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    सूरए कह्फ़, आयतें 95-101, (कार्यक्रम 523)

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    आइये पहले सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 95 और 96 की तिलावत सुनें।

    قَالَ مَا مَكَّنِّي فِيهِ رَبِّي خَيْرٌ فَأَعِينُونِي بِقُوَّةٍ أَجْعَلْ بَيْنَكُمْ وَبَيْنَهُمْ رَدْمًا (95) آَتُونِي زُبَرَ الْحَدِيدِ حَتَّى إِذَا سَاوَى بَيْنَ الصَّدَفَيْنِ قَالَ انْفُخُوا حَتَّى إِذَا جَعَلَهُ نَارًا قَالَ آَتُونِي أُفْرِغْ عَلَيْهِ قِطْرًا (96)

    ज़ुलक़रनैन ने (उनके उत्तर में) कहा कि जो कुछ ईश्वर ने मुझे प्रदान किया है वह (तुम्हारी आर्थिक सहायता से) उत्तम है तो तुम लोग अपनी शक्ति से मेरी सहायता करो ताकि मैं तुम्हारे और उनके बीच एक सुदृढ़ बांध बना सकूं। (18:95) (तो जाओ) मेरे लिए लोहे के टुकड़े ले कर आओ। जब दोनों पर्वतों के बीच (का स्थान लोहे के टुकड़ों से बराबर व) एक समान हो गया तो ज़ुलक़रनैन ने कहा कि (इसमें आग लगाकर इसे) फूंको, यहां तक कि (लोहे के टुकड़े पिघल कर) आग हो जाएं। इसके बाद उन्होंने कहा कि पिघला हुआ तांबा लाओ ताकि मैं उसे इस (पिघले हुए लोहे) पर डाल दूं। (18:96)

    इससे पहले हमने कहा कि एक क्षेत्र के लोगों ने, जिन पर सदैव याजूज व माजूज नामक जंगली जातियां आक्रमण करती रहती थीं, हज़रत ज़ुलक़रनैन से अनुरोध किया कि वे दो पर्वतों के बीच स्थित उस स्थान को बंद कर दें जहां से उन पर आक्रमण किया जाता था।

    ये आयतें कहती हैं कि हज़रत ज़ुलक़रनैन ने कहा कि इस कार्य के लिए तुम्हें स्वयं आगे आना होगा और सक्रिय ढंग से भाग लेना होगा। उन्होंने कहा कि अपने शक्तिशाली लोगों को मेरे हवाले करो ताकि मैं लोहे और तांबे को मिला कर एक ऐसी दीवार बना दूं जिसे पार करना याजूज व माजूज के लिए संभव नहीं होगा। मुझे तुमसे आर्थिक सहायता की अपेक्षा नहीं है क्योंकि ईश्वर ने मुझे जो कुछ प्रदान किया है वह उससे उत्तम है जो तुम मुझे देना चाहते हो।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदे सांसारिक मामलों में भी लोगों की समस्याओं के समाधान हेतु स्वयं को उत्तरदायी समझते हैं, विशेष कर सुरक्षा संबंधी मामलों पर उनका विशेष ध्यान रहा है।

    योजनाओं एवं परियोजनाओं के क्रियान्वयन में लोगों की सहायता लेना तथा उन्हें सहभागी बनाना अत्यंत आवश्यक है ताकि उनके बीच सहयोग की भावना भी जागृत हो और वे उस कार्य के मूल्य को भी सही ढंग से समझ सकें।

    केवल संभावनाओं, धन और श्रमबल का होना पर्याप्त नहीं है बल्कि एक एक उपयुक्त एवं सक्षम प्रबंधक का होना भी आवश्यक है ताकि वह कार्यों को सही ढंग से आगे बढ़ाए और वांछित परिणाम निकाले। हज़रत ज़ुलक़रनैन के उस क्षेत्र में पहुंचने से पहले भी वहां सभी संभावनाएं थीं किंतु उनके जैसा प्रबंधक नहीं था।

    आइये अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 97 और 98 की तिलावत सुनें।

    فَمَا اسْطَاعُوا أَنْ يَظْهَرُوهُ وَمَا اسْتَطَاعُوا لَهُ نَقْبًا (97) قَالَ هَذَا رَحْمَةٌ مِنْ رَبِّي فَإِذَا جَاءَ وَعْدُ رَبِّي جَعَلَهُ دَكَّاءَ وَكَانَ وَعْدُ رَبِّي حَقًّا (98)

    तो (लोहे व तांबे की उस दीवार के निर्माण के पश्चात याजूज और माजूज) न तो उस दीवार पर चढ़ सके और न ही उसमें सेंध लगा सके। (18:97) ज़ुलक़रनैन ने कहा कि यह कार्य मेरे पालनहार की ओर से दया है तो जब भी मेरे पालनहार के वचन के पूरे होने का समय आ जाएगा तो वह इस बांध को भूसा बना देगा और मेरे पालनहार का वचन पूरा होकर ही रहेगा। (18:98)

