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    सूरए कह्फ़, आयतें 89-94, (कार्यक्रम 522)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 89, 90 और 91 की तिलावत सुनें।

    ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَبًا (89) حَتَّى إِذَا بَلَغَ مَطْلِعَ الشَّمْسِ وَجَدَهَا تَطْلُعُ عَلَى قَوْمٍ لَمْ نَجْعَلْ لَهُمْ مِنْ دُونِهَا سِتْرًا (90) كَذَلِكَ وَقَدْ أَحَطْنَا بِمَا لَدَيْهِ خُبْرًا (91)

    फिर ज़ुलक़रनैन ने एक अन्य (यात्रा का) साधन किया। (18:89) यहां तक कि वे सूर्योदय के स्थान तक पहुंच गए तो उन्होंने देखा कि वह एक ऐसी जाति पर उदय कर रहा है जिसके लिए हमने धूप के अतिरिक्त कोई अन्य आड़ नहीं रखी थी। (18:90) और इस प्रकार हमें उनके पास जो कुछ संभावनाएं थीं, उनके बारे में पूर्ण ज्ञान था। (18:91)

    इससे पहले हमने कहा था कि ज़ुलक़रनैन नामक ईश्वर के एक प्रिय बंदे को ईश्वर की ओर से कुछ विशेष ज्ञान व संभावनाएं प्राप्त थीं और वे विश्व के विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा करते थे तथा लोगों की समस्याओं का समाधान करते थे। उन्होंने पश्चिम की यात्रा और वहां के लोगों के बीच न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करने के पश्चात पूरब की भी यात्रा की जिसकी ओर इन आयतों में संकेत किया गया है।

    जिस क्षेत्र में ज़ुलक़रनैन गए थे वहां जीवन आरंभिक था और संभावनाएं न होने के बराबर थीं। वहां के लोगों के पास घर या सिर छुपाने के लिए कोई ठिकाना नहीं था बल्कि इतिहास में है कि उनके पास पहनने के लिए वस्त्र भी नहीं थे और धूप सीधे उनके शरीर पर पड़ती थी। क़ुरआने मजीद में इस बात का उल्लेख नहीं है कि ज़ुलक़रनैन ने वहां पर क्या किया किंतु वह उस क्षेत्र के लोगों के जीवन की परिस्थितियों का वर्णन करता है ताकि उस समय की ऐतिहासिक व भौगोलिक स्थिति स्पष्ट हो जाए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदे वंचित लोगों की मुक्ति तथा कल्याण व न्याय के प्रसार के लिए प्रयास करते थे।

    समाज के शासकों को विभिन्न क्षेत्रों में जा कर निकट से लोगों की समस्याओं व अभावों का निरीक्षण करना चाहिए तथा उनकी कठिनाइयों को दूर करने के लिए प्रयास करना चाहिए।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 92, 93 और 94 की तिलावत सुनें।

    ثُمَّ أَتْبَعَ سَبَبًا (92) حَتَّى إِذَا بَلَغَ بَيْنَ السَّدَّيْنِ وَجَدَ مِنْ دُونِهِمَا قَوْمًا لَا يَكَادُونَ يَفْقَهُونَ قَوْلًا (93) قَالُوا يَا ذَا الْقَرْنَيْنِ إِنَّ يَأْجُوجَ وَمَأْجُوجَ مُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ فَهَلْ نَجْعَلُ لَكَ خَرْجًا عَلَى أَنْ تَجْعَلَ بَيْنَنَا وَبَيْنَهُمْ سَدًّا (94)

    फिर ज़ुलक़रनैन ने एक अन्य (यात्रा का) साधन किया। (18:92) यहां तक कि वे दो पर्वतों के बीच एक क्षेत्र में पहुंचे। उन दोनों पर्वतों के पीछे उन्हें एक जाति मिली जो मानो कोई बात ही नहीं समझती थी। (18:93) उन लोगों ने कहा कि हे ज़ुलक़रनैन, याजूज और माजूज यहां अत्यधिक तबाही मचाते हैं, तो क्या यह संभव है कि हम आपको इस बात के लिए ख़र्चा दें कि आप हमारे और उनके बीच एक बांध बना दें? (18:94)

