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    सूरए कह्फ़, आयतें 27-31, (कार्यक्रम 510)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 27 की तिलावत सुनें।

    وَاتْلُ مَا أُوحِيَ إِلَيْكَ مِنْ كِتَابِ رَبِّكَ لَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِهِ وَلَنْ تَجِدَ مِنْ دُونِهِ مُلْتَحَدًا (27)

    और जो कुछ आपके पालनहार की किताब में से आपके पास उसके विशेष संदेश वहि द्वारा भेजा गया है उसे (लोगों के लिए) पढ़िए। ईश्वर के कथनों को बदलने वाला कोई भी नहीं है और आपको उसके अतिरिक्त कोई शरण स्थल नहीं मिलेगा। (18:27)

    असहाबे कह्फ़ की घटना के वर्णन के अंत में यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि असहाबे कह्फ़ के बारे में निराधार बातें बहुत अधिक हैं किंतु आप वही बातें लोगों को बताएं जो वहि के माध्यम से आप तक पहुंची हैं और दूसरों की बातों पर ध्यान न दें।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के विरोधी विभिन्न बहानों से उनसे यह मांग करते थे कि वे कुछ आयतों को रद्द या परिवर्तित कर दें ताकि वे इस्लाम को स्वीकार कर सकें किंतु इन आयतों के आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का दायित्व था कि वे उनकी इस मांग को रद्द करते हुए कहें कि क़ुरआने मजीद, ईश्वरीय कथन है और उसमें किसी भी प्रकार के परिवर्तन की संभावना नहीं है और यदि कोई ऐसा करने का प्रयास करेगा तो वह ईश्वरीय कोप से बच नहीं पाएगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद, मनुष्य का नहीं बल्कि ईश्वर का कथन है अतः उसमें न तो किसी भी प्रकार का परिवर्तन हुआ है और न होगा।

    क़ुरआने मजीद, अंतिम ईश्वरीय किताब है क्योंकि यह हर प्रकार के फेर-बदल से सुरक्षित रही है और अब किसी अन्य आसमानी किताब की आवश्यकता नहीं है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 28 की तिलावत सुनें।

    وَاصْبِرْ نَفْسَكَ مَعَ الَّذِينَ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ بِالْغَدَاةِ وَالْعَشِيِّ يُرِيدُونَ وَجْهَهُ وَلَا تَعْدُ عَيْنَاكَ عَنْهُمْ تُرِيدُ زِينَةَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَلَا تُطِعْ مَنْ أَغْفَلْنَا قَلْبَهُ عَنْ ذِكْرِنَا وَاتَّبَعَ هَوَاهُ وَكَانَ أَمْرُهُ فُرُطًا (28)

    और उन लोगों के साथ धैर्य व संयम बरतो जो भोर और संध्या के समय अपने पालनहार को पुकारते हैं और उसकी प्रसन्नता चाहते हैं। अपनी आंखों को उनकी ओर से मत फेरो कि तुम सांसारिक जीवन के सौंदर्य को चाहने लगो और कदापि ऐसे व्यक्ति का पालन न करना जिसके हृदय को हमने अपनी याद की ओर से निश्चेत कर दिया है और जो केवल अपनी आंतरिक इच्छाओं का पालन करता है और जिसका मामला केवल अतिशयोक्ति है। (18:28)

    इतिहास में वर्णित है कि क़ुरैश क़बीले के कुछ प्रतिष्ठित लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से कहा कि वे उसी स्थिति में ईमान लाएंगे जब वे दरिद्र, वंचित एवं कमज़ोर लोगों को अपने पास से हटा दें और केवल धनवान व प्रतिष्ठित लोगों पर ही ध्यान दें। उन लोगों ने बड़ी ढिठाई के साथ पैग़म्बर से कहा कि जब तक इस प्रकर के लोग उनके पास रहेंगे वे न तो उनके पास आएंगे और न ही उनकी बातें सुनेंगे।

    रोचक बात यह है कि इसी प्रकार की मांग हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के काल के तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों ने उनसे की थी और उन्होंने उनके उत्तर में कहा था कि वे ईमान वालों को उनकी दरिद्रता के कारण स्वयं से दूर नहीं कर सकते।

    यह आयत इस प्रकार के दृष्टिकोण और अपेक्षा को निंदनीय बताते हुए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सचेत करती है कि वे इस प्रकार की बातों से धोखा न खाएं और सलमान तथा अबूज़र जैसे ठोस ईमान वालों को उनकी दरिद्रता के कारण स्वयं से दूर न करें और ऐसे लोगों को अपने निकट करने का प्रयास न करें जो मायामोह में ग्रस्त होकर ईश्वर को भुला बैठे हैं क्योंकि जो लोग अपनी आंतरिक इच्छाओं का पालन करते हैं वे कदापि संसार के मायामोह को नहीं छोड़ सकते।

    इस आयत से हमने सीखा कि निर्धन व दरिद्र लोगों का साथ देना कठिन है किंतु ईमान वाले दरिद्र, काफ़िर धनवानों पर श्रेष्ठ रखते हैं और इस्लामी समुदाय को उन पर भरपूर ध्यान देना चाहिए।

    मायामोह में इस्लामी समुदाय के नेताओं के ग्रस्त होने का ख़तरा इतना अधिक है कि ईश्वर ने अपने पैग़म्बर तक को इस संबंध में सचेत किया है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 29 की तिलावत सुनें।

    وَقُلِ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكُمْ فَمَنْ شَاءَ فَلْيُؤْمِنْ وَمَنْ شَاءَ فَلْيَكْفُرْ إِنَّا أَعْتَدْنَا لِلظَّالِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَا وَإِنْ يَسْتَغِيثُوا يُغَاثُوا بِمَاءٍ كَالْمُهْلِ يَشْوِي الْوُجُوهَ بِئْسَ الشَّرَابُ وَسَاءَتْ مُرْتَفَقًا (29)