    ये आयतें तीन बातों की ओर संकेत करती हैं, प्रथम यह कि हज़रत ज़ुलक़रनैन द्वारा बनाया गया बांध इतना मज़बूत एवं ऊंचा था कि याजूज व माजूज नामक आक्रमणकारी जातियां न तो उसे पार कर सकती थीं न हीं उसमें सेंध लगा सकती थीं। उस बांध की ऊंचाई व चौड़ाई इतनी अधिक थी कि कोई भी उस पर नहीं चढ़ सकता था। लोहे व तांबे को मिलाकर बनाई गई धात भी इस प्रकार की थी कि न तो कोई उसे तोड़ सकता था और न ही उसमें कोई छेद कर सकता था।

    दूसरी बात यह कि ज़ुलक़रनैन ने उस काम को न तो स्वयं से संबंधित बताया और न ही लोगों से संबंधित किया बल्कि उसे उस क्षेत्र के लोगों पर ईश्वर की दया व कृपा बताया कि जिसने उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित बना दिया था।

    तीसरी बात यह कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब यह सुदृढ़ बांध टूट जाएगा और यह काम प्रलय के निकट होगा जब धरती पर एक भीषण भूकंप आएगा जिसके चलते पूरी धरती समतल हो जाएगी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि काम को ठोस ढंग से और पूरी गंभीरता से करना, ईश्वर के प्रिय बंदों के चरित्र का भाग है। उदाहरण स्वरूप यह बांध इतना मज़बूत बनाया गया कि प्रलय के भूकंप के अतिरिक्त कोई शक्ति उसे गिरा नहीं सकती।

    ईश्वर के प्रिय बंदे भले कर्म की अपनी व लोगों की क्षमता को ईश्वर की कृपा समझते हैं और कभी भी घमंड में ग्रस्त नहीं होते।

    1- यद्यपि हम प्रलय पर विश्वास रखते हैं किंतु हमें अपने सांसारिक मामलों को पूरी गंभीरता से और ठोस ढंग से पूरा करना चाहिए। हमें अपने संसार के लिए भी प्रयास करना चाहिए और प्रलय की ओर से भी निश्चेत नहीं रहना चाहिए।

    आइये अब अब सूरए कह्फ़ की आयत नंबर 99, 100 और 101 की तिलावत सुनें।

    وَتَرَكْنَا بَعْضَهُمْ يَوْمَئِذٍ يَمُوجُ فِي بَعْضٍ وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَجَمَعْنَاهُمْ جَمْعًا (99) وَعَرَضْنَا جَهَنَّمَ يَوْمَئِذٍ لِلْكَافِرِينَ عَرْضًا (100) الَّذِينَ كَانَتْ أَعْيُنُهُمْ فِي غِطَاءٍ عَنْ ذِكْرِي وَكَانُوا لَا يَسْتَطِيعُونَ سَمْعًا (101)

    और उस दिन हम कुछ लोगों को उनकी स्थिति पर छोड़ देंगे ताकि वे अन्य लोगों के बीच लहर क भांति घुस जाएं और जब सूर फूंका जाएगा तो हम सबको एक साथ एकत्रित करेंगे। (18:99) उस दिन हम काफ़िरों के समक्ष नरक को उस प्रकार प्रस्तुत करेंगे जिस प्रकार प्रस्तुत करना चाहिए। (18:100) ऐसे काफ़िर जिनकी आंखें हमारे स्मरण की ओर से परदों में (बंद) थीं और वे (सत्य को) सुनना भी नहीं चाहते थे। (18:101)

    इन आयतों और सूरए अम्बिया की आयत नंबर 96 पर ध्यान देने से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रलय आने से पहले हज़रत ज़ुलक़रनैन द्वारा बनाया गया बांध टूट जाएगा और याजूज व माजूज नामक जातियां अपने पाश्विक आक्रमण पुनः आरंभ कर देंगी। वे लहर की भांति धरती के एक भाग को अपनी चपेट में ले लेंगी। यहां तक कि पहला सूर फूंका जाएगा तो संसार की हर जीवित वस्तु मर जाएगी और फिर दूसरा सूर फूंका जाएगा तो सभी जीवित होकर प्रलय के मैदान में पहुंच जाएंगे।

    उस दिन काफ़िर नरक में जाएंगे क्योंकि संसार में उनकी आंखें और कान सत्य को देखने और सुनने की क्षमता नहीं रखते थे और वे ईश्वर की ओर से इतने निश्चेत थे कि मानो उनकी आंखों पर परदे पड़ गए थे और वे न तो देख सकते थे और न ही सुन सकते थे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि लोगों के बीच अराजकता एवं जंगली जातियों के पाश्विक आक्रमण, संसार के अंतिम समय के चिन्हों में से हैं।

    संसार की बहुत सी प्राकृतिक बातें, वस्तुएं व घटनाएं, ईश्वर की अनुकंपा, शक्ति व दया की याद दिलाती हैं किंतु अधिकांश लोग इसे नहीं समझते, मानो वे इन बातों को देख ही नहीं रहे हैं।