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    सूरए कह्फ़, आयतें 83-88, (कार्यक्रम 521)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 83, 84 और 85 की तिलावत सुनें।

    وَيَسْأَلُونَكَ عَنْ ذِي الْقَرْنَيْنِ قُلْ سَأَتْلُو عَلَيْكُمْ مِنْهُ ذِكْرًا (83) إِنَّا مَكَّنَّا لَهُ فِي الْأَرْضِ وَآَتَيْنَاهُ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ سَبَبًا (84) فَأَتْبَعَ سَبَبًا (85)

    और (हे पैग़म्बर!) वे आपसे ज़ुलक़रनैन के बारे में प्रश्न करते हैं, कह दीजिए कि मैं शीघ्र ही तुम्हें उनके वृत्तांत (का कुछ भाग) सुना दूंगा। (18:83) निश्चित रूप से हमने ज़ुलक़रनैन को धरती में प्रभुत्व (व शासन) और हर वस्तु का साधन (व उसे प्रयोग करने की क्षमता) प्रदान की थी। (18:84) तो उन्होंने उन साधनों (व क्षमता) को (उचित ढंग से) प्रयोग किया। (18:85)

    असहाबे कह्फ़ और हज़रत मूसा व ख़िज़्र के वृत्तांत का उल्लेख करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों और इसके बाद की कुछ आयतों में ज़ुलक़रनैन की घटना का वर्णन करता है। जैसा कि इस सूरे की व्याख्या आरंभ करते समय हमने कहा था कि मक्के के अनकेश्वरवादियों ने मदीने के यहूदियों से परामर्श के बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की परीक्षा लेने के लिए ऐतिहासिक आयाम वाले तीन विषय प्रस्तुत किए थे।

    उनमें से एक ज़ुलक़रनैन का विषय था। अतः ये आयतें आरंभ में कहती हैं कि हे पैग़म्बर! ये लोग आपसे ज़ुलक़रनैन के बारे में प्रश्न करते हैं तो इनके उत्तर में कह दीजिए कि मैं तुम्हें उनके वृत्तांत का एक भाग सुनाता हूं। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें ईश्वर ने सभी प्रकार की संभावनाएं व सूचनाएं प्रदान कर रखी थीं ताकि वे प्रकृति से अधिकतम एवं उत्तम लाभ उठा सकें। उन्होंने ईश्वर द्वारा प्रदान की गई इस शक्ति व क्षमता को लोगों की सेवा के लिए प्रयोग किया।

    इस संबंध में कई बातें वर्णित हैं कि उन्हें ज़ुलक़रनैन अर्थात दो सींगों वाला क्यों कहा गया है। उनमें से एक यह है कि चूंकि वे अपने बालों को दो सींगों की भांति गूंधा करते थे इस लिए उन्हें ज़ुलक़रनैन कहा जाता है। कुछ का कहना है कि क़रनैन या दो सींगों से तात्पर्य पूरब और पश्चिम है और चूंकि उन्होंने पूरब और पश्चिम की यात्रा की थी और दोनों दिशाओं पर उनका नियंत्रण था, इसी लिए उन्हें ज़ुलक़रनैन कहा जाता है।

    क़ुरआने मजीद के कुछ व्याख्याकारों ने तौरैत की कुछ आयतों और इतिहासकारों की राय के आधार पर कहा है कि ज़ुलक़रनैन, वस्तुतः प्राचीन ईरानी शासक कोरूश या साइरस का ही दूसरा नाम है जबकि कुछ अन्य ने उन्हें सिकन्दर महान बताया है। ये दोनों ही शासक, इतिहास की दृष्टि से एक ही काल के हैं और लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व जीवन व्यतीत करते थे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि प्राकृतिक संभावनाओं से लाभान्वित होने के लिए वैज्ञानिक एवं औद्योगिक क्षमता की प्राप्ति, ईश्वरीय अनुकंपाओं में से एक है जो ईश्वर अपने कुछ बंदों को प्रदान करता है।

    अतीत के लोगों के इतिहास और इतिहास रचने वाले लोगों के बारे में ज्ञान की प्राप्ति, अनुभव, नसीहत एवं पाठ सामग्री है।

    प्रकृति की व्यवस्था कारण और कारक की व्यवस्था है। हर वस्तु का एक कारण और साधन होता है जिसे पहचानना और समझना चाहिए।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 86, 87 और 88 की तिलावत सुनें।