    ये आयतें तीसरे क्षेत्र की ओर संकेत करती हैं जहां ज़ुलक़रनैन पहुंचे। क़ुरआने मजीद के अनुसार इस क्षेत्र के लोग सभ्यता व विचार की दृष्टि से इतने पिछड़े हुए थे कि न तो बात करना जानते थे और न ही कोई बात समझ पाते थे। उस समय की सभ्यताओं से दूर वह क्षेत्र दो पर्वतों के बीच स्थित था। वहां के लोगों का अन्य जातियों से कोई संपर्क नहीं था। फ़ारसी भाषा में ऐसे व्यक्ति के लिए जिसे आज की सभ्यता का कोई ज्ञान न हो, एक मुहावरा है कि गूया अज़ पुश्ते कूह आमदे अर्थात मानो वह पहाड़ के पीछे से आया है।

    उन लोगों ने हज़रत ज़ुलक़रनैन को देख कर, जिनके पास अत्यधिक शक्ति व संभावनाएं थीं, उनसे अनुरोध किया कि वे उन दो पर्वतों के बीच एक ऐसी रुकावट बना दें कि जिसे याजूज व माजूज नामक पाश्विक प्रवृत्ति की जाति के लोग पार न कर पाएं। याजूज व माजूज उस क्षेत्र में आकर बहुत अधिक तबाही फैलाते थे। उन लोगों ने ज़ुलक़रनैन से कहा कि आप इस कार्य के लिए हमसे जितना भी ख़र्च मांगेंगे, हम आपके हवाले करेंगे।

    चूंकि इस जाति के परिचय में क़ुरआने मजीद ने कहा था कि इस जाति के लोग कोई बात नहीं समझते थे, इस लिए स्वाभाविक रूप से उन्होंने अपना अनुरोध संकेत इत्यादि जैसे किसी दूसरे रूप में प्रस्तुत किया होगा या फिर यह कि ज़ुलक़रनैन ईश्वरीय संदेश से उनकी इस आवश्यकता और अनुरोध को समझे होंगे।

    रोचक बात यह है कि ज़ुलक़रनैन ने इस पिछड़ी हुई जाति के अनुरोध का सकारात्मक उत्तर दिया और जैसा कि अगली आयतों में वर्णन होगा, एक अत्यंत ठोस एवं मज़बूत बांध बनाया जो क़ुरआने मजीद के शब्दों में अब भी बाक़ी है। इससे पता चलता है कि किसी समाज के लोगों की सुरक्षा कितनी महत्वपूर्ण है और ईश्वरीय नेताओं का दायित्व है कि वे लोगों के लिए एक शांत व सुरक्षित जीवन को सुनिश्चित बनाएं चाहे इसमें कितनी ही कठिनाई और ख़र्च हो तथा इसका कोई आर्थिक लाभ न हो।

    अल्बत्ता ज़ुलक़रनैन ने भी लोगों की सम्मिलिति के बिना यह कार्य नहीं किया और इस बड़ी परियोजना में लोगों का सहयोग लिया ताकि वे इस कार्य के महत्व को बेहतर ढंग से समझ सकें। भौगोलिक समीक्षाओं के अनुसार यह बांध काकेशिया में एक पर्वत श्रंखला के बीच है कि जो एक दीवार की भांति उत्तर को दक्षिण से अलग करती है।

    इस संबंध में विभिन्न दृष्टिकोण पाए जाते हैं कि ज़ुलक़रनैन कौन थे? इस बारे में दो विचार सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, प्रथम यह कि वे सिकंदर महान थे जिसने संसार के पूरब और पश्चिम की अनेक यात्राएं की थीं और विभिन्न युद्धों में विजय प्राप्त की थी, किंतु इतिहास में सिकंदर के हाथों इस प्रकार के किसी बांध के निर्माण का प्रमाण नहीं मिलता।

    दूसरा विचार, जिसकी तौरैत से भी किसी सीमा तक पुष्टि होती है और जो प्रसिद्ध इतिहासकारों के लेखों के भी अनुकूल है, यह है कि ज़ुलक़रनैन, ईरानी के हख़ामनेशी शासक कोरूश महान ही का दूसरा नाम है। कोरूश भी ऐसी ही टोपी पहनता था जिस पर दो सींग बने हुए थे और उसने पूरब और पश्चिम की अनेक यात्राएं की थीं और उसने काकेशिया के क्षेत्र में एक मज़बूत दीवार का निर्माण किया था।

    2- इन आयतों से हमने सीखा कि जब कभी लोग आवश्यक समझते हैं, किसी भी कार्य में सम्मिलिति और पूंजीनिवेश के लिए तैयार हो जाते हैं। शासकों को भी जनता की मांग पर गंभीर रूप से ध्यान देना चाहिए।

    1- आवास और वस्त्र की आवश्यकता पर प्राथमिकता सुरक्षा रखती है। जिन लोगों के पास घर और वस्त्र नहीं था उन्हें भी आशा थी कि उनकी सुरक्षा की जाएगी।