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    सूरए कह्फ़, आयतें 57-61, (कार्यक्रम 516)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 57 की तिलावत सुनें।

    وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنْ ذُكِّرَ بِآَيَاتِ رَبِّهِ فَأَعْرَضَ عَنْهَا وَنَسِيَ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ إِنَّا جَعَلْنَا عَلَى قُلُوبِهِمْ أَكِنَّةً أَنْ يَفْقَهُوهُ وَفِي آَذَانِهِمْ وَقْرًا وَإِنْ تَدْعُهُمْ إِلَى الْهُدَى فَلَنْ يَهْتَدُوا إِذًا أَبَدًا (57)

    और उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा जिसे उसके पालनहार की निशानियों की ओर से सचेत किया जाए और वह (उन्हें स्वीकार करने के स्थान पर) उनसे मुंह मोड़ ले तथा जो कुछ उसने पहले किया है, उसे भुला दे? निश्चित रूप से हमने ऐसे लोगों के हृदयों पर परदे डाल दिए हैं ताकि वह (सत्य को) न समझ सकें और उनके कानों को बहरा बना दिया है तो यदि आप उन्हें मार्गदर्शन की ओर बुलाएंगे तो भी वे कदापि उस ओर नहीं आएंगे। (18:57)

    इससे पहले हमने कहा था कि पैग़म्बरों का दायित्व केवल लोगों का मार्गदर्शन और उन्हें नसीहत करना है तथा उन्हें किसी को ईमान लाने पर विवश करने का अधिकार नहीं है। स्वाभाविक सी बात है कि बहुत सारे लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते किंतु कुछ लोग ईश्वर का इन्कार करने के साथ ही पैग़म्बरों तथा उनके अनुयाइयों का परिहास भी करते हैं तथा धर्मावलंबियों से टकराते भी हैं।

    यह आयत कहती है कि जो लोग सत्य को समझने और जानने के बावजूद उससे मुंह मोड़ लेते हैं वस्तुतः उन्होंने अपनी आंखों और कानों को बंद कर रखा है और इसी कारण सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके परिणाम स्वरूप उनका कभी भी मार्गदर्शन नहीं होता क्योंकि वे स्वयं ही मार्गदर्शन के इच्छुक नहीं होते। सोए हुए व्यक्ति और बन कर सोए हुए व्यक्ति में बड़ा अंतर है। सोए हुए व्यक्ति को पुकार कर जगाया जा सकता है किंतु जो बन कर सो रहा हो वह किसी भी स्थिति में अपनी झूठी नींद से नहीं जागता।

    इस आयत से हमने सीखा कि पापों व पिछले ग़लत कर्मों की ओर से निश्चेतना, मनुष्य की आत्मा को अंधकारमयी बना देती है और मनुष्य धार्मिक वास्तविकताओं का इन्कार करने लगता है।

    वास्तविकताओं को जानने और समझने की क्षमता खो देना, ईश्वरीय दंड है जिसमें ईश्वरीय निशानियों की ओर से निश्चेत और लापरवाह रहने वाले लोग ग्रस्त होते हैं।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 58 और 59 की तिलावत सुनें।

    وَرَبُّكَ الْغَفُورُ ذُو الرَّحْمَةِ لَوْ يُؤَاخِذُهُمْ بِمَا كَسَبُوا لَعَجَّلَ لَهُمُ الْعَذَابَ بَلْ لَهُمْ مَوْعِدٌ لَنْ يَجِدُوا مِنْ دُونِهِ مَوْئِلًا (58) وَتِلْكَ الْقُرَى أَهْلَكْنَاهُمْ لَمَّا ظَلَمُوا وَجَعَلْنَا لِمَهْلِكِهِمْ مَوْعِدًا (59)

    और आपका पालनहार अत्यंत क्षमाशील और दयावान है, यदि वह लोगों को उनके द्वारा किए गए कर्मों के कारण दंडित करना चाहता तो तुरंत ही उनके लिए दंड भेज देता किंतु उसने उनके लिए एक समय निर्धारित किया है और जब वह समय आ जाएगा तो उन्हें ईश्वर की दया व कृपा के अतिरिक्त वापसी का कोई मार्ग नहीं मिलेगा। (18:58) और जब इन बस्ती वालों ने अत्याचार किया तो हमने उन्हें विनष्ट कर दिया और उनके विनाश के लिए हमने पहले ही से एक समय निर्धारित कर रखा था। (18:59)

    पिछली आयतों का क्रम जारी रखते हुए यह आयतें कहती हैं कि इस संसार में अत्याचारियों व पापियों का विनाश करने वाला दंड विशेष अवसरों पर आता है। मूल सिद्धांत यह है कि ईश्वर अपनी दया के आधार पर लोगों को दंडित करने में जल्दी नहीं करता और इस संसार में उनके पापों के कारण उनसे हिसाब-किताब नहीं करता।