    حَتَّى إِذَا بَلَغَ مَغْرِبَ الشَّمْسِ وَجَدَهَا تَغْرُبُ فِي عَيْنٍ حَمِئَةٍ وَوَجَدَ عِنْدَهَا قَوْمًا قُلْنَا يَا ذَا الْقَرْنَيْنِ إِمَّا أَنْ تُعَذِّبَ وَإِمَّا أَنْ تَتَّخِذَ فِيهِمْ حُسْنًا (86) قَالَ أَمَّا مَنْ ظَلَمَ فَسَوْفَ نُعَذِّبُهُ ثُمَّ يُرَدُّ إِلَى رَبِّهِ فَيُعَذِّبُهُ عَذَابًا نُكْرًا (87) وَأَمَّا مَنْ آَمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَلَهُ جَزَاءً الْحُسْنَى وَسَنَقُولُ لَهُ مِنْ أَمْرِنَا يُسْرًا (88)

    (ज़ुलक़रनैन ने अपनी यात्रा जारी रखी) यहां तक कि वे सूर्यास्त के स्थान पर पहुंचे जहां उन्हें लगा कि सूर्य एक काले कीचड़ वाले सोते में अस्त हो रहा है। और उन्हें वहां एक जाति मिली, हमने उनसे कहा कि हे ज़ुलक़रनैन! तुम इन लोगों को दंडित करोगे या इनके संबंध में अच्छा व्यवहार अपनाओगे। (18:86) उन्होंने कहा कि जो कोई अत्याचार करेगा तो शीघ्र ही हम उसे दंडित करेंगे फिर उसे उसके पालनहार की ओर लौटा दिया जाएगा कि जो उसे अत्यंत कड़ा दंड देगा। (18:87) और जो कोई ईमान ले आएगा और भले कर्म करेगा तो उसके लिए बड़ा अच्छा प्रतिफल है और शीघ्र ही हम उससे अपने मामले में सरलता के बारे में कहेंगे। (18:88)

    इन आयतों के आधार पर ज़ुलक़रनैन अपनी यात्रा जारी रखते हुए एक ऐसे क्षेत्र में पहुंचे जहां समुद्र तट की भांति सूर्यास्त होता था। यह क्षेत्र एक दलदल के निकट था और ऐसा प्रतीत होता था कि सूर्य उसमें डूबता है। इस क्षेत्र में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के लोग रहते थे। ज़ुलक़रनैन को, जिनके बारे में यह भी संभावना है कि वे पैग़म्बर थे, ईश्वर की ओर से यह दायित्व सौंपा गया कि वे उसे क्षेत्र के अच्छे लोगों को इसी संसार में पारितोषिक दें और बुरे लोगों को दंडित करें।

    यद्यपि कर्मों पर पारितोषिक व दंड देना ईश्वरीय मामलों में से है और इसका मुख्य स्थान प्रलय है किंतु ईश्वर ने ज़ुलक़रनैन को इसकी अनुमति दी कि वे ईश्वरीय ज्ञान और लोगों के कर्मों के बारे में संपूर्ण सूचना के साथ उन्हें इसी संसार में उनके कर्मों का फल दे दें। अलबत्ता यह बात प्रलय में मिलने वाले वास्तविक प्रतिफल का विकल्प नहीं है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि यात्रा व पर्यटन यदि उद्देश्यपूर्ण और लाभदायक हो तो क़ुरआने मजीद की पुष्टि का पात्र है बल्कि क़ुरआन ने इस पर बल दिया है।

    ईश्वर के प्रिय बंदों के पास उसकी ओर से दिए गए कुछ विशेष अधिकार होते हैं जिन्हें वे उचित अवसरों पर प्रयोग कर सकते हैं।

    क़ुरआनी संस्कृति में कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद, स्वयं पर अत्याचार है क्योंकि इन आयतों में अत्याचार को ईमान के मुक़ाबले में रखा गया है।

    आम लोगों के साथ शासकों का व्यवहार, सरलता एवं उनके आराम के आधार पर होना चाहिए और शासकों को केवल दुष्ट लोगों के साथ कड़ाई करनी चाहिए।

    न्याय का क्रियान्वयन, ईश्वर के प्रिय बंदों का सबसे बड़ा दायित्व है, ताकि भले लोगों का प्रोत्साहन हो और बुरे लोग सचेत हो जाएं।