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    सूरए ताहा, आयतें 1-6, (कार्यक्रम 544)

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    इससे पहले सूरए मरयम की आयतों की व्याख्या समाप्त हुई और इस कार्यक्रम से हम क़ुरआने मजीद के बीसवें सूरे अर्थात सूरए ताहा की आयतों की व्याख्या आरंभ कर रहे हैं। आइये पहले इस सूरे की पहली और दूसरी आयतों की तिलावत सुनें।

    بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ. طه (1) مَا أَنْزَلْنَا عَلَيْكَ الْقُرْآَنَ لِتَشْقَى (2)

    ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। ताहा, (20:1) हमने क़ुरआन को आप पर इस लिए नहीं उतारा है कि आप (स्वयं को) कठिनाई में डालें। (20:2)

    यह सूरा क़ुरआने मजीद के उन उनतीस सूरों में से एक है जो हुरूफ़े मुक़त्तआ से आरंभ हुए हैं जैसे सूरए बक़रह अलिफ़ लाम मीम और सूरए आराफ़ अलिफ़ लाम मीम साद से आरंभ हुए थे। हम इससे पहले भी बता चुके हैं कि ये अक्षर क़ुरआने मजीद के रहस्यों में से हैं और ईश्वर जब चाहेगा, लोगों के सामने इन रहस्यों पर से पर्दा उठाएगा। तब मनुष्य क़ुरआने मजीद की महानता और उसके चमत्कारिक आयाम को अधिक प्रभावी ढंग से समझ सकेगा। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के कुछ कथनों में इनमें से कुछ रहस्यों की ओर संकेत किया गया है।

    यह सूरा ताहा के अक्षरों से आरंभ हुआ है और इन्हीं अक्षरों पर ईश्वर ने इस सूरे का नाम ताहा रखा है। ताहा, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के नामों में से भी एक है जैसा कि दूसरी आयत में उन्हें संबोधित करते हुए बात आरंभ की गई है। मानो ईश्वर ने हे मुहम्मद! कहने के स्थान पर कहा है हे ताहा!

    अगली आयत कहती है कि हमने क़ुरआने मजीद को आपके पास इस लिए नहीं भेजा है कि आप उसकी, तिलावत, क़ेराअत और प्रचार के लिए स्वयं को कठिनाई में डालें। इतिहास में वर्णित है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम रातों में क़ुरआने मजीद की इतनी तिलावत करते थे औ इतनी नमाज़ें पढ़ते थे कि उनके पैर सूज जाया करते थे और उन्हें काफ़ी पीड़ा होती थी। इसी प्रकार वे ईश्वरीय आयतों के प्रचार और उन्हें लोगों तक पहुंचाने हेतु लोगों के मार्गदर्शन की लालसा में स्वयं को इतनी कठिनाई में डालते थे कि इस आयत और कुछ अन्य आयतों ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा कि वे स्वयं को इतना अधिक कठिनाई में क्यों डालते हैं?

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर नहीं चाहता कि उसके बंदे धार्मिक कर्तव्यों के पालन में बहुत अधिक कठिनाई में पड़ें।

    क़ुरआने मजीद लोगों के जीवन के मामलों को कठिनाई में डालने के लिए नहीं आया है बल्कि हर व्यक्ति का दायित्व उसकी क्षमता व शक्ति भर है, उससे अधिक नहीं।

    आइये अब सूरए ताहा कि आयत नंबर 3 और 4 की तिलावत सुनें।

    إِلَّا تَذْكِرَةً لِمَنْ يَخْشَى (3) تَنْزِيلًا مِمَّنْ خَلَقَ الْأَرْضَ وَالسَّمَاوَاتِ الْعُلَا (4)

    (हमने क़ुरआन को ईश्वर से) डरने वालों के लिए (उसे) याद दिलाने का माध्यम बना कर ही उतारा है। (20:3) (यह क़ुरआन) उसकी ओर से क्रमशः उतारा गया है जिसने धरती और ऊंचे आकाशों की रचना की है। (20:4)

    पिछली आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहा गया था कि धर्म व क़ुरआने मजीद के प्रचार के मार्ग में वे अपने आपको कठिनाई में न डालें। ये आयतें कहती हैं कि केवल वही लोग क़ुरआने मजीद से पाठ सीखते हैं जो पापों में ग्रस्त होने की ओर से चिंतित रहते हैं।

    उल्लेखनीय है कि धर्म के मूल आधार और वास्तविकताएं मानव प्रवृत्ति में स्वाभाविक रूप से मौजूद हैं और ईश्वर पर ईमान भी एक स्वाभाविक बात है और हर मनुष्य उसे अपनी अंतरात्मा में देख सकता है। अतः क़ुरआने मजीद की आयतें मनुष्य को स्वाभाविक वास्तविकताओं की याद दिलाती हैं और उसे सांसारिक मामलों में लिप्त होने के कारण उत्पन्न होने वाली निश्चेतना से बाहर निकालती हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य को सदैव इस बात की आवश्यकता है कि कोई उसे ईश्वर की याद दिलाता रहे और क़ुरआने मजीद इसका उत्तम साधन है।

    क़ुरआने मजीद से वही लोग लाभान्वित होते हैं जो अपने मन में पापों की ओर से चिंतित रहते हैं, दायित्व का आभास करते है तथा बुराइयों से दूर रहना चाहते हैं।

    क़ुरआन को भेजने वाला, सृष्टि का रचयिता है। दूसरे शब्दों में धर्म व संसार दोनों का रचयिता एक ही है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत नंबर 5 और 6 की तिलावत सुनें।

    الرَّحْمَنُ عَلَى الْعَرْشِ اسْتَوَى (5) لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَمَا تَحْتَ الثَّرَى (6)

    दयावान (ईश्वर) सिंहासन पर पूरे प्रभुत्व के साथ मौजूद है। (20:5) जो कुछ आकाशों, धरती और उन दोनों के बीच तथा धरती के नीचे है केवल उसी का है। (20:6)

    पिछली आयतों में ईश्वर को आकाशों और धरती का रचयिता बताया गया था। ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर न केवल रचयिता है बल्कि वह शासक भी है और सृष्टि के सभी मामलों का संचालन वही करता है चाहे वे गुप्त बातें हों या स्पष्ट मामले हों।

    इस आयत में प्रयोग होने वाले अर्श शब्द का अर्थ सिंहासन है और चूंकि शासक अपने शासन को लागू करने के लिए सिंहासन पर बैठा करते थे इस लिए यह शब्द सत्ता और शासन लागू करने के संबंध में सांकेतिक रूप से प्रयोग किया जाता है। ये आयतें, संपूर्ण सृष्टि पर ईश्वर के पूर्ण प्रभुत्व और संसार के कण कण पर उसका सिक्का चलने पर बल देती हैं किंतु चूंकि संसार की रचना, लोगों पर प्रभुत्व और ईश्वरीय शासन का आधार, उसकी अनंत दया व कृपा है अतः इन आयतों में ईश्वर ने स्वयं को दयावान कह कर परिचित कराया है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्यों सहित संपूर्ण सृष्टि का संचालन ईश्वरीय दया के आधार पर होता है।

    सृष्टि की हर वस्तु पर ईश्वर का प्रभुत्व एक समान है और सभी उसके आज्ञापालक हैं।