islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए कह्फ़, आयतें 50-53, (कार्यक्रम 514)

    सूरए कह्फ़, आयतें 50-53, (कार्यक्रम 514)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 50 की तिलावत सुनें।

    وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَائِكَةِ اسْجُدُوا لِآَدَمَ فَسَجَدُوا إِلَّا إِبْلِيسَ كَانَ مِنَ الْجِنِّ فَفَسَقَ عَنْ أَمْرِ رَبِّهِ أَفَتَتَّخِذُونَهُ وَذُرِّيَّتَهُ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِي وَهُمْ لَكُمْ عَدُوٌّ بِئْسَ لِلظَّالِمِينَ بَدَلًا (50)

    और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो इब्लीस को छोड़ कर उन सबने सजदा किया, वह जिन्नों में से था और उसने अपने पालनहार के आदेश की अवज्ञा की थी। तो क्या तुम लोग मेरे स्थान पर उसे और उसकी संतान को अपना संरक्षक बनाते हो जबकि वे तुम्हारे शत्रु हैं? अत्याचारियों के लिए क्या ही बुरा बदला है। (18:50)

    क़ुरआने मजीद की कई आयतों में फ़रिश्तों द्वारा हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को सजदा किए जाने और शैतान द्वारा इस ईश्वरीय आदेश की अवज्ञा किए जाने का वर्णन किया गया है। इनमें से हर आयत में किसी एक विषय पर अधिक बल दिया गया है। यह आयत कहती है कि यह मत सोचो कि यह घटना सृष्टि के आरंभ में घटी और फिर समाप्त हो गई तथा अब शैतान को तुमसे कुछ लेना-देना नहीं है। ऐसा नहीं है बल्कि सैद्धांतिक रूप से शैतान फ़रिश्ता नहीं था बल्कि वह जिन्न था तथा अन्य जिन्नों की भांति उसकी भी संतानें हैं और उसकी संतान पीढ़ी दर पीढ़ी तुम्हारी शत्रु है और तुम मनुष्यों को आघात पहुंचाने के प्रयास में है।

    यह आयत सचेत करती है कि तुम ध्यान क्यों नहीं देते और ईश्वर के आदेश का पालन करने के स्थान पर शैतान का अनुसरण क्यों करते हो? यह अपने आप पर अत्याचार है और ईश्वर के स्थान पर शैतान को रखना अत्यंत बुरा व अप्रिय कर्म है तथा ये अत्याचारी यही कार्य करते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि वह मनुष्य, जो फ़रिश्तों से भी श्रेष्ठ है और ईश्वर के आदेश पर फ़रिश्ते उसके समक्ष नतमस्तक हुए हैं, क्यों शैतान का अनुसरण करे जो उसके समक्ष झुकने के लिए तैयार नहीं हुआ था?

    शैतान, हज़रत आदम को सजदा न करने के कारण ईश्वर के दरबार से निकाला गया तो ईश्वर उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करेगा जो नमाज़ नहीं पढ़ते और स्वयं ईश्वर के समक्ष सजदा नहीं करते?

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 51 की तिलावत सुनें।

    مَا أَشْهَدْتُهُمْ خَلْقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلَا خَلْقَ أَنْفُسِهِمْ وَمَا كُنْتُ مُتَّخِذَ الْمُضِلِّينَ عَضُدًا (51)

    मैंने ने न तो आकाशों और धरती की सृष्टि के समय और न ही स्वयं उनकी रचना के अवसर पर उन्हें बुलाया और मैं पथभ्रष्ठों को (अपना) सहायक नहीं बनाता। (18:51)

    पिछली आयत में शैतान के संरक्षण को नकारने के बाद इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि सृष्टि को अस्तित्व में लाने में शैतान और उसके साथियों की कोई भूमिका नहीं थी और उन्हें सृष्टि के रहस्यों के बारे में कोई ज्ञान नहीं है कि वे अपनी शक्ति के आधार पर सृष्टि के संचालन में हस्तक्षेप कर सकें।