    दूसरे शब्दों में ईश्वर अपनी दया के कारण पापियों को इस बात का अवसर व समय देता है कि वे अपने पिछले कर्मों को सुधार लें और तौबा व प्रायश्चित द्वारा ईश्वर की ओर लौट आएं किंतु यदि वे इस ईश्वरीय अवसर से लाभ न उठाएं तो फिर ईश्वर अपने न्याय के साथ उनके मामले को देखता है और उन्हें दंडित करता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर मूल रूप से लोगों के साथ दया व क्षमा का व्यवहार करता है किंतु कुछ लोग स्वयं ही ईश्वरीय दया से लाभान्वित होने का मार्ग अपने लिए बंद कर देते हैं।

    ईश्वर की ओर से दी गई मोहलत पर पापियों को घमंड नहीं करना चाहिए और उसने जो अवसर दिया है उससे अनुचित लाभ नहीं उठाना चाहिए क्योंकि ईश्वर की ओर से दी गई मोहलत के समाप्त होने के पश्चात उनके पास दंड से बचने का कोई मार्ग नहीं होगा।

    समाजों व सभ्यताओं का पतन, स्वयं उन्हीं के बुरे कर्मों और अत्याचार व भ्रष्टाचार के प्रचलन के कारण होता है।

    अत्याचार ग्रस्तों को ईश्वरीय दया की ओर से निराश नहीं होना चाहिए और इसी प्रकार अत्याचारियों को भी ईश्वर की ओर से दी गई मोहलत पर घमंड नहीं करना चाहिए।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 60 और 61 की तिलावत सुनें।

    وَإِذْ قَالَ مُوسَى لِفَتَاهُ لَا أَبْرَحُ حَتَّى أَبْلُغَ مَجْمَعَ الْبَحْرَيْنِ أَوْ أَمْضِيَ حُقُبًا (60) فَلَمَّا بَلَغَا مَجْمَعَ بَيْنِهِمَا نَسِيَا حُوتَهُمَا فَاتَّخَذَ سَبِيلَهُ فِي الْبَحْرِ سَرَبًا (61)

    और (हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब मूसा ने अपने साथी से कहा कि मैं अपनी खोज तब तक जारी रखूंगा जब तक दो सागरों के संगम तक न पहुंच जाऊं, चाहे इसक लिए वर्षों का समय ही क्यों न लग जाए। (18:60) तो जब वे दो सागरों के संगम पर पहुंचे तो अपनी मछली को भूल गए और मछली सागर में अपने मार्ग पर चलती चली गई। (18:61)

    क़ुरआने मजीद इन आयतों से ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत मूसा तथा ख़िज़्र की घटना का वर्णन आरंभ करता है। इस घटना में बहुत सी महत्वपूर्ण बातें निहित हैं। घटना इस प्रकार से आरंभ होती है कि ईश्वर, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पास अपना विशेष संदेश वहि भेज कर कहता है कि ख़िज़्र नाम का एक व्यक्ति है जिसका ज्ञान, उनके ज्ञान से कहीं अधिक है। हज़रत मूसा उनसे भेंट करने और उनके ज्ञान के सागर से लाभ उठाने की इच्छा जताते हैं।

    ईश्वर की ओर से संदेश आता है कि दो सागरों का संगम उनकी भेंट का स्थान है तथा उन्हें हज़रत ख़िज़्र को खोजने के लिए एक टोकरी में एक मछली रख कर उसे अपने साथ ले जाना होगा, जिस स्थान पर उन्हें वह मछली दिखाई न दे, वही स्थान भेंट स्थल होगा।

    हज़रत मूसा अलैहिस्सालम और उनके साथी हज़रत यूशा, हज़रत ख़िज़्र से भेंट के लिए रवाना हुए और सागर के तट पर पहुंचे। हज़रत मूसा एक चट्टान के किनारे सो गए किंतु उनके साथी यूशा जागते रहे। उन्होंने देखा कि उनके साथ मौजूद मछली पानी में कूद गई किंतु चूंकि हज़रत मूसा सो रहे थे इस लिए हज़रत यूशा ने उन्हें नहीं जगाया।

    जब हज़रत मूसा अलैहिस्सला जागे तो हज़रत यूशा यह बताना भूल गए कि मछली पानी में कूद गई है। दोनों आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर जाने के बाद हज़रत मूसा ने कहा कि कुछ खाने के लिए लाओ। उसी समय हज़रत यूशा को मछली वाली बात याद आ गई और उन्होंने हज़रत मूसा को पूरी बात बता दी। इसके पश्चात दोनों ने यह तै किया कि उसी स्थान पर वापस चला जाए जहां मछली पानी में कूदी थी। इस घटना की आगे की बातें, सूरए कह्फ़ की अगली आयतों में वर्णित हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के पैग़म्बर भी ज्ञान प्राप्ति के इच्छुक रहते थे और इस कार्य के लिए यात्रा की कठिनाइयां भी सहन करते थे।

    ज्ञान प्राप्ति के इच्छुक को, विद्वान व ज्ञानी की प्रतीक्षा में नहीं रहना चाहिए बल्कि उसके पास जाना चाहिए। ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में खोज व प्रयास से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए।