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    सूरए कह्फ़, आयतें 37-44, (कार्यक्रम 512)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 37 और 38 की तिलावत सुनें।

    قَالَ لَهُ صَاحِبُهُ وَهُوَ يُحَاوِرُهُ أَكَفَرْتَ بِالَّذِي خَلَقَكَ مِنْ تُرَابٍ ثُمَّ مِنْ نُطْفَةٍ ثُمَّ سَوَّاكَ رَجُلًا (37) لَكِنَّا هُوَ اللَّهُ رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِرَبِّي أَحَدًا (38)

    उसके साथी ने उससे बात करते हुए कहा कि क्या तूने उसका इन्कार किया है जिसने तुझे मिट्टी और फिर नुतफ़े अर्थात निषेचित अंडाणु से बनाया और फिर तुझे एक संपूर्ण पुरुष बनाया है? (18:37) और रहा मैं (तो मेरी आस्था यह है कि) वही अल्लाह मेरा पालनहार है और मैं किसी को भी अपने पालनहार का समकक्ष नहीं ठहराता। (18:38)

    इससे पहले हमने कहा कि क़ुरआन मजीद इन आयतों में एक मोमिन और एक काफ़िर व्यक्ति की बातों का वर्णन करता है। मोमिन व्यक्ति दरिद्र जबकि काफ़िर धनवान था। इससे पहले प्रलय का इन्कार करने वाले घमंडी काफ़िर की बातों का उल्लेख किया गया था।

    इन आयतों में उसके मोमिन मित्र के उत्तर का वर्णन किया गया है जो अपने मित्र के घमंड और अहं को तोड़ने के लिए कहता है कि तुम्हें मिट्टी और गंदे पानी से बनाया गया है और अब तुम एक संपूर्ण व्यक्ति बन गए हो। क्या स्वयं तुमने अपनी रचना की है कि इतने घमंड में ग्रस्त हो और ईश्वर का इन्कार कर रहे हो?

    रोचक बात यह है कि काफ़िर व्यक्ति ने अपनी बातों में ईश्वर का इन्कार नहीं किया था बल्कि केवल प्रलय को नकारा था किंतु उसका मोमिन मित्र उसे काफ़िर अर्थात ईश्वर का इन्कार करने वाला कहता है क्योंकि प्रलय का इन्कार वस्तुतः पुनः सृष्टि करने में ईश्वर की शक्ति का इन्कार है और इस प्रकार की आस्था सर्वसमर्थ ईश्वर का इन्कार करने के अर्थ में है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि धन-संपत्ति का मोह, मनुष्य द्वारा ईश्वर तथा प्रलय के इन्कार का मार्ग प्रशस्त करता है अतः सदैव ही इस ख़तरे की ओर से सचेत रहना चाहिए।

    काफ़िरों से वार्ता व बहस में तर्क अत्यंत सशक्त होना चाहिए ताकि उनके मार्गदर्शन की भूमि समतल हो सके।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 39, 40 और 41 की तिलावत सुनें।

    وَلَوْلَا إِذْ دَخَلْتَ جَنَّتَكَ قُلْتَ مَا شَاءَ اللَّهُ لَا قُوَّةَ إِلَّا بِاللَّهِ إِنْ تَرَنِ أَنَا أَقَلَّ مِنْكَ مَالًا وَوَلَدًا (39) فَعَسَى رَبِّي أَنْ يُؤْتِيَنِ خَيْرًا مِنْ جَنَّتِكَ وَيُرْسِلَ عَلَيْهَا حُسْبَانًا مِنَ السَّمَاءِ فَتُصْبِحَ صَعِيدًا زَلَقًا (40) أَوْ يُصْبِحَ مَاؤُهَا غَوْرًا فَلَنْ تَسْتَطِيعَ لَهُ طَلَبًا (41)

    और जब तू अपने बाग़ में प्रविष्ट हुआ तो तूने यह क्यों नहीं कहा कि जो अल्लाह चाहे वही होता है, (तथा) ईश्वर के अतिरिक्त कोई शक्ति नहीं है? यदि तू माल तथा संतान की दृष्टि से मुझे कम समझ रहा है। (18:39) तो संभव है कि मेरा पालनहार मुझे तारे बाग़ से उत्तम (बाग़) प्रदान करे और तेरे बाग़ पर आकाश से कोई बिजली भेज दे और वह उस बाग़ को चटियल मैदान में परिवर्तित कर दे। (18:40) या फिर उसका पानी (सूख कर धरती में) चला जाए और फिर तू उसे कदापि ढूंढ न पाए। (18:41)

    क़ुरआने मजीद इन दो लोगों की बात-चीत को आगे बढ़ाते हुए कहता है कि ईमान वाले व्यक्ति ने अपने घमंडी मित्र से कहा कि तुम अपने बाग़ों और अन्य अनुकंपाओं को ईश्वर से संबंधित क्यों नहीं समझते और उसके प्रति आभार प्रकट क्यों नहीं करते। क्या तुम नहीं जानते कि हर काम ईश्वर की शक्ति से संभव होता है? क्या तुम यह समझते हो कि तुम बाग़ और उसके पेड़ों के मालिक हो? जबकि वस्तुतः ईश्वर ही दाना उगाता है और तुम केवल धरती में दाना बोते हो और उसकी देख-भाल करते हो अन्यथा पानी, धरती, दाना, बादल, वर्षा, सूर्य और हवा सभी कुछ ईश्वर की ओर से है तथा दाने का बढ़ कर पौधे और पेड़ में परिवर्तित होना भी ईश्वर ही की ओर से है। इसके अतिरिक्त स्वयं तुम और जो कुछ तुम्हारे पास है वह भी ईश्वर का ही है और उसकी शक्ति के बिना कोई भी वस्तु अस्तित्व में नहीं आती।

