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    सूरए ताहा, आयतें 105-109, (कार्यक्रम 562)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 105वीं से लेकर 107वीं आयतों तक की तिलावत सुनें।

    وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْجِبَالِ فَقُلْ يَنْسِفُهَا رَبِّي نَسْفًا (105) فَيَذَرُهَا قَاعًا صَفْصَفًا (106) لَا تَرَى فِيهَا عِوَجًا وَلَا أَمْتًا (107)

    (हे पैग़म्बरः) वे आपसे पर्वतों के विषय में पूछते हैं। (कि प्रलय में उनका क्या होगा?) कह दीजिए कि मेरा पालनहार उन्हें कण कण बना कर उड़ा देगा। (20:105) फिर धरती को एक समतल व चटियल मैदान बना देगा। (20:106) जिसमें आपको किसी भी प्रकार की ऊँच नीच दिखाई नहीं देगी। (20:107)

    पिछली आयतों में संसार की समाप्ति और प्रलय के आरंभ की घटनाओं की बात की गई थी। ये आयतें प्रलय के दिन धरती की स्थिति की ओर संकेत करती हैं और कहती हैं कि कुछ लोगों के मन में यह प्रश्न था कि किस प्रकार प्रलय के दिन इतने बड़े, विशाल एवं गगनचुंबी पर्वत अपने स्थान से उखड़ जाएंगे?

    ये आयतें उनके उत्तर में कहती हैं कि ईश्वर की शक्ति से, जिसने इस धरती और आकाशों की रचना की है, यह बात अत्यंत सरलता से संभव हो जाएगी कि ये शक्तिशाली एवं ऊंचे पर्वत, रेत की भांति टूट कर हवा में बिखर जाएं, इस प्रकार से कि धरती एकदम चटयल मैदान की भांति हो जाए और उसमें ऊंचाई नाम की कोई वस्तु ही बाक़ी न बचे। यह सब धरती में आने वाले एक भीषण भूकंप के बाद होगा जो हर वस्तु को तबाह कर देगा। ये घटनाएं, प्रलय आने, सभी मरे हुए लोगों के जीवित होने तथा ईश्वर के न्यायालय में उपस्थित होने की भूमिका हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि संसार में पाई जाने वाली व्यवस्था, प्रलय में नष्ट हो जाएगी और एक नई व्यवस्था स्थापित होगी।

    ईश्वर, प्रकृति की व्यवस्था के अधीन नहीं है बल्कि प्रकृति की व्यवस्था, ईश्वर की शक्ति व युक्ति के अधीन है और वह जिस प्रकार से चाहता है उसे चलाता है।

    आइये अब सूरए ताहा की 108वीं आयत की तिलावत सुनें।

    يَوْمَئِذٍ يَتَّبِعُونَ الدَّاعِيَ لَا عِوَجَ لَهُ وَخَشَعَتِ الْأَصْوَاتُ لِلرَّحْمَنِ فَلَا تَسْمَعُ إِلَّا هَمْسًا (108)

    उस दिन सभी लोग, उस पुकारने वाले (फ़रिश्ते) के पीछे चल पड़ेंगे जिसके काम में किसी भी प्रकार का टेढ़ापन न होगा और सभी आवाज़ें दयावान (ईश्वर की महानता) के सामने दब जाएँगी। तो केवल एक हल्की सी आवाज़ के अतिरिक्त कुछ न सुनोगे। (20:108)

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके परिजनों के कथनों के अनुसार ईश्वर का इस्राफ़ील नामक एक फ़रिश्ता सभी लोगों को जीवित होने और प्रलय के मैदान में एकत्रित होने का निमंत्रण देगा और उसका यह कार्य सूर फूंके जाने के माध्यम से होगा।

    स्वाभाविक है कि प्रलय का दृश्य इतना आतंकित करने वाला होगा कि सभी दम साधे होंगे और किसी के मुंह से कोई भी बात नहीं निकल रही होगा। ईश्वर की महानता का वैभव इस प्रकार लोगों पर हावी होगा कि सभी अपने आपको तुच्छ समझ रहे होंगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय का दिन ईश्वर के शासन के प्रतिबिंबन का दिन है और उस दिन सभी उसके समक्ष नतमस्तक होंगे।

