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    सूरए कह्फ़, आयतें 79-82, (कार्यक्रम 520)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 79 की तिलावत सुनें।

    أَمَّا السَّفِينَةُ فَكَانَتْ لِمَسَاكِينَ يَعْمَلُونَ فِي الْبَحْرِ فَأَرَدْتُ أَنْ أَعِيبَهَا وَكَانَ وَرَاءَهُمْ مَلِكٌ يَأْخُذُ كُلَّ سَفِينَةٍ غَصْبًا (79)

    जहां तक बात उस नौका की है तो वह कुछ दरिद्रों की थी जो समुद्र में काम करते हैं तो मैंने उसमें ख़राबी पैदा करनी चाही क्योंकि उनके पीछे एक शासक आ रहा था जो हर नौका को ज़बदस्ती छीन रहा था। (18:79)

    इससे पहले हमने कहा था कि हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने तीन विचित्र बातें की थीं जिन्हें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम सहन न कर सके और उन्होंने आपत्ति कर दी। तीसरी आपत्ति के बाद हज़रत ख़िज़्र ने कहा कि अब हम दोनों का साथ चलना संभव नहीं है और हमें एक दूसरे से यहीं अलग हो जाना चाहिए, किंतु अलग होने से पहले मैं अपने तीनों कामों के कारण तुम्हें बताना चाहता हूं।

    हज़रत ख़िज़्र ने कहा कि जिस नौका में हम लोग सवार थे वह कुछ दरिद्र लोगों की थी जो समुद्र में यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया करते हैं। मुझे ज्ञान था कि समुद्र की दूसरी ओर से एक अत्याचारी शासक इस ओर आ रहा था। चूंकि वह युद्ध में व्यस्त था इस लिए उसे नौकाओं की आवश्यकता थी और वह शक्ति के बल पर सबकी नौकाएं छीन रहा था। इसी कारण मैंने उस नौका में छेद कर दिया ताकि वह शासक उस नौका को न छीने और बाद में उस नौका के मालिक उसकी मरम्मत कर लें। अतः तुमने नौका में छेद करने के मेरे कार्य के केवल विदित रूप को देखा जबकि मैंने उस कार्य के परिणाम को देखा और नौका की रक्षा की।

    अलबत्ता स्पष्ट है कि हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने नौका में इस प्रकार से छेद नहीं किया था कि वह डूब जाए बल्कि उन्होंने उसमें थोड़ी सी ख़राबी पैदा कर दी थी ताकि वह अत्याचारी शासक उस नौका को उसके मालिकों से न छीने। यह कार्य छोटी बुराई से बड़ी बुराई को टालने का एक उदाहरण है और पूर्ण रूप से तर्कसंगत है।

    इस आयत से हमने सीखा कि तत्वदर्शी मनुष्य कभी कोई व्यर्थ काम नहीं करता चाहे साधारण लोग उसके काम पर आपत्ति ही क्यों न करें।

    ईश्वर के प्रिय बंदे वंचितों और दरिद्रों से सहानुभूति रखते हैं और अतिग्रहणकारियों से उनकी संपत्ति की रक्षा के लिए प्रयास करते हैं।

    कार्यों में महत्वपूर्ण और अधिक महत्वपूर्ण का ध्यान रखना आवश्यक है तथा छोटी बुराई से बड़ी बुराई को टालना इसका एक उदाहरण है।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 80 और 81 की तिलावत सुनें।

    وَأَمَّا الْغُلَامُ فَكَانَ أَبَوَاهُ مُؤْمِنَيْنِ فَخَشِينَا أَنْ يُرْهِقَهُمَا طُغْيَانًا وَكُفْرًا (80) فَأَرَدْنَا أَنْ يُبْدِلَهُمَا رَبُّهُمَا خَيْرًا مِنْهُ زَكَاةً وَأَقْرَبَ رُحْمًا (81)

    और रहा वह युवा, (जिसकी मैंने हत्या की) तो उसके माता-पिता दोनों ही मोमिन थे और हमें भय था कि वह उन्हें कुफ़्र और उद्दंडता पर प्रेरित कर दे। (18:80) तो हमने चाहा कि उन दोनों का पालनहार उन्हें उससे अधिक पवित्र व अधिक प्रेम करने वाला पुत्र प्रदान कर दे। (18:81)

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईश्वर की ओर से यह दायित्व था कि वे ईश्वरीय ज्ञान और तत्वदर्शिता के आधार पर कार्य करें अतः वे उस युवा की हत्या को धार्मिक क़ानूनों के आधार पर वैध नहीं समझते थे क्योंकि उसने अभी कोई पाप किया ही नहीं था कि उसे दंडित किया जाता। दूसरे शब्दों में हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने उस युवा को पाप करने से पहले ही दंडित कर दिया था।