    वह आगे चलकर कहता है कि यदि ईश्वर चाहे तो मुझे तुम से अधिक संपन्न बाग़ और धन-संपत्ति प्रदान कर सकता है और तुम्हारे बाग़ों व संपत्ति को नष्ट कर सकता है अतः इस पर अधिक घमंड मत करो कि कोई भी वस्तु तुम्हारे हाथ में नहीं है। शायद आकाश से कोई बिजली आकर तुम्हारे बाग़ों को जला दे या फिर सूखे के कारण तुम्हारी नहर का पानी सूख जाए और तुम जितने भी कुएं खोदो तुम्हें पानी प्राप्त न हो।

    इन आयतों से हमने सीखा कि प्राकृतिक अनुकंपाओं से लाभ उठाते और प्रकृति के सौंदर्य को देखते समय ईश्वर को याद रखना चाहिए और उसका स्मरण करना चाहिए।

    ईश्वर पर ईमान रखने वाला व्यक्ति, धन संपन्न न होने के कारण हीनभावना में ग्रस्त नहीं होता क्योंकि वह ईश्वर पर भरोसा करता है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 42, 43 और 44 की तिलावत सुनें।

    وَأُحِيطَ بِثَمَرِهِ فَأَصْبَحَ يُقَلِّبُ كَفَّيْهِ عَلَى مَا أَنْفَقَ فِيهَا وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَى عُرُوشِهَا وَيَقُولُ يَا لَيْتَنِي لَمْ أُشْرِكْ بِرَبِّي أَحَدًا (42) وَلَمْ تَكُنْ لَهُ فِئَةٌ يَنْصُرُونَهُ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَمَا كَانَ مُنْتَصِرًا (43) هُنَالِكَ الْوَلَايَةُ لِلَّهِ الْحَقِّ هُوَ خَيْرٌ ثَوَابًا وَخَيْرٌ عُقْبًا (44)

    और (ईश्वरीय दंड आ गया तथा) उसके बाग़ के सभी फल बर्बाद कर दिए गए तो उसने उसमें जो कुछ लागत लगाई थी, उस पर हाथ मलने लगा जबकि उसका बाग़ अपनी शाखाओं के साथ ढह गया था और वह कह रहा था कि काश मैं किसी को अपने पालनहार का समकक्ष न बनाता। (18:42) और (अब) उसके पास ईश्वर के अतिरिक्त उसका कोई गुट भी नहीं था जो उसकी सहायता करता और न ही वह स्वयं प्रतिशोध ले सकता था। (18:43) वहां (प्रलय में) स्वामित्व का अधिकार ईश्वर के लिए विशेष है और वही सबसे अच्छा पुण्य प्रदान करने और सबसे अच्छा परिणाम देने वाला है। (18:44)

    उन दो काफ़िर व ईमान वाले मित्रों की बात-चीत समाप्त हो गई है किंतु काफ़िर व्यक्ति अपने घमंड के कारण कुफ़्र को छोड़ने पर तैयार न हुआ। ईश्वरीय दंड ने उसके बाग़ और खेत तथा हर वस्तु को अपनी चपेट में ले लिया और तबाह कर दिया। इस प्रकार से कि जब उस व्यक्ति ने उस दृष्य को देखा तो दुख व खेद के चलते हाथ मलने लगा क्योंकि उसने उस बाग़ पर बहुत अधिक धन लगाया था और अब ईश्वरीय दंड के मुक़ाबले में वह कुछ भी नहीं कर सकता था।

    इस अवसर पर उसे अपनी ग़लती का आभास हुआ और उसने कहा कि काश मैं ईश्वर की ओर से निश्चेत न हुआ होता, किसी को उसका समकक्ष न ठहराता और उसे ही हर वस्तु का वास्तविक स्वामी समझता किंतु अब पछताने का कोई लाभ नहीं था और कोई भी उसकी सहायता नहीं कर सकता था। अब उसे इस बात पर विश्वास हो गया था कि सृष्टि की हर वस्तु का नियंत्रण ईश्वर के हाथ में है और प्रलय में भी ऐसा ही होगा तथा लोगों को दंड व पारितोषिक देना और सबका अंजाम ईश्वर ही के हाथ में है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय दंड केवल प्रलय से विशेष नहीं है बल्कि वह कभी कभी घमंडी लोगों को इसी संसार में दंडित करता है।

    संसार के मायामोह में ग्रस्त लोग आर्थिक मामलों की समीक्षा में ईश्वर को भुला बैठते हैं और यह नहीं सोचते कि ईश्वरीय इच्छा सर्वोपरि है।