islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए कह्फ़, आयतें 45-49, (कार्यक्रम 513)

    सूरए कह्फ़, आयतें 45-49, (कार्यक्रम 513)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 45 की तिलावत सुनें।

    وَاضْرِبْ لَهُمْ مَثَلَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا كَمَاءٍ أَنْزَلْنَاهُ مِنَ السَّمَاءِ فَاخْتَلَطَ بِهِ نَبَاتُ الْأَرْضِ فَأَصْبَحَ هَشِيمًا تَذْرُوهُ الرِّيَاحُ وَكَانَ اللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ مُقْتَدِرًا (45)

    और (हे पैग़म्बर!) उन्हें सांसारिक जीवन का उदाहरण उस पानी से दे दीजिए जिसे हमने आकाश से नीचे भेजा तो उससे धरती की वनस्पतियां उससे मिल जुल गईं फिर अचानक ही वह सूख गईं (इस प्रकार से कि) हवाएं उसे उड़ा देती हैं और ईश्वर हर वस्तु पर संपूर्ण प्रभुत्व रखने वाला है। (18:45)

    इससे पहले क़ुरआने मजीद ने अपनी सांकेतिक वर्णन शैली में इस संसार में काफ़िर व ईमान वाले लोगों की स्थिति का उल्लेख किया था। ये आयतें इस संसार तथा इसके मामलों के परिवर्तित होते रहने की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि संसार बिना जड़ वाले पौधे की भांति है जो थोड़ी सी वर्षा से भी फल फूल देने लगता है किंतु थोड़ी सी गर्म हवा चले तो सूख भी जाता है। वसंतु ऋतु में हर स्थान पर हरियाली दिखाई देती है किंतु पतझड़ व शीत ऋतु में पेड़ पौधे सूख जाते हैं और उनके पत्ते झड़ जाते हैं।

    यह बात आवश्यक नहीं है कि मनुष्य की कुछ आयु बीत जाए तभी वह इस संसार के नश्वर होने का अनुभव कर सके। वह प्रतिवर्ष यह दृष्य देख सकता है कि किस प्रकार पौधों की आयु कम व अस्थाई होती है। और फिर यह उस समय होता है कि जब यह सारी बातें स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ें जबकि कई बार ऐसा भी होता है कि पौधे के बढ़ने से पूर्व ही वह किसी संकट में ग्रस्त हो कर तबाह हो जाता है और उसे इतनी आयु भी प्राप्त नहीं होती।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद प्रशिक्षण की किताब है और सांकेतिक रूप से सृष्टि की वास्तविकताओं का उल्लेख करती है ताकि लोग उससे पाठ सीख सकें।

    इस नश्वर संसार की चकाचौंध पर मोहित नहीं होना चाहिए बल्कि अपने कार्यों में प्रलय और सदैव रहने वाले परलोक के बारे में सोचना चाहिए।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 46 की तिलावत सुनें।

    الْمَالُ وَالْبَنُونَ زِينَةُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَالْبَاقِيَاتُ الصَّالِحَاتُ خَيْرٌ عِنْدَ رَبِّكَ ثَوَابًا وَخَيْرٌ أَمَلًا (46)

    माल व संतान सांसारिक जीवन की शोभा हैं और शेष रह जाने वाले भले कर्म आपके पालनहार के निकट फल और आशा दोनों की दृष्टि से उत्तम हैं। (18:46)

    संसार को पौधों की अल्पायु से संज्ञा देने के पश्चात क़ुरआने मजीद इस आयत में कहता है कि इस संसार में जो वस्तु तुम्हारे लिए शोभा का कारण समझी जाती है वह धन व संतान है और ये भी केवल इसी संसार तक सीमित है और प्रलय में धन व संतान में से कोई भी काम नहीं आएगा। वहां जो बात काम आएगी वह ऐसे भले कर्म हैं जो बाक़ी रहेंगे और प्रलय तक पहुंचेंगे।

    संभव है कि कुछ भले कर्म जो दिखावे या दूसरों पर उपकार जताने के लिए किए गए हों इसी संसार में समाप्त हो जाएं और प्रलय तक न पहुंचे। इसी कारण क़ुरआने मजीद की एक अन्य आयत में कहा गया है कि जो कोई अपने भले कर्मों को प्रलय तक लेकर आएगा उसे कई गुना अधिक प्रतिफल दिया जाएगा। यह आयत भी कहती है कि ईश्वर का प्रतिफल सर्वश्रेष्ठ और तुम्हारे कर्मों से उत्तम है और यदि तुम्हारी कोई आशा है तो दूसरों से न लगाओ बल्कि केवल ईश्वर की दया व कृपा से आशा रखो।

