islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए कह्फ़, आयतें 32-36, (कार्यक्रम 511)

    सूरए कह्फ़, आयतें 32-36, (कार्यक्रम 511)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 32 और 33 की तिलावत सुनें।

    وَاضْرِبْ لَهُمْ مَثَلًا رَجُلَيْنِ جَعَلْنَا لِأَحَدِهِمَا جَنَّتَيْنِ مِنْ أَعْنَابٍ وَحَفَفْنَاهُمَا بِنَخْلٍ وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمَا زَرْعًا (32) كِلْتَا الْجَنَّتَيْنِ آَتَتْ أُكُلَهَا وَلَمْ تَظْلِمْ مِنْهُ شَيْئًا وَفَجَّرْنَا خِلَالَهُمَا نَهَرًا (33)

    और (हे पैग़म्बर!) आप इन्हें उन दो पुरुषों का उदाहरण दे दिजिए जिनमें से एक के लिए हमने अंगूर के दो बाग़ बनाए थे और उन्हें खजूर के पेड़ों से घेर दिया था तथा उन दोनों बाग़ों के बीच में खेत बना दिए थे। (18:32) दोनों बाग़ों में (अच्छी) फ़स्ल हुई और उनमें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं हुई तथा हमने उन दोनों के बीच नहर बना दी थी। (18:33)

    ये आयतें और इसके बाद वाली आयतें समाज के दो गुटों का उदाहरण प्रस्तुत करती है जिनमें से एक सांसारिक मायामोह में जकड़ा हुआ है और ईश्वरीय अनुकंपाओं के चलते धन संपन्न हो चुका है, किंतु यह गुट घमंड, अहं और अंततः कुफ़्र में ग्रस्त हो जाता है।

    दूसरा गुट उन दरिद्रों का है जो सदैव ही धनवानों द्वारा अनादर और परिहास के पात्र बनते हैं जबकि ईश्वर पर ईमान की दृष्टि से इस गुट को ईश्वर के निकट अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है और ये लोग सांसारिक मायामोह के स्थान पर प्रलय में ईश्वर की अनुकंपाएं प्राप्त करने के प्रयास में रहते हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पानी, मिट्टी, सूर्य, पेड़ और खेत सबके सब ईश्वर की ओर से हैं और हमें ये सारी अनुकंपाएं वही प्रदान करता है।

    संभावनाओं से लाभान्वित होने में मनुष्यों के बीच अंतर, ईश्वर की तत्वदर्शिता का एक चिन्ह है और यह अंतर धनवान व संपन्न लोगों में घमंड और दरिद्रों में निराशा का कारण नहीं बनना चाहिए।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 34 और 35 की तिलावत सुनें।

    وَكَانَ لَهُ ثَمَرٌ فَقَالَ لِصَاحِبِهِ وَهُوَ يُحَاوِرُهُ أَنَا أَكْثَرُ مِنْكَ مَالًا وَأَعَزُّ نَفَرًا (34) وَدَخَلَ جَنَّتَهُ وَهُوَ ظَالِمٌ لِنَفْسِهِ قَالَ مَا أَظُنُّ أَنْ تَبِيدَ هَذِهِ أَبَدًا (35)

    और उसके फल भी (बहुत अधिक) हुए तो उसने अपने (ग़रीब) मित्र से बात करते हुए कहा कि मेरे पास तुम से अधिक माल है और लोगों की दृष्टि से भी अधिक शक्तिशाली हूं। (18:34) और वह अपने आप पर अत्याचार करते हुए बाग़ में प्रविष्ट हुआ (और घमंड के साथ) कहा कि मुझे नहीं लगता कि यह बाग़ कभी भी बर्बाद होगा। (18:35)

