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    सूरए कह्फ़, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 505)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर सात और आठ की तिलावत सुनें।

    إِنَّا جَعَلْنَا مَا عَلَى الْأَرْضِ زِينَةً لَهَا لِنَبْلُوَهُمْ أَيُّهُمْ أَحْسَنُ عَمَلًا (7) وَإِنَّا لَجَاعِلُونَ مَا عَلَيْهَا صَعِيدًا جُرُزًا (8)

    निश्चित रूप से जो कुछ धरती पर है, उसे हमने उसकी शोभा बनाया है ताकि उनकी परीक्षा लें कि उनमें से कर्म की दृष्टि से कौन बेहतर है। (18:7) और निश्चय ही अंततः जो कुछ धरती पर है उसे हम मिट्टी और बंजर भूमि बना देने वाले हैं। (18:8)

    इससे पहले हमने कहा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम लोगों के अत्यंत हितैषी थे और जब कुछ लोग ईमान नहीं लाते थे तो यह बात उनके लिए बहुत कठिन होती थी। यहां तक कि ईश्वर ने अपने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहा कि चूंकि वे लोग ईमान नहीं ला रहे हैं इस लिए ऐसा प्रतीत होता है कि दुख से आप अपने आपको मिटा डालेंगे।

    यह आयतें कहती हैं कि ईश्वर ने धरती और जो कुछ उसमें है, उसे इस प्रकार बनाया है कि कुछ लोग स्वाभाविक रूप से उसकी ओर आकृष्ट होकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और ईश्वर व प्रलय को भूल जाते हैं। यह ऐसी स्थिति में है कि संसार और उसमें पाई जाने वाली समस्त वस्तुएं अस्थाई और नश्वर हैं और एक दिन ऐसा आएगा जब धोखा देने वाली इन वस्तुओं का कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा। वस्तुतः यह अनुकंपाएं, भौतिक वस्तुएं और सांसारिक चकाचौंध, मनुष्य की परीक्षा का साधन हैं ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि कौन लोग इन अनुकंपाओं से लाभ उठा कर अच्छे बल्कि सर्वोत्तम कर्म करते हैं और कौन लोग पाप, बुराई और तबाही के प्रयास में रहते हैं।

    अल्बत्ता यह संसार सदैव एकसमान नहीं रहता, कभी सुख तो कभी दुख, कभी प्रसन्नता तो कभी व्याकुलता, कभी सरलता तो कभी कठिनाई और सैद्धांतिक रूप से इन विभिन्न परिस्थितियों में ही परीक्षा का सही अर्थ सामने आता है ताकि लोगों की आंतरिक क्षमताएं बाहर आएं और वे सवयं को बेहतर ढंग से पहचानें।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सांसारिक शोभाएं नश्वर हैं और उन्हें स्थायित्व प्राप्त नहीं है। भले कर्म करने के लिए उनसे लाभ उठाया जा सकता है किंतु उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि अंततः सभी मिट्टी में मिलने वाली हैं।

    सभी अनुकंपाएं और संभावनाएं, मनुष्य की परीक्षा का साधन हैं क्योंकि जो कुछ ईश्वर ने मनुष्य को दिया है उन सबसे मनुष्य के लिए कोई न कोई उत्तरदायित्व उत्पन्न होता है और हर किसी को अपने पास मौजूद वस्तुओं के अनुपात में ही उत्तरदायी होना पड़ेगा।

    भले कर्म करते समय उसकी मात्रा नहीं गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है, ईश्वर ने हमसे सबसे अच्छे कर्मों की मांग की है सबसे अधिक कर्मों की नहीं।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 9 और 10 की तिलावत सुनें।

    أَمْ حَسِبْتَ أَنَّ أَصْحَابَ الْكَهْفِ وَالرَّقِيمِ كَانُوا مِنْ آَيَاتِنَا عَجَبًا (9) إِذْ أَوَى الْفِتْيَةُ إِلَى الْكَهْفِ فَقَالُوا رَبَّنَا آَتِنَا مِنْ لَدُنْكَ رَحْمَةً وَهَيِّئْ لَنَا مِنْ أَمْرِنَا رَشَدًا (10)

    क्या तुम यह समझते हो कि गुफा और तख़ती वाले हमारी अद्भुत निशानियों में से थे? (18:9) जब उन साहसी युवाओं ने गुफा में जा कर शरण ली और कहा कि हे हमारे पालनहार! हमें अपनी ओर से दया प्रदान कर और हमारे मामले में हमें सफलता प्रदान कर। (18:10)