    शैतान और उसके साथी मनुष्यों की ही भांति कमज़ोर और अधिक ज्ञान न रखने वाले जीव हैं जो कभी भी तुम्हारी सहायता और तुम्हारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते बल्कि मूल रूप से इस संसार में हर बुराई की जड़ शैतान और उसके साथी ही हैं जिनका सृष्टि की व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है। इसके विपरीत फ़रिश्तों को ईश्वर ने संसार के अनेक मामलों के संचालन का काम दे रखा है।

    इस आयत से हमने सीखा कि मानव का संरक्षण, उसके सृष्टिकर्ता का अधिकार है और उसके अतिरिक्त कोई अन्य मनुष्य का संरक्षक नहीं है।

    जो लोग ईश्वर के मार्ग पर चलते हैं वे ईश्वर ही की भांति अत्याचारियों से सहायता नहीं लेते और अपनी स्वाधीनता की रक्षा करते हैं।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 52 और 53 की तिलावत सुनें।

    وَيَوْمَ يَقُولُ نَادُوا شُرَكَائِيَ الَّذِينَ زَعَمْتُمْ فَدَعَوْهُمْ فَلَمْ يَسْتَجِيبُوا لَهُمْ وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ مَوْبِقًا (52) وَرَأَى الْمُجْرِمُونَ النَّارَ فَظَنُّوا أَنَّهُمْ مُوَاقِعُوهَا وَلَمْ يَجِدُوا عَنْهَا مَصْرِفًا (53)

    और (याद करो उस समय को) जिस दिन ईश्वर (अनेकेश्वरवादियों से) कहेगा कि बुलाओ मेरे उन समकक्षों को जिनके बारे में तुम सोचते थे (कि वे मेरे समकक्ष हैं) तो वे जितना भी उन्हें पुकारेंगे वे उत्तर नहीं देंगे और हम उनके बीच एक विनाशकारी ठिकाना बना देंगे। (18:52) और अपराधी नरक (की आग) को देखेंगे तो उन्हें विश्वास हो जाएगा कि वे उसमें जाएंगे और वे उससे वापसी और बच निकलने का कोई मार्ग नहीं पाएंगे। (18:53)

    यह आयतें कहती हैं कि शैतान का अनुसरण और स्वयं पर उसके वर्चस्व को स्वीकार करने से मनुष्य अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त होता है और अनन्य ईश्वर से दूर होता जाता है। ऐसे लोग ईश्वर के स्थान पर धनवान और शक्ति संपन्न लोगों का अनुसरण करते हैं जबकि प्रलय में इस प्रकार के लोग दूसरों की मुक्ति की तो बात ही अलग है, स्वयं की मुक्ति में भी सक्षम नहीं होंगे।

    सैद्धांतिक रूप से ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी प्रलय में किसी के काम नहीं आ सकेगा और जो भी इस संसार में ईश्वर को छोड़ कर किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु से सहायता चाहेगा वह प्रलय में भटक रहा होगा क्योंकि वह उन्हें जितना भी पुकारेगा, उनकी ओर से उसे कोई उत्तर नहीं मिलेगा। इस प्रकार के लोगों के लिए तबाही और बर्बादी तथा नरक की आग के अतिरिक्त कोई ठिकाना नहीं होगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि यदि हम ईश्वर को पुकारेंगे तभी हमें उत्तर मिलेगा, चाहे वह लोक हो या परलोक किंतु यदि हम दूसरों को पुकारेंगे तो संभव है कि इस संसार में हमें उनकी ओर से उत्तर मिल जाए किंतु वे प्रलय में हमारी पुकार का उत्तर देने में सक्षम नहीं हैं।

    अनेकेश्वरवाद का मुख्य कारण निराधार आस्थाएं हैं। बुद्धिमान, विवेकपूर्ण और सही समझ रखने वाला व्यक्ति कभी भी अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त नहीं होता