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    सूरए कह्फ़, आयतें 62-66, (कार्यक्रम 517)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 62 और 63 की तिलावत सुनें।

    فَلَمَّا جَاوَزَا قَالَ لِفَتَاهُ آَتِنَا غَدَاءَنَا لَقَدْ لَقِينَا مِنْ سَفَرِنَا هَذَا نَصَبًا (62) قَالَ أَرَأَيْتَ إِذْ أَوَيْنَا إِلَى الصَّخْرَةِ فَإِنِّي نَسِيتُ الْحُوتَ وَمَا أَنْسَانِيهُ إِلَّا الشَّيْطَانُ أَنْ أَذْكُرَهُ وَاتَّخَذَ سَبِيلَهُ فِي الْبَحْرِ عَجَبًا (63)

    और जब वे (सागर के तट से) गुज़र गए तो मूसा ने अपने युवा (साथी) से कहा कि हमारा भोजन ले आओ कि निश्चित रूप से इस यात्रा से हमें बहुत कठिनाइयां सहन करनी पड़ी हैं। (18:62) उसने कहा कि क्या तुम्हें वह समय याद है जब हम चट्टान की शरण में गए थे और मैं (उस मछली के बारे में बताना) भूल गया था (जो पानी में कूद गई थी) और शैतान के अतिरिक्त किसी अन्य ने मुझे यह बात नहीं भुलाई और वह मछली बड़े विचित्र रूप से सागर में अपने मार्ग पर चलती चली गई। (18:63)

    इससे पहले हमने कहा था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम, हज़रत ख़िज़्र से भेंट करने के लिए नगर से बाहर निकले और सागर के तट पर कुछ देर तक आराम करने के बाद पुनः आगे बढ़ गए। उनके भेंट स्थल का चिन्ह यह था कि उनके साथ मौजूद मछली जिस स्थान पर पानी में कूद कर दृष्टि से ओझल हो जाए, वहीं उन्हें हज़रत ख़िज़्र की प्रतीक्षा करनी होगी। जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम एक चट्टान की ओट में आराम कर रहे थे उसी समय वह मछली पानी में कूद गई और हज़रत मूसा के साथी उन्हें यह बात बताना भूल गए।

    ये आयतें कहती हैं कि जब वे दोनों सागर से दूर हो गए तो हज़रत मूसा को भूख का आभास हुआ और उन्होंने उस मछली को पका कर खाने का इरादा किया। उसी समय उनके साथी को मछली के पानी में कूदने की बात याद आई और उन्होंने हज़रत मूसा को वह बात बता दी।

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन में अनेक कठिन यात्राएं की थीं जिनमें से पहली यात्रा फ़िरऔन के चंगुल से फ़रार होने की थी। उसी यात्रा में वे ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत शुऐब तक पहुंचे थे और फिर उनकी सुपुत्री से उनका विवाह हुआ था।

    उनकी दूसरी यात्रा मिस्र की ओर वापसी की थी और इसी यात्रा में उन्हें ईश्वर ने अपना पैग़म्बर बनाया था। तीसरी यात्रा, ईश्वरीय ग्रंथ तौरैत की प्राप्ति के लिए तूर नामक पर्वत की यात्रा थी और वर्तमान यात्रा उनकी चौथी यात्रा थी जिसमें उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और उनके समक्ष कई नए प्रश्न आए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ज्ञान की प्राप्ति और ज्ञानियों से भेंट के लिए पैग़म्बरों को भी कठिनाइयां सहन करनी पड़ी हैं जबकि वे स्वयं ईश्वरीय ज्ञान के सोते से जुड़े हुए थे।

    मनुष्य की प्रगति और ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग में जिन्नों और मनुष्यों के शैतान रुकावटें डालते हैं और विभिन्न रूपों में कार्य करते हैं।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 64 और 65 की तिलावत सुनें।

    قَالَ ذَلِكَ مَا كُنَّا نَبْغِ فَارْتَدَّا عَلَى آَثَارِهِمَا قَصَصًا (64) فَوَجَدَا عَبْدًا مِنْ عِبَادِنَا آَتَيْنَاهُ رَحْمَةً مِنْ عِنْدِنَا وَعَلَّمْنَاهُ مِنْ لَدُنَّا عِلْمًا (65)