    सूरै कह्फ़ के परिचय में हमने कहा था कि क़ुरैश के सरदारों ने अपने दो लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के बारे में खोज-बीन के लिए मदीना नगर के यहूदी धर्मगुरुओं के पास भेजा। यहूदी धर्मगुरुओं ने उनसे कहा कि तुम मुहम्मद से तीन प्रश्न पूछो, यदि उन्होंने उनके सही उत्तर दे दिए तो इसका अर्थ यह होगा कि वे पैग़म्बर हैं अन्यथा वे झूठे हैं। पहला प्रश्न युवाओं के एक गुट के बारे में था कि जो अपनी जाति से अलग हो गए थे। उन लोगों ने पैग़म्बर से उन युवाओं के बारे में पूछा। पैग़म्बर ने कहा कि वे कल इसका उत्तर देंगे किंतु उन्होंने इनशाअल्लाह शब्द का प्रयोग नहीं किया। ईश्वर की ओर से इस प्रश्न का उत्तर आने में पंद्रह दिन बीत गए। यह बात पैग़म्बर के लिए बहुत कठिन थी।

    असहाबे कह्फ़ या गुफा वाले, कुछ ईमान वाले लोग थे जो बहुत ऐश्वर्य का जीवन बिता रहे थे किंतु अपने धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने संसार से मुंह मोड़ लिया और एक पर्वत पर जा कर शरण ली। वहां उन्होंने एक गुफा में जीवन बिताना आरंभ किया। इस संबंध में अधिक ब्योरे का अगली आयतों में उल्लेख होगा।

    इन आयतों में असहाबे कह्फ़ के नाम के साथ ही रक़ीम शब्द का भी उल्लेख हुआ है। इस शब्द के बारे में विभिन्न कथन हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जिस पर्वत और स्थान पर इन लोगों ने शरण ली थी उसका नाम रक़ीम था। कुछ का कहना है कि असहाबे रक़ीम और असहाबे कह्फ़ एक ही हैं, इस दृष्टि से कि जिस गुफा में उन्होंने शरण ली थी उसमें एक तख़ती पर उनके नाम लिखे पाए गए और वह तख़ती गुफा के द्वार पर लग गई थी। अरबी भाषा में तख़ती को रक़ीम भी कहा जाता है। जैसा कि इतिहास में आया है कि असहाबे कह्फ़ की घटना हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के काल के पश्चात उस क्षेत्र में घटी जिस पर रोम का शासन था और उस समय के अत्याचारी शासक का नाम दक़ियानूस था।

    क़ुरआने मजीद इन आयतों में, असहाबे कह्फ़ को, जिन्होंने अपने धर्म व ईमान की रक्षा के लिए अपने नगर से गुफा की ओर पलायन किया था, फ़ता कह कर पुकारा है जिसका अर्थ होता है साहसी युवा। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम का कथन है कि असहाबे कह्फ़ में से कुछ वृद्ध भी थे किंतु उन्हें उनके ईमान के कारण साहसी युवा कहा गया है।

    क़ुरआने मजीद ने असहाबे कह्फ़ की घटना का वर्णन, गुफा की ओर उनके पलायन के समय से आरंभ किया है और उनके अतीत के बारे में कुछ नहीं कहा है किंतु पलायन के समय उनकी प्रार्थना से पता चलता है कि उनका लक्ष्य राजनैतिक व पारिवारिक विवाद अथवा कोई अन्य बात नहीं बल्कि परिपूर्णता प्राप्त करना था। वे अपनी आस्था की रक्षा के लिए ईश्वर की ओर से मुक्ति के किसी मार्ग की खोज में थे, ऐसे मार्ग की खोज में जिसपर उन्हें ईश्वरीय दया व कृपा प्राप्त हो, चाहे उन्हें जीवन में कठिनाइयां ही क्यों न उठानी पड़ें।

    इन आयतों से हमने सीखा कि धर्म की रक्षा, अपने घर व परिवार की रक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है। यदि इसके लिए अपने स्थान से पलायन भी करना पड़े तो मनुष्य को ऐसा ही करना चाहिए।

    प्रार्थना, कर्म व प्रयास के साथ ही सार्थक होती है। असहाबे कह्फ़ ने पहले पलायन किया फिर ईश्वरीय दया व कृपा की प्रार्थना की।

    धर्म की संस्कृति में साहस का अर्थ धर्म की रक्षा के लिए संसार को छोड़ना तथा मान्यताओं की रक्षा के लिए बुरे वातावरण से पलायन करना है।