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    सूरए कह्फ़, आयतें 15-17, (कार्यक्रम 507)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 15 की तिलावत सुनें।

    هَؤُلَاءِ قَوْمُنَا اتَّخَذُوا مِنْ دُونِهِ آَلِهَةً لَوْلَا يَأْتُونَ عَلَيْهِمْ بِسُلْطَانٍ بَيِّنٍ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا (15)

    (उन्होंने कहा) यह हमारी जाति (वाले) हैं जिन्होंने उस (अनन्य ईश्वर) के अतिरिक्त दूसरे पूज्य बना लिए हैं। ये लोग अपने इन ईश्वरों के लिए कोई ठोस तर्क क्यों नहीं लाते? तो उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा जो (अनन्य) ईश्वर पर झूठा आरोप लगाए? (18:15)

    इससे पहले हमने कहा था कि असहाबे कह्फ़ कुछ मोमिन लोगों का एक गुट था जो अपने धर्म की रक्षा के लिए अपना घर-बार और नगर छोड़ कर एक गुफा में शरण लेने पर विवश हो गया था। यह आयत उनकी बातों को उद्धरित करती है जो उन्होंने एक दूसरे से की थीं और किसी परिणाम तक पहुंचे थे। वे इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि यद्यपि उनका जन्म इस जाति में हुआ है और वे इससे संबंधित हैं किंतु वे अपने पूर्वजों के धर्म को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि उनकी जाति के लोग बिना किसी स्पष्ट तर्क के दूसरों को ईश्वर का समकक्ष ठहराते हैं जबकि ईश्वर का कोई समकक्ष नहीं हो सकता।

    वस्तुतः उनकी जाति के लोग ईश्वर के संबंध में निराधार बातें करते हैं और उस पर झूठा आरोप लगाते हैं। ये अनुचित बातें असहाबे कह्फ़ के लिए स्वीकार्य नहीं थीं और वे अपनी जाति के लोगों की इस पथभ्रष्ठता से दुखी व चिंतित थे।

    इस आयत से हमने सीखा कि जातीय व सांप्रदायिक संबंध, न तो अनुचित आस्थाओं को स्वीकार करने का औचित्य बन सकते हैं और न ही अनुचित संबंधों का कारण बन सकते हैं।

    झूठ स्वयं ही बहुत बड़ा अत्याचार है और यदि कोई ईश्वर के संबंध में झूठ बोले तो स्वाभाविक रूप से वह सबसे बड़ा अत्याचारी होगा।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 16 की तिलावत सुनें।

    وَإِذِ اعْتَزَلْتُمُوهُمْ وَمَا يَعْبُدُونَ إِلَّا اللَّهَ فَأْوُوا إِلَى الْكَهْفِ يَنْشُرْ لَكُمْ رَبُّكُمْ مِنْ رَحْمَتِهِ وَيُهَيِّئْ لَكُمْ مِنْ أَمْرِكُمْ مِرفَقًا (16)

    और (याद करो उस समय को) जब तुम लोग अनेकेश्वरवादियों और जिनकी वे ईश्वर को छोड़ कर उपासना किया करते थे उनसे दूर हो गए और गुफा में शरण ली ताकि तुम्हारा ईश्वर तुम्हारे लिए अपनी दया को (अधिक) फैला दे और अपनी दया से तुम्हारे मामले को सरल बना दे। (18:16)

    असहाबे कह्फ़ आपस में और अपने परिजनों से बात करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि न तो वे अपनी जाति के लोगों की आस्थाओं को सुधार सकते हैं और न ही उस पथभ्रष्ट समाज में अपने धर्म की रक्षा कर सकते हैं। इसी कारण उन्होंने निर्णय किया कि वे उन लोगों और उस नगर से दूर चले जाएंगे।

    उस समय उनके वैचारिक नेता ने कहा कि अब जबकि तुम लोग इन मूर्तियों और मूर्ति पूजा करने वालों से दूर जाना चाहते हो तो इस गुफा में शरण ले लो ताकि ईश्वर तुम्हारे मामले में सरलता पैदा कर दे।