    इस आयत से हमने सीखा कि संसार में धन का होना या न होना, घमंड या निराशा का कारण नहीं बनना चाहिए क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण प्रलय है और वहां हिसाब-किताब का मापदंड कर्म है न कि नाम व पद।

    सभी सांसारिक मामले नश्वर व अस्थाई हैं केवल भला कर्म बाक़ी रहने वाला है और ईश्वर ने भले कर्म के प्रतिफल को सुनिश्चित बनाया है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 47, 48 और 49 की तिलावत सुनें।

    وَيَوْمَ نُسَيِّرُ الْجِبَالَ وَتَرَى الْأَرْضَ بَارِزَةً وَحَشَرْنَاهُمْ فَلَمْ نُغَادِرْ مِنْهُمْ أَحَدًا (47) وَعُرِضُوا عَلَى رَبِّكَ صَفًّا لَقَدْ جِئْتُمُونَا كَمَا خَلَقْنَاكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ بَلْ زَعَمْتُمْ أَلَّنْ نَجْعَلَ لَكُمْ مَوْعِدًا (48) وَوُضِعَ الْكِتَابُ فَتَرَى الْمُجْرِمِينَ مُشْفِقِينَ مِمَّا فِيهِ وَيَقُولُونَ يَا وَيْلَتَنَا مَالِ هَذَا الْكِتَابِ لَا يُغَادِرُ صَغِيرَةً وَلَا كَبِيرَةً إِلَّا أَحْصَاهَا وَوَجَدُوا مَا عَمِلُوا حَاضِرًا وَلَا يَظْلِمُ رَبُّكَ أَحَدًا (49)

    और जिस दिन हम पर्वतों को चलाएंगे और आप धरती को पूर्णतः खुला हुआ देखेंगे और हम सबको एकत्रित करेंगे तथा किसी एक को भी नहीं छोड़ेंगे। (18:47) और सबके सब एक पंक्ति में आपके पालनहार के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे (तो उनसे कहा जाएगा कि) आज तुम उसी प्रकार हमारे पास लाए गए हो जिस प्रकार हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था किंतु तुमने समझ लिया था कि हम तुम्हारे लिए कोई निर्धारित समय नहीं ठहराएंगे। (18:48) और (उनके कर्मों की) किताब (सामने) रखी जाएगी तो आप देखेंगे कि अपराधी जो कुछ कर्मपत्र में है उससे भयभीत होंगे और कहेंगे कि हाय हमारा दुर्भाग्य! यह कैसी किताब है जिसने कुछ भी, छोटा और बड़ा कर्म गिने बिना नहीं छोड़ा है और जो कुछ उन्होंने किया है उसे वे अपने समक्ष मौजूद पाएंगे और तुम्हारा पालनहार किसी एक पर भी अत्याचार नहीं करेगा। (18:49)

    संसार तथा उसके मामलों के नश्वर होने का वर्णन करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में प्रलय की स्थिति की ओर संकेत करते हुए कहता है कि इस संसार का पूर्ण रूप से अंत हो जाएगा, पहाड़ टूट कर बिखर जाएंगे, धरती समतल हो जाएगी, सूर्य व सितारों का प्रकाश समाप्त हो जाएगा और फिर एक नई व्यवस्था के साथ नया विश्व स्थापित होगा। पूरे मानव इतिहास के सभी लोग एक समय में एक स्थान पर जीवित करके ईश्वर के न्यायालय में प्रस्तुत किए जाएंगे। हर एक का मामला उस कर्मपत्र के आधार पर स्पष्ट किया जाएगा जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के कर्मों का लेखा-जोखा मौजूद होगा। केवल पापी ही भयभीत होंगे क्योंकि वे जानते होंगे कि संसार में उन्होंने कौन कौन से पाप किए हैं और वे देख रहे होंगे कि हर बात कर्मपत्र में मौजूद है और इन्कार करने अथवा वहां से भागने का भी कोई मार्ग नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में लोगों की उपस्थिति, संसार में उनकी उपस्थिति की भांति शारीरिक होगी।

    प्रलय से निश्चेतना उस दिन खेद और पश्चाताप का कारण बनेगी किंतु इससे कोई लाभ नहीं होगा।

    प्रलय में केवल मनुष्य का कर्म ही सामने आएगा और इस नश्वर संसार की कोई भी अन्य वस्तु उसके साथ प्रलय तक नहीं जाएगी।