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    सूरए कह्फ़, आयतें 54-56, (कार्यक्रम 515)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 54 की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ صَرَّفْنَا فِي هَذَا الْقُرْآَنِ لِلنَّاسِ مِنْ كُلِّ مَثَلٍ وَكَانَ الْإِنْسَانُ أَكْثَرَ شَيْءٍ جَدَلًا (54)

    और निश्चित रूप से हमने इस क़ुरआन में हर उपमा विभिन्न प्रकार से बयान कर दी है किंतु (इसके बावजूद) मनुष्य सबसे अधिक झगड़ालू है। (18:54)

    इससे पहले की आयतों में काफ़िरों द्वारा ईश्वरीय आदेशों की अवहेलना की चर्चा की ओर संकेत के पश्चात यह आयत कहती है कि ईश्वर ने क़ुरआने मजीद में अतीत के लोगों के इतिहास और उनके जीवन की कटु व मीठी घटनाओं के विभिन्न नमूनों का वर्णन किया है ताकि लोगों के लिए शिक्षा सामग्री बने और सत्य स्वीकार करने के लिए तत्पर हृदय सत्य को स्वीकार कर लें।

    खेद के साथ कहना पड़ता है कि कुछ लोग सत्य को स्वीकार करने के स्थान पर उससे टकराव के लिए तैयार हो जाते हैं। वे तर्कसंगत बात को स्वीकार करने के बजाए लड़ने झगड़ने लगते हैं। वे सोचते हैं कि इस प्रकार वे अपनी अंतरात्मा को शांत कर लेंगे व अपनी उद्दंडता का औचित्य खोज लेंगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए पिछली जातियों के लोगों की विभिन्न घटनाओं को उदाहरणों और उपमाओं के रूप में प्रस्तुत किया है।

    यदि मनुष्य में सत्य को स्वीकार करने की भावना न हो तो वह उसके मुक़ाबले और टकराव के लिए तैयार हो जाता है और उसे जितना भी समझाने का प्रयास किया जाए उसके टकराव में वृद्धि ही होती जाती है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 55 की तिलावत सुनें।

    وَمَا مَنَعَ النَّاسَ أَنْ يُؤْمِنُوا إِذْ جَاءَهُمُ الْهُدَى وَيَسْتَغْفِرُوا رَبَّهُمْ إِلَّا أَنْ تَأْتِيَهُمْ سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ الْعَذَابُ قُبُلًا (55)

    और जब लोगों के पास मार्गदर्शन आ गया तो उन्हें ईमान लाने और अपने पालनहार से क्षमा मांगने से केवल इसी बात ने रोका कि उन तक उनके पूर्वजों की शैली आ जाए या फिर वे (ईश्वरीय) दंड को अपने समक्ष देख लें। (18:55)

    यह आयत काफ़िरों के द्वेष एवं हठधर्म की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वे सत्यको देखते और समझते हैं किंतु उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते। ऐसा प्रतीत होता है कि सत्य के मुक़ाबले में जो उन्हें विनम्र बना सकती है वह केवल यह है कि पिछली जातियों का अंजाम उनकी आंखों के सामने आ जाए और वे यह आभास करने लगें कि उनका अंत होने वाला है या फिर आकाश और धरती से सामने आने वाले ईश्वरीय दंड को अपनी आंखों से देख लें और फिर ईमान लाने की घोषणा करें।

    किंतु स्पष्ट है कि इस प्रकार के ईमान का कोई मूल्य नहीं है क्योंकि यह अपने चयन से नहीं बल्कि भय के कारण लाया गया ईमान है। यह आयत वस्तुतः एक शुभ सूचना और एक चेतावनी देती है, शुभ सूचना यह कि यदि वे तौबा कर लें और अपने पिछले पापों पर ईश्वर से क्षमा मांग कर प्रायश्चित करें तो ईश्वर उनकी तौबा को स्वीकार कर लेगा और चेतावनी यह है कि यदि उन्होंने सत्य के मुक़ाबले में गतिरोध से काम लिया तो उनका भी वही परिणाम होगा जो उनसे पहले वाली जातियों का हुआ था किंतु हठधर्मी काफ़िर किसी भी शुभसूचना या चेतावनी पर ध्यान नहीं देते।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने आसमानी किताबें और अपने पैग़म्बर भेज कर लोगों को मार्गदर्शन की राह दिखा दी है ताकि किसी के पास इस संबंध में कोई बहाना न रहे।

    पापों का प्रायश्चित ईश्वरीय दंड को रोक देता है।

    हर स्थान पर उपदेश और तर्क काम नहीं आता बल्कि कहीं कहीं दंड देना भी आवश्यक होता है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत क्रमांक 56 की तिलावत सुनें।

    وَمَا نُرْسِلُ الْمُرْسَلِينَ إِلَّا مُبَشِّرِينَ وَمُنْذِرِينَ وَيُجَادِلُ الَّذِينَ كَفَرُوا بِالْبَاطِلِ لِيُدْحِضُوا بِهِ الْحَقَّ وَاتَّخَذُوا آَيَاتِي وَمَا أُنْذِرُوا هُزُوًا (56)

    और हम पैग़म्बरों को शुभ सूचना देने वाला और डराने वाला बना कर ही भेजते हैं और काफ़िर असत्य के माध्यम से उनसे टकराते हैं ताकि उससे सत्य का दमन कर दें और उन्होंने मेरी आयतों और जिन बातों के माध्यम से उन्हें डराया गया है, उनका परिहास किया है। (18:56)

    इस आयत में क़ुरआने मजीद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को सांत्वना देते हुए कहता है कि आप इन लोगों के कुफ़्र के कारण दुखी न हों क्योंकि पैग़म्बरों का दायित्व केवल लोगों को स्वर्ग की शुभ सूचना देना और नरक से डराना है तथा लोगों को इस बात का अधिकार प्राप्त है कि वे सत्य को स्वीकार करते हुए ईमान ले आएं या उसका इन्कार करके काफ़िर बन जाएं।

    स्वाभाविक है कि कुछ लोग अपने चयन के अधिकार से ग़लत लाभ उठाते हैं और ईश्वर पर ईमान लाने के स्थान पर उसका इन्कार कर देते हैं। इसके अतिरिक्त वे प्रयास करते हैं कि सत्य को ही समाप्त करके असत्य को उसका स्थान दे दें। विरोधियों की एक चाल ईमान वालों और क़ुरआनी आयतों का परिहास करना है जिनमें लोगों को प्रलय की शुभ सूचना दी गई है तथा नरक से डराया गया है। काफ़िर अपने विचार में इन सभी पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं और कहते हैं कि परलोक से कौन आया है और इस प्रकार के समाचार लाया है कि तुम लोग नरक के भय से संसार में ऐश्वर्यपूर्ण जीवन नहीं बिताते?

    इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का काम लोगों को ईमान लाने पर विवश करना नहीं बल्कि उनका मार्गदर्शन करना तथा उन्हें उपदेश देना है।

    विरोधियों का साधन तर्क नहीं बल्कि परिहास और लड़ाई झगड़ा है।

    हमें अपनी कथनी और करनी का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि धार्मिक शिक्षाओं का परिहास, ईश्वरीय आयतों के परिहास के अर्थ में है और क़ुरआने मजीद ने इस काफ़िरों की पहचान बताया है।