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    सूरए कह्फ़, आयतें 18-21, (कार्यक्रम 508)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 18 की तिलावत सुनें।

    وَتَحْسَبُهُمْ أَيْقَاظًا وَهُمْ رُقُودٌ وَنُقَلِّبُهُمْ ذَاتَ الْيَمِينِ وَذَاتَ الشِّمَالِ وَكَلْبُهُمْ بَاسِطٌ ذِرَاعَيْهِ بِالْوَصِيدِ لَوِ اطَّلَعْتَ عَلَيْهِمْ لَوَلَّيْتَ مِنْهُمْ فِرَارًا وَلَمُلِئْتَ مِنْهُمْ رُعْبًا (18)

    और तुम्हारा विचार है कि वे लोग जागे हुए हैं जबकि वे सोए हुए हैं और हम उन्हें दाहिनी और बाईं ओर करवट भी बदलवा रहे हैं और उनका कुत्ता गुफा के मुहाने पर पैर फैलाए हुए (बैठा) है। यदि तुम उनकी स्थिति देख लेते तो उलटे पांव भाग जाते और तुम्हारे पूरे अस्तित्व पर भय छा जाता। (18:18)

    इससे पहले हमने कहा कि ईश्वर ने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि अपने धर्म व आस्था की रक्षा के लिए गुफा में शरण लेने वाले लोग, सो जाएं और उनके कानों तक कोई आवाज़ ही न पहुंचे कि वे जाग सकें। यह आयत कहती है कि वे ऐसी स्थिति में सोए थे कि उनकी आंखें खुली हुई थीं और जो कोई भी उन्हें देखता तो उसे यही लगता कि वे जाग रहे हैं किंतु बातें नहीं सुन पा रहे हैं।

    प्रत्येक दशा में वे ऐसे हो गए थे कि यदि कोई निकट से उन्हें देखता तो डर कर भाग जाता। ऐसा शायद इस लिए किया गया था कि कोई उन्हें क्षति न पहुंचा सके और और उनका जीवन हर प्रकार के ख़तरे से सुरक्षित रहे।

    आगे चलकर आयत कहती है कि उनके शरीर को सुरक्षित रखने के लिए निरंतर उनकी करवटें बदलवाई जाती थीं ताकि उनकी पीठ और कमर में घाव न होने पाए। दूसरी ओर उनकी रखवाली करने वाला कुत्ता गुफा के बाहर बैठा रखवाली कर रहा था और वह इस प्रकार से बैठा हुआ था कि किसी में भी गुफा के निकट जाने का साहस न होता। प्रत्येक दशा में असहाबे कह्फ़ के शरीर और जीवन की रक्षा के लिए ईश्वर की ओर से हर प्रकार का प्रबंध किया गया था ताकि आने वाली पीढ़ियां उनसे पाठ सीख सकें।

    इस आयत से हमने सीखा कि यदि ईश्वर चाहे तो एक गुफा में मकड़ी के जाले के माध्यम से शत्रुओं से अपने पैग़म्बर की रक्षा कर सकता है और दूसरी गुफा में ईमान वालों को उनके कुत्ते के माध्यम से सुरक्षित रख सकता है।

    ईश्वर की एक अनुकंपा, नींद में मनुष्य का करवट लेना है और यह काम अनचाहे ढंग से होता रहता है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 19 और 20 की तिलावत सुनें।

    وَكَذَلِكَ بَعَثْنَاهُمْ لِيَتَسَاءَلُوا بَيْنَهُمْ قَالَ قَائِلٌ مِنْهُمْ كَمْ لَبِثْتُمْ قَالُوا لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ قَالُوا رَبُّكُمْ أَعْلَمُ بِمَا لَبِثْتُمْ فَابْعَثُوا أَحَدَكُمْ بِوَرِقِكُمْ هَذِهِ إِلَى الْمَدِينَةِ فَلْيَنْظُرْ أَيُّهَا أَزْكَى طَعَامًا فَلْيَأْتِكُمْ بِرِزْقٍ مِنْهُ وَلْيَتَلَطَّفْ وَلَا يُشْعِرَنَّ بِكُمْ أَحَدًا (19) إِنَّهُمْ إِنْ يَظْهَرُوا عَلَيْكُمْ يَرْجُمُوكُمْ أَوْ يُعِيدُوكُمْ فِي مِلَّتِهِمْ وَلَنْ تُفْلِحُوا إِذًا أَبَدًا (20)

    और इस प्रकार हमने उन्हें (नींद से) पुनः उठाया ताकि वे एक दूसरे से प्रश्न करें। उनमें से एक ने कहा कि तुम कितनी देर ठहरे हो? उन्होंने कहा कि एक दिन या उसका कुछ भाग। (अंततः) उन्होंने कहा कि तुम्हारा पालनहार इस बात से अधिक अवगत है कि तुम (गुफा में) कितने समय ठहरे हो तो अब तुम स्वयं में से किसी एक को अपने ये पैसे देकर नगर भेजो तो वह देखे कि कौन सा भोजन अधिक पवित्र है और फिर उसमें से आजीविका तुम्हारे लिए ले आए। और वह सावधानी से जाए ताकि तुम्हारे बारे में किसी को पता न चलने पाए (18:19) (क्योंकि) निश्चित रूप से यदि उन्हें तुम्हारे बारे में पता चल गया तो पत्थर मार मार कर तुम्हारी हत्या कर देंगे या फिर तुम्हें अपने धर्म पर पलटा लेंगे और फिर तुम्हें कभी कल्याण प्राप्त नहीं हो पाएगा। (18:20)

