-14, (कार्यक्रम 506)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 11 और 12 की तिलावत सुनें।

    فَضَرَبْنَا عَلَى آَذَانِهِمْ فِي الْكَهْفِ سِنِينَ عَدَدًا (11) ثُمَّ بَعَثْنَاهُمْ لِنَعْلَمَ أَيُّ الْحِزْبَيْنِ أَحْصَى لِمَا لَبِثُوا أَمَدًا (12)

    तो हमने गुफा में कई वर्षों तक के लिए उनके कानों पर (नींद के) पर्दे डाल दिए। (18:11) फिर हमने उन्हें उठाया ताकि यह जान लें कि उन दोनों में से कौन से गुट को अपने ठहरने की अवधि अधिक ज्ञात है। (18:12)

    इससे पहले हमने कहा था कि ईमान वालों का एक गुट अपने ईमान व आस्था की रक्षा के लिए अपना घर-बार छोड़ कर अपने नगर से बाहर निकला और एक गुफा में जीवन बिताने लगा। उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उनके लिए मुक्ति का कोई मार्ग उत्पन्न करे। ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर ने वर्षों तक उन पर निद्रा व्याप्त कर दी।

    रोचक बात यह है कि ईश्वर, यह कहने के स्थान पर कि उसने उनकी आंखों पर निद्रा व्याप्त कर दी, कहता है कि उसने उनके कानों पर नींद का पर्दा डाल दिया। शायद इसका कारण यह हो कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से सोता है किंतु जो बात उसके जागने का कारण बनती है वह हो हल्ला है अतः ईश्वर ने उनके कानों से सुनने की क्षमता ले ली ताकि बाहरी कारक उन्हें नींद से न जगाएं।

    आगे चलकर आयत कहती है कि जब उन्हें जगाया गया तो उनके बीच इस बात में मतभेद हो गया कि वे कितनी अवधि तक सोए थे। इस संबंध में अगली आयतों में अधिक ब्योरा दिया गया है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि यदि मनुष्य ईश्वर के लिए कार्य करे तो ईश्वर उसे अपने उचित सहायता व कृपा का पात्र बनाता है, चाहे मनुष्य जाग रहा हो या सो रहा हो।

    ईश्वर हर वस्तु और हर व्यक्ति के बारे में संपूर्ण ज्ञान रखता है और सभी मामलों से अवगत है, चाहे लोग अपने व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन के मामलों को समझने में एक दूसरे से मतभेद रखते हों।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 13 और 14 की तिलावत सुनें।

    نَحْنُ نَقُصُّ عَلَيْكَ نَبَأَهُمْ بِالْحَقِّ إِنَّهُمْ فِتْيَةٌ آَمَنُوا بِرَبِّهِمْ وَزِدْنَاهُمْ هُدًى (13) وَرَبَطْنَا عَلَى قُلُوبِهِمْ إِذْ قَامُوا فَقَالُوا رَبُّنَا رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَنْ نَدْعُوَ مِنْ دُونِهِ إِلَهًا لَقَدْ قُلْنَا إِذًا شَطَطًا (14)

    हम उनकी घटना पूरी सत्यता के साथ आपको बताते हैं कि वे कुछ साहसी युवा थे जो अपने पालनहार पर ईमान लाए थे और हमने उनके मार्गदर्शन में वृद्धि कर दी थी। (18:13) और हमने उनके हृदयों को सुदृढ़ बना दिया जब वे उठे तो उन्होंने कहा कि हमारा पालनहार (ही) आकाशों और धरती का पालनहार है। हम उसके अतिरिक्त किसी अन्य को ईश्वर के रूप में न पुकारेंगे कि यदि हमने ऐसा किया तो हमने बहुत ग़लत बात कही। (18:14)

    असहाबे कह्फ़ के संक्षिप्त वर्णन के पश्चात ईश्वर उनके पलायन की घटना का विस्तार से वर्णन करता है। आरंभ में वह पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहता है कि संभव है कि इन लोगों के बारे में जनता के बीच विभिन्न प्रकार की बातें प्रचलित हों किंतु जो कुछ इस बारे में ईश्वर की ओर से कहा जा रहा है वही सत्य है और वास्तविकता को बयान करता है।

    यह बात महत्वपूर्ण नहीं है कि वे कितने लोग थे, कितनी आयु के थे और किस काल में जीवन व्यतीत कर रहे थे बल्कि महत्वपूर्ण बात यह है कि वे ईश्वर पर ईमान रखते थे और अपने ईमान पर अडिग थे। अतः ईश्वर ने भी उनके मार्गदर्शन में वृद्धि की तथा उनकी आत्मा और हृदयों को इस विशेष मार्गदर्शन से सुदृढ़ बना दिया ताकि वे कठिनाइयों और संकटों के मुक़ाबले में डटे रहें तथा भौतिक आराम के लिए वास्तविक जीवन को न छोड़ दें।

    मूल रूप से भ्रष्ट समाज में तीन प्रकार के लोग होते हैं। एक वह होते हैं जो सबके साथ मिल जाते हैं, उनकी अपनी कोई इच्छा शक्ति नहीं होती और न ही वे व्यवहार में स्वतंत्र होते हैं।

    दूसरे प्रकार के लोग स्वयं को समाज की पथभ्रष्टता से दूर रखते हैं और इस बात की अनुमति नहीं देते कि समाज की बुराई उनके भीतर घर कर जाए।

    तीसरे प्रकार के लोग भ्रष्ट समाज को परिवर्तित कर देते हैं और पैग़म्बरों व इमामों की भांति समाज में सुधार करते हैं।

    असहाबे कह्फ़ दूसरे प्रकार के लोगों में से थे और उन्होंने बुरे समाज में रहने और उसके रंग में रंगने के स्थान पर अपने धर्म व ईमान की रक्षा के लिए क़दम उठाया और इस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को सहन किया।

    अलबत्ता उन्होंने अपनी आस्था को प्रकट करने में संकोच नहीं किया और खुल कर अनेकेश्वरवाद और मूर्ति पूजा के ग़लत होने पर बल दिया और एकेश्वरवाद को अपने ईमान व विचारधारा का आधार बताया। उन्होंने ईश्वरीय मार्ग के अतिरिक्त हर मार्ग को ग़लत बताया।

    प्रत्येक दशा में क़ुरआने मजीद की प्रशिक्षण प्रणालियों में से एक आगामी पीढ़ियों के पाठ सीखने के लिए अतीत के लोगों के इतिहास का वर्णन है। इसी कारण क़ुरआने मजीद का एक बड़ा भाग पिछली जातियों की घटनाओं के वर्णन पर आधारित है, अलबत्ता लेखकों और कवियों के मन की उपज काल्पनिक कहानियां नहीं बल्कि वास्तविक घटनाएं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर द्वारा पिछली जातियों की घटनाओं का वर्णन, शिक्षा व प्रशिक्षण में सच्ची कहानियों के महत्व को दर्शाता है।

    ईमान के मार्ग पर चलने और इस मार्ग में प्रयास करने से ईश्वरीय समर्थन और मार्गदर्शन प्राप्त होता है कि जो ईमान में वृद्धि का कारण बनता है।

    अत्याचारियों और पथभ्रष्टों के मुक़ाबले में डटने के लिए सुदृढ़ ईमान और मज़बूत हृदय की आवश्यकता होती है और ऐसी शक्ति, ईश्वरीय कृपा के बिना संभव नहीं है।