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    सूरए कह्फ़, आयतें 22-26, (कार्यक्रम 509)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 22 की तिलावत सुनें।

    سَيَقُولُونَ ثَلَاثَةٌ رَابِعُهُمْ كَلْبُهُمْ وَيَقُولُونَ خَمْسَةٌ سَادِسُهُمْ كَلْبُهُمْ رَجْمًا بِالْغَيْبِ وَيَقُولُونَ سَبْعَةٌ وَثَامِنُهُمْ كَلْبُهُمْ قُلْ رَبِّي أَعْلَمُ بِعِدَّتِهِمْ مَا يَعْلَمُهُمْ إِلَّا قَلِيلٌ فَلَا تُمَارِ فِيهِمْ إِلَّا مِرَاءً ظَاهِرًا وَلَا تَسْتَفْتِ فِيهِمْ مِنْهُمْ أَحَدًا (22)

    शीघ्र ही (ये लोग) कहेंगे कि (असहाबे कह्फ़) तीन थे और चौथा उनका कुत्ता था, कुछ अन्य कहेंगे कि वे पांच थे और छठा उनका कुत्ता था, (ये सब) अंधेरे में तीर चलाने के समान है। और एक गुट कहेगा कि असहाबे कह्फ़ सात थे और आठवां उनका कुत्ता था। आप कह दीजिए कि मेरा पालनहार उनकी संख्या के बारे में अधिक ज्ञान रखने वाला है और उनकी संख्या के बारे में केवल कुछ लोगों के अतिरिक्त किसी को ज्ञान नहीं है तो आप उनके बारे में विदित बात के अतिरिक्त किसी प्रकार की बहस न कीजिए और उनके बारे में किसी से भी उसके विचार न पूछिए। (18:22)

    असहाबे कह्फ़ की घटना का वर्णन करने के पश्चात यह आयत भविष्यवाणी करती है कि लोग, इस एकेश्वरवादी गुट के लक्ष्य और उनके चरित्र पर ध्यान देने के स्थान पर उनकी संख्या के बारे में विवाद करेंगे और उनमें से हर गुट एक अलग बात कहेगा जबकि उनके ईमान, कर्म और पलायन में उनकी संख्या की कोई भूमिका नहीं है तथा उनके तीन, पांच या सात होने से उनके महान कार्य के मूल्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता किंतु खेद की बात है कि आम लोग अनुमान व कल्पना में ग्रस्त रहते हैं और जिस बात के बारे में उन्हें कुछ ज्ञान नहीं होता उसके बारे में भी अंधेरे में तीर चलाना चाहते हैं।

    इस आयत में ईश्वर अपने पैग़म्बर से कहता है कि इस मामले में आप लोगों से बहस मत कीजिए और उनसे कोई बात मत पूछिए बल्कि उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ दीजिए कि ईश्वर उनकी संख्या के बारे में पूर्ण रूप से अवगत है।

    इस आयत से हमने सीखा कि जिस बात का हमें ज्ञान न हो उसके बारे में अनुमान व कल्पना से काम नहीं लेना चाहिए और लाभहीन एवं अनुचित बहस से बचना चाहिए।

    ऐतिहासिक घटनाओं की समीक्षा में लोगों के नाम उनकी संख्या और समय के बजाए उन घटनाओं के लक्ष्यों पर ध्यान देना चाहिए।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 23 और 24 की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَقُولَنَّ لِشَيْءٍ إِنِّي فَاعِلٌ ذَلِكَ غَدًا (23) إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ وَاذْكُرْ رَبَّكَ إِذَا نَسِيتَ وَقُلْ عَسَى أَنْ يَهْدِيَنِ رَبِّي لِأَقْرَبَ مِنْ هَذَا رَشَدًا (24)

    और कदापि किसी वस्तु के बारे में यह मत कहिए कि मैं उसे कल करूंगा (18:23) (बल्कि यह कहिए कि) यदि ईश्वर ने चाहा तो (मैं कल यह काम करूंगा) और यदि आप इसे भूल जाएं तो (जब भी याद आए) अपने पालनहार को याद कीजिए और कहिए कि आशा है कि मेरा पालनहार उस मार्ग की ओर मेरा मार्गदर्शन करेगा जो अधिक निकट है। (18:24)

    ये आयतें एक मूल आदेश का वर्णन करती हैं। यद्यपि इस आदेश का प्राथमिक संबोधन पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से है किंतु मूल रू से सभी मुसलमान इसके संबोधन के पात्र हैं और उन्हें इसका पालन करना चाहिए। इन आयतों के अनुसार ईमान वाले व्यक्ति को भविष्य के संबंध में अपने हर कथन और कर्म के बारे में बात करते हुए इन शाअल्लाह अर्थात यदि ईश्वर ने चाहा तो, कहना चाहिए।