    पिछली आयतों में दो मित्रों में से एक के बाग़ों के पेड़ों व खेतों के सुंदर चित्रण के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में कहता है कि इन बाग़ों का मालिक अहं में ग्रस्त हो गया था और उसने अपने मित्र के समक्ष, जिसके पास इस प्रकार के बाग़ व अन्य संभावनाएं नहीं थीं घमंड से काम लिया।

    वह अपने बाग़ों को बहुत बड़ा व अमर समझता था और उसका विचार था कि संसार व उसकी अनुकंपाएं सदैव रहने वाली हैं और उसके पास सदा ही इस प्रकार की संभावनाएं रहेंगी जबकि ईश्वर की ओर से निश्चेत रहने और पापों में ग्रस्त होने के कारण उसके भीतर इस प्रकार की ग़लत आस्था उत्पन्न हो गई थी जिसकी कोई वास्तविकता नहीं थी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि संसार, धन-संपत्ति और सत्ता व शक्ति से लगाव, अत्याचार व ईश्वर की ओर से निश्चेतना का मार्ग प्रशस्त करता है।

    स्वयं को श्रेष्ठ समझना, घमंड और दूसरों का अनादर, अन्य लोगों पर अत्याचार से पूर्व स्वयं पर अत्याचार है क्योंकि यह मनुष्य को पाश्विकता से निकट और ईश्वर से दूर करता है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 36 की तिलावत सुनें।

    وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِنْ رُدِدْتُ إِلَى رَبِّي لَأَجِدَنَّ خَيْرًا مِنْهَا مُنْقَلَبًا (36)

    और (उसने कहा कि) मुझे नहीं लगता कि प्रलय आएगा और यदि मैं अपने पालनहार की ओर लौटाया भी गया तो निश्चित रूप से मुझे इससे अच्छा स्थान प्राप्त होगा। (18:36)

    यह आयत सांसारिक मायामोह में ग्रस्त होने वाले लोगों के अंत की ओर संकेत करते हुए कहती है कि ये लोग इतना आगे बढ़ जाते हैं कि प्रलय तक का इन्कार कर देते हैं और जीवन को केवल इसी संसार तक सीमित समझते हैं। इन लोगों के भीतर वर्चस्ववाद और स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की भावना इतनी अधिक होती है कि वे ईमान वालों से कहते हैं कि यदि तुम्हारी बात सही भी हो और प्रलय आ भी जाए तो वहां भी तुम नहीं बल्कि हम ही ऐश्वर्य में होंगे।

    मानो वे संभावनाओं से संपन्न होने को अपना मूल अधिकार समझते हैं और ईश्वर को चाहिए कि वह सदैव सर्वोत्तम संभावनाएं उन्हें प्रदान करता रहे। वे समझते हैं कि वे श्रेष्ठ जाति हैं और सर्वोत्तम संभावनाओं की प्राप्ति की योग्यता केवल उन्हीं के पास है चाहे वह लोक हो या परलोक।

    जबकि प्रलय इस संसार का अगला क्रम नहीं बल्कि इसका प्रतिबिंबन है और ईश्वर के न्यायालय में लोग, अपनी धन-संपत्ति और शक्ति के आधार पर नहीं बल्कि अपने कर्मों के आधार पर दंड अथवा पारितोषिक प्राप्त करेंगे।

    इसके अतिरिक्त संसार में मनुष्य के पास जो भी योग्यताएं और संभावनाएं हैं वे ईश्वर ने अपनी दया व कृपा से प्रदान की हैं, उन पर मनुष्य का अधिकार नहीं है किंतु खेद के साथ कहना पड़ता है कि ईश्वर पर भरोसा न रखने वाले लोग इस बात की ओर से निश्चेत हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि यदि धन व शक्ति का प्रयोग ईमान के मार्ग में न हो तो उसका परिणाम ईश्वर के इन्कार के रूप में निकलता है और मनुष्य नरक में जाता है।

    अनुचित व निराधार आशाओं का कोई मूल्य नहीं है, स्वर्ग कर्मों से प्राप्त होता है, आशाओं से नहीं।