    इस आयत से हमने सीखा कि अपने धर्म और आस्था की रक्षा के लिए पथभ्रष्ट समाज से पलायन करना आवश्यक है, चाहे इसके लिए भौतिक संभावनाओं से वंचित ही क्यों न होना पड़े। अनेकेश्वरवाद की छाया में गुफा में रहना, अनेकेश्वरवाद के वातावरण में नगर में रहने से उत्तम है।

    ईश्वर के मार्ग में प्रयास व प्रयत्न, ईश्वरीय दया व सरलता का मार्ग प्रशस्त करता है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 17 की तिलावत सुनें।

    وَتَرَى الشَّمْسَ إِذَا طَلَعَتْ تَزَاوَرُ عَنْ كَهْفِهِمْ ذَاتَ الْيَمِينِ وَإِذَا غَرَبَتْ تَقْرِضُهُمْ ذَاتَ الشِّمَالِ وَهُمْ فِي فَجْوَةٍ مِنْهُ ذَلِكَ مِنْ آَيَاتِ اللَّهِ مَنْ يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِ وَمَنْ يُضْلِلْ فَلَنْ تَجِدَ لَهُ وَلِيًّا مُرْشِدًا (17)

    और तुम देखोग कि जब सूर्य उदय करता है तो उनकी गुफा की दाहिनी ओर झुकता है और जब अस्त होता है तो बाईं और झुक जाता है और वे इस गुफा के एक बड़े भाग में (आराम कर रहे) हैं। यह ईश्वर की निशानियों में से है। मार्गदर्शित वही है जिसका मार्गदर्शन ईश्वर करे और जिसे ईश्वर पथभ्रष्ट बना दे उसके लिए कदापि तुम्हें कोई सहायक और मार्गदर्शक नहीं मिलेगा। (18:17)

    यह आयत असहाबे कह्फ़ की गुफा की भौगोलिक विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उसे एक ईश्वरीय निशानी बताती है क्योंकि वह गुफा एक ऐसे स्थान पर स्थित है कि कभी भी सूर्य का प्रकाश उसके भीतर तक नहीं पहुंचता और असहाबे कह्फ़ को सूर्य के प्रकाश से यातना नहीं पहुंचती। यह बात तीन सौ वर्षों की नींद हेतु उनके शरीर के स्वस्थ व सुरक्षित रहने के लिए आवश्यक थी।

    इस संबंध में कई कथन हैं कि असहाबे कह्फ़ जिस गुफा में हैं, वह कहां पर स्थित है किंतु दो कथन अधिक विख्यात हैं, पहला यह कि यह गुफा सीरिया के दमिश्क़ नगर के निकट स्थित है और दूसरा यह कि जार्डन की राजधानी अम्मान के निकट कि जिसके साथ ही एक मस्जिद भी बनाई गई है।

    प्रत्येक दशा में असहाबे कह्फ़ की गुफा की भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण उनका कार्य है कि उन्होंने अपने ऐश्वर्यपूर्ण जीवन और अपने नगर को छोड़ कर गुफा की ओर पलायन किया तथा ईश्वर के विशेष मार्गदर्शन का पात्र बने। इसी कारण आयत के अंत में कहा गया है कि मार्गदर्शन व पथभ्रष्टता ईश्वर के हाथ में है किंतु वह मनुष्य द्वारा किए जाने वाले प्रयास और चुने जाने वाले मार्ग के आधार पर ही होता है।

    जैसा कि असहाबे कह्फ़ ने मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहा तो ईश्वर ने उनका मार्गदर्शन कर दिया किंतु उनकी पथभ्रष्ट जाति ने अनेकेश्वरवाद को छोड़ना नहीं चाहा तो ईश्वर ने भी उसे अपने मार्गदर्शन से वंचित कर दिया और उसे उसकी स्थिति पर छोड़ दिया।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय सहायता ने, असहाबे कह्फ़ के लिए उचित स्थान खोजने और वहां रहने का मार्ग प्रशस्त कर दिया जिससे वे विभिन्न ख़तरों से सुरक्षित रहे।

    जिस स्थान पर भी ईश्वर के प्रिय बंदे पहुंच जाए और वह ईश्वरीय शक्ति के सामने आने का चिन्ह बन जाए तो वह स्थान लोगों के पाठ सीखने के लिए एक निशानी बन जाता है।