    इसका अर्थ यह है कि स्वयं उस व्यक्ति को भी और जिससे वह बात कर रहा है उसे भी यह बात समझनी चाहिए कि उसने जो भी कहा है कि वह उसी स्थिति में संभव है जब ईश्वर चाहे और ईश्वर की इच्छा के बिना कोई भी बात नहीं हो सकती। दूसरे शब्दों में ईमान वाले व्यक्ति जब भी कोई बात करते हैं तो इन शाअल्लाह अवश्य कहते हैं जैसा कि स्वयं क़ुरआने मजीद में भी हज़रत याक़ूब, शुऐब, ख़िज़्र और इस्माईल अलैहिमुस्सलाम जैसे पैग़म्बरों के कथनों में यह वाक्य वर्णित है।

    स्पष्ट है कि यह वाक्य केवल मौखिक उद्धरण नहीं है बल्कि एक सच्चे मुसलमान की आस्था और उसके दृष्टिकोण का वर्णन करता है। यद्यपि हर व्यक्ति की अपनी इच्छा और अपना अधिकार होता है किंतु स्पष्ट है कि किसी काम का वास्तव में होना लोगों की इच्छा पर निर्भर नहीं है बल्कि उसके लिए विभिन्न कारकों और कारणों की आवश्यकता होती है। दूसरे शब्दों में ईश्वर की इच्छा के बिना कोई भी काम नहीं होता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि हमें केवल अपनी इच्छा और क्षमता पर भरोसा नहीं करना चाहिए, स्वयं को ईश्वर से आवश्यकतामुक्त नहीं समझना चाहिए और अपने निर्णयों में उसे नहीं भूलना चाहिए।

    जब पैग़म्बरों तक को अपने जीवन के मामलों में ईश्वरीय मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है तो हम जैसे साधारण लोगों को तो उसकी अधिक आवश्यकता है अतः हमें सदैव ईश्वर से ये प्रार्थना करनी चाहिए कि वह उत्तम मार्ग की ओर हमारा मार्गदर्शन करे।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 25 और 26 की तिलावत सुनें।

    وَلَبِثُوا فِي كَهْفِهِمْ ثَلَاثَ مِئَةٍ سِنِينَ وَازْدَادُوا تِسْعًا (25) قُلِ اللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا لَبِثُوا لَهُ غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ أَبْصِرْ بِهِ وَأَسْمِعْ مَا لَهُمْ مِنْ دُونِهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا يُشْرِكُ فِي حُكْمِهِ أَحَدًا (26)

    और वे अपनी गुफा में तीन सौ वर्षों तक रहे और उसमें नौ वर्षों की वृद्धि हुई। (18:25) कह दीजिए कि (गुफा में) उनके रहने (की अवधि) के बारे में ईश्वर ही सबसे अधिक जानकार है। धरती व आकाशों का गुप्त ज्ञान उसी के पास है। वह कितना अधिक देखने व सुनने वाला है! उसके अतिरिक्त लोगों के लिए कोई अभिभावक नहीं है और न वह अपने आदेश और साम्राज्य में किसी को समकक्ष बनाता है। (18:26)

    ये आयतें पुनः असहाबे कह्फ़ की घटना का वर्णन करते हुए कहती हैं कि ईश्वर की इच्छा से वे लोग 309 वर्षों तक उस गुफा में जीवित रहे। स्वाभाविक रूप से इस अवधि के बारे में न तो उन्हें और न ही किसी अन्य व्यक्ति को सही ज्ञान था केवल ईश्वर ही इस संबंध में पूर्ण रूप से अवगत था और उसने उनके लिए ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की थीं कि वे 300 वर्षों के पश्चात नींद से जागें।

    स्पष्ट रूप से कुछ लोगों का बिना खाए-पिए तीन सौ वर्षों तक जीवित रहना एक ईश्वरीय चमत्कार है। ईश्वर ने असहाबे कह्फ़ के इस क़दम को अमर बनाने के लिए यह कार्य किया ताकि आगामी पीढ़ियों के लिए पाठ सामग्री बने और इतिहास में सदैव बाक़ी रहे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि जब कभी किसी मामले की सही समीक्षा में आंकड़ों की प्रभावी भूमिका हो तब उनका सटीक उल्लेख किया जाना चाहिए। असहाबे कह्फ़ के मामले में उनके सोने की अवधि ईश्वर की शक्ति को समझने में प्रभावी भूमिका रखती है, न कि उनकी संख्या।

    ईश्वर स्वामी और सम्राट भी है और सभी स्पष्ट व गुप्त बातों का जानकार भी अतः उसके साम्राज्य से निकल कर दूसरों की शरण नहीं ली जा सकती बल्कि इसके विपरीत दूसरों के नियंत्रण से निकल कर उसकी शरण में जाना चाहिए और उससे सहायता मांगनी चाहिए।