    ये आयतें एक लम्बी निद्रा के बाद असहाबे कह्फ़ के जागने के बाद उनकी वार्ता का वर्णन करते हुए कहती हैं कि ईश्वर ने जिस प्रकार से उन्हें एक विशेष रूप में सुलाया था, उसी प्रकार उन्हें उस नींद से जो मृत्यु के समान थी, जगाया भी। उन लोगों के बीच इस बात में मतभेद हो गया कि वे कितने समय तक गुफा में रहे हैं। जब वे किसी परिणाम तक नहीं पहुंचे तो उन्होंने इस मामले को ईश्वर के ज्ञान पर छोड़ दिया। इसी के साथ यह बात भी स्वाभाविक थी कि इतने समय तक सोते रहने के कारण वे सब भूखे हों और उन्हें गुफा में खाने के लिए भी कुछ न मिला। इसी कारण उन्होंने अपने में से एक व्यक्ति से कहा कि वह नगर जा कर पवित्र भोजन ख़रीदे और गुफा में वापस आ जाए।

    किंतु जब उस व्यक्ति ने खाने के पैसे दिए तो दुकान के मालिक को पुराने सिक्के देख कर उस पर संदेह हुआ और उस व्यक्ति द्वारा अत्यधिक सावधानी बरतने के बावजूद उनका मामला सामने आ ही गया और जनता से हो कर शासक के कानों तक पहुंच गया। अगली आयत इसक बाद की घटना का वर्णन करती है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि असहाबे कह्फ़ की घटना, प्रलय में मरे हुए लोगों को उठाने के संबंध में ईश्वर की शक्ति का एक उदाहरण है।

    ईमान वाले व्यक्ति को होशियार व राज़दार होना चाहिए और अपनी क्षमता भर शत्रु के मुक़ाबले में सुरक्षा के उपायों की रक्षा करनी चाहिए, यद्यपि संभव है कि शत्रु किसी अन्य मार्ग से घुसपैठ करे।

    ईमान वाले हर खाना नहीं खाते, उनके लिए भोजन का पवित्र व हलाल होना अधिक महत्वपूर्ण होता है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 21 की तिलावत सुनें।

    وَكَذَلِكَ أَعْثَرْنَا عَلَيْهِمْ لِيَعْلَمُوا أَنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَأَنَّ السَّاعَةَ لَا رَيْبَ فِيهَا إِذْ يَتَنَازَعُونَ بَيْنَهُمْ أَمْرَهُمْ فَقَالُوا ابْنُوا عَلَيْهِمْ بُنْيَانًا رَبُّهُمْ أَعْلَمُ بِهِمْ قَالَ الَّذِينَ غَلَبُوا عَلَى أَمْرِهِمْ لَنَتَّخِذَنَّ عَلَيْهِمْ مَسْجِدًا (21)

    और इस प्रकार हमने लोगों को उनकी स्थिति से अवगत कर दिया ताकि वे जान लें कि ईश्वर का वचन सच्चा है और प्रलय में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है। जब वे उनके मामले में मतभेद कर रहे थे, उन्होंने कहा कि इस पर एक इमारत बना दो कि उनका पालनहार उनकी स्थिति के बारे में अधिक अवगत है (किंतु) उनके मामले में जिनकी बात भारी रही उन्होंने कहा कि हम उन (के दफ़्न के स्थान) पर एक मस्जिद बनाएंगे। (18:21)

    जैसा कि हमने कहा, तीन सौ वर्ष पुराने सिक्के देख कर लोगों को असहाबे कह्फ़ के बारे में पता चल गया और लोगों की एक भीड़ उस गुफा की ओर बढ़ने लगी। दूसरी ओर जो व्यक्ति भोजन लेने के लिए गया था, वह तेज़ी से गुफा में लौटा और उसने अपने साथियों को पूरी बात कह सुनाई।

    यह सुन कर उन सबने ईश्वर से मृत्यु की प्रार्थना की और ईश्वर ने उनकी इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। जब लोग उनके पास पहुंचे तो वे सब मर चुके थे किंतु तीन सौ वर्ष बीतने के बावजूद उनके शरीर पूर्ण रूप से सुरक्षित थे। यह लोगों को जीवित करने और उन्हें मृत्यु देने में ईश्वरीय शक्ति का चिन्ह है। इस अवसर पर कुछ लोगों ने प्रस्ताव दिया कि उस स्थान पर एक इमारत बना दी जाए किंतु वास्तविक ईमान वालों ने, जो इस घटना को प्रलय को सिद्ध करने के लिए एक ठोस प्रमाण समझ रहे थे, प्रयास किया कि यह घटना कभी भुलाई न जा सके, इसी कारण उन्होंने एकेश्वरवाद की इस महान घटना को अमर बनाने के लिए कहा कि वे उन लोगों के दफ़्न होने के स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण करेंगे ताकि उसमें सदैव अनन्य ईश्वर का स्मरण किया जाता रहे।

    इस आयत से हमने सीखा कि पिछली जाति के लोगों के इतिहास में ईश्वरीय शक्ति के चिन्हों की सुरक्षा की जानी चाहिए ताकि लोग उनसे पाठ सीखें।

    ईश्वर के प्रिय बंदों के मज़ारों पर मस्जिद का निर्माण, क़ुरआन की सिफ़ारिश है और यदि यह तै हो कि उनके मज़ार पर कोई इमारत बनाई जाए तो कितना अच्छा है कि वह इमारत मस्जिद हो।