    और हे पैग़म्बर कह दीजिए कि सत्य तो केवल तुम्हारे पालनहार की ओर से (आया) है तो जो चाहे ईमान ले आए और जो चाहे कुफ़्र अपनाए। और निश्चित रूप से हमने अत्याचारियों के लिए (नरक की ऐसी) आग तैयार कर रखी है जिसके पर्दे (उन्हें चारों ओर से) घेरे में लिए होंगे और यदि वे सहायता चाहें तो पिघले हुए तांबे की भांति खौलते हुए पानी से उन्हें उत्तर दिया जाएगा जो चेहरों को जला डालेगा। यह कितना बुरा पेय है और नरक कितना बुरा ठिकाना है। (18:29)

    ईश्वर की ओर से निश्चेत धनवानों की अनुचित मांगों के उत्तर में यह आयत कहती है कि किसी को उनके ईमान की आवश्यकता नहीं है कि वे ईमान लाने के लिए इस प्रकार की शर्तें लगा रहे हैं। सत्य कथन ईश्वर की ओर से आ चुका है तो जो कोई चाहे उस पर ईमान लाए और जो न चाहे उसका इन्कार कर दे। ईमान कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती की बात नहीं है और एक सुदृढ़ ईमान वाला व्यक्ति ऐसे हज़ारों काफ़िरों से बेहतर है जो अपने ईमान लाने के लिए शर्त लगाते हों।

    इसके अतिरिक्त जो लोग संसार के मायामोह में ग्रस्त हैं, प्रलय में सबसे बुरा ठिकाना और खान-पान की सबसे बुरी वस्तुएं उनकी प्रतीक्षा में हैं। उनके आज को नहीं देखना चाहिए क्योंकि यह जीवन तो बहुत जल्दी समाप्त होने वाला है।

    इस आयत से हमने सीखा कि धर्म की सत्यता में लोगों के ईमान अथवा कुफ़्र की कोई भूमिका नहीं है। क़ुरआने मजीद सत्य है चाहे सभी लोग उसका इन्कार कर दें।

    यद्यपि लोग कुफ़्र या ईमान में से किसी एक के चयन में स्वतंत्र हैं किंतु लोक-परलोक में दोनों गुटों का अंत भिन्न भिन्न होगा और कुफ़्र अपनाने का परिणाम प्रलय में कड़े दंड के रूप में भुगतना पड़ेगा।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 30 और 31 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ مَنْ أَحْسَنَ عَمَلًا (30) أُولَئِكَ لَهُمْ جَنَّاتُ عَدْنٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ يُحَلَّوْنَ فِيهَا مِنْ أَسَاوِرَ مِنْ ذَهَبٍ وَيَلْبَسُونَ ثِيَابًا خُضْرًا مِنْ سُنْدُسٍ وَإِسْتَبْرَقٍ مُتَّكِئِينَ فِيهَا عَلَى الْأَرَائِكِ نِعْمَ الثَّوَابُ وَحَسُنَتْ مُرْتَفَقًا (31)

    निश्चित रूप से जो लोग ईमान लाए और भले कर्म करते रहे (तो) हम कदापि ऐसे व्यक्ति के प्रतिफल को व्यर्थ नहीं जाने देंगे जिसने अच्छे कर्म किए। (18:30) ऐसे ही लोगों के लिए सदाबहार बाग़ हैं जिनके नीचे से नहरें बह रही होंगी। वहां उन्हें सोने के कंगनों से सुसज्जित किया जाएगा और वे हरे रंग के बारीक रेशम के कपड़े पहने होंगे तथा ऊंचे तख़्तों पर टेक लगाए (बैठे) होंगे। यह क्या ही अच्छा प्रतिफल और क्या ही अच्छा ठिकाना है। (18:31)

    घमंडी काफ़िरों और अपनी आंतरिक इच्छाओं का पालन करने वाले निश्चेत लोगों के ठिकाने नरक के मुक़ाबले में यह आयत ईमान वालों के ठिकाने की ओर संकेत करते हुए कहती है कि इस संसार में निर्धनता और दरिद्रता में जीवन बिताने वाले यही लोग, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से अपनी वफ़ादारी और ईश्वर के मार्ग पर सुदृढ़ रहने के कारण प्रलय में सर्वोत्तम स्थान पर होंगे और इस संसार में धनसंपन्नता में रहने वाले उस स्थान पर एक क्षण बिताने की लालसा हृदय में लिए होंगे।

    यदि धनवान लोग आज इस संसार में मूल्यवान वस्त्र पहनते हैं और विभिन्न प्रकार के आभूषणों का प्रयोग करते हैं तो प्रलय में दरिद्र ईमान वालों को अत्यंत मूल्यवान वस्त्र दिए जाएंगे जिनकी तुलना किसी भी मूल्यवान सांसारिक वस्त्र से नहीं की जा सकती। ये अनुकंपाएं उन्हें ईश्वर पर ईमान और भले कर्मों के कारण प्राप्त होंगी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वालों को ईश्वरीय आदेशों के पालन के कारण इस संसार में जो कुछ खोना पड़ा है, ईश्वर प्रलय में उन्हें उससे बेहतर प्रतिफल प्रदान करेगा।

    ईश्वर के लिए कार्य करना चाहिए कि इससे न तो हमारे प्रतिफल में से किसी वस्तु की कमी होती है और न ही उसका प्रतिफल नश्वर एवं शीघ्र समाप्त होने वाला होता है।