    प्रलय में ईश्वरीय निमंत्रण के विरोध या उसके समक्ष गतिरोध की संभावना नहीं है और सभी लोग अपने पैरों से चल कर ईश्वर के न्यायालय में उपस्थित होंगे।

    आइये अब सूरए ताहा की 109वीं आयत की तिलावत सुनें।

    يَوْمَئِذٍ لَا تَنْفَعُ الشَّفَاعَةُ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ الرَّحْمَنُ وَرَضِيَ لَهُ قَوْلًا (109)

    उस दिन (किसी की भी) शेफ़ाअत या सिफ़ारिश काम न आएगी सिवाए उसके जिसे दयावान (ईश्वर) अनुमति दे और उसके बात करने को पसन्द करे। (20:109)

    स्वाभाविक है कि ऐसे स्थान पर उपस्थिति जहां मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं है, इस बात का कारण बनती है कि वह अपनी मुक्ति के लिए कुछ सिफ़ारिश करने वालों के बारे में सोचे किंतु यह आयत कहती है कि किसी को भी प्रलय में शेफ़ाअत या सिफ़ारिश करने का अधिकार नहीं है सिवाए उसके कि जिसे ईश्वर ने अनुमति दी हो और उसका कर्म तथा कथन ईश्वर की प्रसन्नता का पात्र हो।

    मूल रूप से शेफ़ाअत या सिफ़ारिश एक प्रशैक्षिक कार्यक्रम है ताकि लोग एक ओर प्रयास व प्रयत्न करें और दूसरी ओर यदि उनसे कोई ग़लती हो जाए तो निराश न हों। प्रलय में सिफ़ारिश, इस संसार में तौबा व प्रायश्चित के समान है जिसे ईश्वर ने इस लिए रखा है ताकि अपने बंदों को अपनी दया का पात्र बना सके।

    शेफ़ाअत का मूल तर्क यह है कि लोग ईश्वर के प्रिय बंदों से संपर्क रखें तथा उनके आदेशों का पालन करें। जिन लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम व उनके परिजनों की शेफ़ाअत या सिफ़ारिश की आशा है उन्हें स्वाभाविक रूप से इस संसार में उनके पदचिन्हों पर चलना चाहिए। ईश्वर के चुने हुए तथा प्रिय बंदों से भेंट या दर्शन के समय मनुष्य अपने आपसे यह वादा करता है कि वह पिछली ग़लतियों की क्षतिपूर्ति करेगा और भविष्य में उन्हें नहीं दोहराएगा।

    शेफ़ाअत उन लोगों को प्राप्त होती है जो वैचारिक दृष्टि से सही विचार रखते हों और कर्म की दृष्टि से भी धार्मिक शिक्षाओं पर कटिबद्ध हों तथा कभी उनसे ग़लती हो जाए और उन्हें तौबा व प्रायश्चित का अवसर न मिल पाए।

    चूंकि प्रलय में मूल आधार शेफ़ाअत और सिफ़ारिश नहीं बल्कि लोगों का कर्म है अतः क़ुरआने मजीद आरंभ में शेफ़ाअत को नकारता है और फिर उसे उस विशेष स्थिति में वैध बताता है जब शेफ़ाअत करने वाले को भी और जिसकी शेफ़ाअत की जा रही है उसे भी ईश्वर की अनुमति प्राप्त हो।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदों की शेफ़ाअत ईश्वर की इच्छा के विपरीत नहीं बल्कि उसकी अनुमति से किया जाने वाला कार्य है।

    शेफ़ाअत प्रलय में एक ईश्वरीय परंपरा है जिसका मार्ग इस संसार में पैग़म्बरे इस्लाम व उनके परिजनों से संपर्क के माध्यम से प्रशस्त होता है।