    किंतु यदि यह बात स्वीकार कर ली जाए कि ईश्वर सभी वस्तुओं और रचनाओं का स्वामी एवं रचयिता है तथा उसे अपनी तत्वदर्शिता के आधार पर किसी की जान लेने का अधिकार है तो उसने हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम को इस ईश्वरीय आदेश के क्रियान्वयन का दायित्व सौंपा था तथा इसका कारण, उस युवा का कुफ़्रमय भविष्य बताया था।

    अलबत्ता ईश्वर ने उस युवा के बदले में उसके माता पिता को एक अन्य पुत्र प्रदान किया जिससे उनका पवित्र एवं मोमिन वंश आगे बढ़ा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि उद्दंडी एवं बेईमान पुत्र के होने से उसका न होना अच्छा है।

    यदि ईश्वर किसी मोमिन से कोई वस्तु लेता है तो उससे उत्तम वस्तु उसे प्रदान करता है, अतः हमें आशावान और संयमी होना चाहिए।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 82 की तिलावत सुनें।

    وَأَمَّا الْجِدَارُ فَكَانَ لِغُلَامَيْنِ يَتِيمَيْنِ فِي الْمَدِينَةِ وَكَانَ تَحْتَهُ كَنْزٌ لَهُمَا وَكَانَ أَبُوهُمَا صَالِحًا فَأَرَادَ رَبُّكَ أَنْ يَبْلُغَا أَشُدَّهُمَا وَيَسْتَخْرِجَا كَنْزَهُمَا رَحْمَةً مِنْ رَبِّكَ وَمَا فَعَلْتُهُ عَنْ أَمْرِي ذَلِكَ تَأْوِيلُ مَا لَمْ تَسْطِعْ عَلَيْهِ صَبْرًا (82)

    और रही वह दीवार, तो वह उस नगर के दो अनाथ बालकों की थी और उसके नीचे उन दोनों के लिए एक ख़ज़ाना था। और उन दोनों का पिता एक भला व्यक्ति था तो तुम्हारे पालनहार ने चाहा कि वे दोनो बालक वयस्कता को पहुंच जाएं और फिर अपने ख़ज़ाने को बाहर निकालें कि जो तुम्हारे पालनहार की ओर से दया (स्वरूप) था और मैंने इन कार्यों को अपनी ओर से नहीं किया। यह था उन बातों का रहस्य और तर्क जिन पर तुम धैर्य नहीं कर सके। (18:82)

    पिछली आयत में हमने कहा था कि हज़रत ख़िज़्र को ईश्वर की ओर से यह दायित्व दिया गया था कि वे एक दंपति के ईमान की रक्षा के लिए उसके पुत्र की हत्या कर दें जबकि यह आयत पिता के मोमिन एवं भले होने के कारण, उसके पुत्रों पर ईश्वरीय कृपा की ओर संकेत करती है और कहती है कि ख़िज़्र जैसे पैग़म्बर को ईश्वर की ओर से यह दायित्व दिया गया था कि वे उनकी संपत्ति की रक्षा करें।

    इस आयत में जो बात अधिक महत्वपूर्ण है वह यह है कि हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कहा कि हे मूसा! यह कार्य मैंने अपनी इच्छा से और अपने ज्ञान पर भरोसा करते हुए नहीं किए बल्कि इसका मुझे ईश्वर की ओर से आदेश दिया गया था।

    जी हां, जिस प्रकार से फ़रिश्तों को ईश्वर की ओर से मनुष्यों के मामलों की देख-रेख का दायित्व दिया गया है और वे उनके जन्म व मृत्यु के बारे में ईश्वरीय आदेश के अनुसार निर्णय करते हैं उसी प्रकार हज़रत ख़िज़्र ने भी ये सारे काम इस लिए किए कि हज़रत मूसा जैसे पैग़म्बर को इस बात पर दृढ़ विश्वास हो जाए कि संसार की हर वस्तु ईश्वरीय इच्छा के अधीन है।

    इस आयत से हमने सीखा कि बच्चों के लिए संपत्ति एकत्रित करना वैध है और अनाथों की संपत्ति की रक्षा करना आवश्यक है।

    पिता के अच्छे कर्म, संतान के भविष्य में प्रभावी होते हैं और उसकी मृत्यु से उसके अच्छे कर्म समाप्त नहीं हो जाते।

    जीवन की सभी कटु एवं मधुर घटनाओं का कोई न कोई तर्क होता है और संभव है कि वह तर्क हमारी आंखों से छिपा हुआ हो अतः हमें ईश्वर पर अकारण आपत्ति नहीं करनी चाहिए।