    मूसा ने कहा कि वह वही स्थान था जिसे हम खोज रहे थे। तो वे दोनों उसी मार्ग पर अपने पद चिन्हों को (देखते हुए) लौट गए। (18:64) तो उन्हें वहां हमारे बंदों में से एक बंदा मिला जिसे हमने अपनी ओर से महान दया व कृपा प्रदान की थी और उसे अपनी ओर से अत्यधिक ज्ञान सिखाया था। (18:65)

    जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम इन मामलों को समझ गए तो वे अपने साथी के साथ सागर के तट पर वापस लौटे और उसी स्थान पर उन्हें हज़रत ख़िज़्र मिले जिनके ज्ञान व तत्वदर्शिता से उन्होंने लाभ उठाया।

    इस बात में मतभेद है कि हज़रत ख़िज़्र पैग़म्बर थे अथवा नहीं? किंतु कुछ कारणों से यह बात सिद्ध होती है कि वे भी पैग़म्बर थे क्योंकि हज़रत मूसा जैसे पैग़म्बर के शिक्षक को भी पैग़म्बर ही होना चाहिए ताकि उसकी कथनी और करनी मूसा के लिए ठोस तर्क रहे। दूसरे यह कि क़ुरआने मजीद ने पैग़म्बरों के संबंध में अधिकांशतः अब्द अर्थात दास व बंदे का शब्द प्रयोग किया है और इस आयत में हज़रत ख़िज़्र के लिए भी यही शब्द प्रयोग हुआ है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इस आयत में कहा गया है कि उनका ज्ञान ईश्वर की ओर से है और पैग़म्बरों के अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि कुछ ज्ञान ऐसे होते हैं जो बुद्धि और अनुभव से प्राप्त नहीं होते बल्कि पैग़म्बरों के ज्ञान की भांति उन्हें केवल ईश्वरीय ज्ञान के स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है।

    धर्म का ज्ञान ऐसे व्यक्ति से अर्जित करना चाहिए जो ईश्वर का दास हो और मनुष्य को ईश्वर से निकट करे।

    लोगों के बीच ईश्वर के बहुत से अज्ञात व अपरिचित ज्ञानी मौजूद होते हैं और यदि हम सही ढंग से खोजें तो उनका पता लगाकर उनके ज्ञान व तत्वदर्शिता से लाभान्वित हो सकते हैं।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 66 की तिलावत सुनें।

    قَالَ لَهُ مُوسَى هَلْ أَتَّبِعُكَ عَلَى أَنْ تُعَلِّمَنِ مِمَّا عُلِّمْتَ رُشْدًا (66)

    मूसा ने ख़िज़्र से कहा कि क्या तुम इस बात की अनुमति देते हो कि मैं तुम्हारे पीछे आऊं ताकि जो कुछ तुम्हें सिखाया गया है उसका कुछ भाग विकास के लिए मुझे सिखा दो? (18:66)

    इस कठिनाई भरी यात्रा से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम विकास एवं परिपूर्णता तक पहुंचना चाहते थे, अतः जैसे ही उन्होंने हज़रत ख़िज़्र को देखा तो अपने ध्येय को बयान कर दिया और उनसे शिष्य बनने की अनुमति चाही ताकि शिक्षक के प्रति शिष्य के आदर का पालन करें। उन्होंने स्वयं को हज़रत ख़िज़्र के प्रति विनम्र दर्शाया कि यह पैग़म्बरों के शिष्टाचार का भाग है।

    यद्यपि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम स्वयं ईश्वर के बड़े पैग़म्बरों में से एक हैं और ईश्वर की ओर से उन्हें विशेष पंथ व आसमानी किताब प्रदान की गई है किंतु अप्रत्यक्ष वास्तविकताओं और ईश्वर की गुप्त तत्वदर्शिताओं को प्राप्त करने के लिए उन्हें भी किसी का शिष्य बनना और ज्ञान प्राप्त करना पड़ता है, अलबत्ता वह ऐसा ज्ञान है जो विकास व परिपूर्णता का कारण बने न कि घमंड और अहंकार का।

    इस आयत से हमने सीखा ज्ञान से लाभान्वित होने और परिपूर्णता तक पहुंचने के संबंध में पैग़म्बरों के दर्जे अलग-2 होते हैं तथा उनके ज्ञान में वृद्धि की संभावना पाई जाता है।

    विकास व परिपूर्णता तक पहुंचने के लिए ज्ञान व ईश्वर की पहचान आवश्यक है।

    शिष्य को शिक्षक के समक्ष विनम्र रहना चाहिए ताकि जो कुछ वह सीखे वह उसके विकास एवं परिपूर्णता का कारण बन सके।