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    सूरए ताहा, आयतें 110-114, (कार्यक्रम 563)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 110वीं और 111वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يُحِيطُونَ بِهِ عِلْمًا (110) وَعَنَتِ الْوُجُوهُ لِلْحَيِّ الْقَيُّومِ وَقَدْ خَابَ مَنْ حَمَلَ ظُلْمًا (111)

    जो कुछ उनके सामने है और जो कुछ उनके पीछे है, ईश्वर उससे भली भांति अवगत है किन्तु वे अपने ज्ञान से उस पर हावी नहीं हो सकते। (20:110) और (सभी के) चेहरे (सदैव) जीवित और बाक़ी रहने वाले (ईश्वर) के समझ झुक जाएंगे। और निश्चित रूप से अत्याचार का बोझ उठाने वाला निराश होगा। (20:111)

    इससे पहले हमने कहा था कि लोग प्रलय में ईश्वर के न्यायालय में उपस्थित होंगे और सभी के कर्मों का बड़ी बारीकी से हिसाब-किताब किया जाएगा। ये आयतें कहती हैं कि जो कुछ अपराधियों के सामने है और जो कुछ उन्होंने संसार में छोड़ा है, ईश्वर उन सबसे अवगत है तथा सभी लोगों की बातों, कर्मों तथा नीयतों से पूर्ण रूप से अवगत है किंतु वे अपने ज्ञान से ईश्वर पर किसी भी प्रकार से हावी नहीं हो सकते।

    यही कारण है कि जब लोग प्रलय में ईश्वर के न्यायालय में उपस्थित हो रहे होंगे तो सबके सिर झुके हुए और चेहरे विनम्र होंगे। स्वाभाविक है कि जिन लोगों ने संसार में अपने ऊपर और इसी प्रकार अन्य लोगों पर, पैग़म्बरों पर तथा आसमानी धर्मों पर अत्याचार किया होगा वे ईश्वर की दया की प्राप्ति की ओर से निराश होंगे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि लोगों का चेहरा इस संसार में उनकी पहचान और व्यक्तित्व का परिचायक होता है और यही चेहरा प्रलय में उनके नरकवासी या स्वर्गवासी होने की पहचान होगा।

    तौबा और पापों का प्रायश्चित केवल इसी संसार में संभव है और प्रलय में मुक्ति का कोई मार्ग नहीं होगा। शेफ़ाअत या सिफ़ारिश भी हर पापी या अत्याचारी को नहीं बल्कि केवल उन्हीं लोगों को प्राप्त होगी जो उसके योग्य होंगे।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 112 की तिलावत सुनें।

    وَمَنْ يَعْمَلْ مِنَ الصَّالِحَاتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَا يَخَافُ ظُلْمًا وَلَا هَضْمًا (112)

    और जो कोई इस स्थिति में भले कर्म करे कि वह मोमिन हो तो उसे न तो किसी अत्याचार का भय होगा और न वह किसी प्रकार की कमी (या हक़ मारे जाने) से डरेगा। (20:112)

    पिछली आयत में अपराधियों की स्थिति की ओर संकेत किया गया था कि वे अपने अत्याचार के बोझ को कंधों पर उठाए हुए होंगे और उन्हें ईश्वर की ओर से किसी भी प्रकार की दया की आशा नहीं होगी। यह आयत प्रलय में ईमान वालों की स्थिति की ओर संकेत करते हुए कहती है कि जो लोग इस संसार में अच्छे कर्म करें और बुरे कामों से बचते रहें तो ईश्वर और प्रलय पर ईमान रखने की स्थिति में उन्हें पूरा पूरा पारितोषिक मिलेगा और उसमें किसी भी प्रकार की कमी नहीं होगी और उनका किसी भी प्रकार का अधिकार व्यर्थ नहीं जाएगा।

    धार्मिक संस्कृति में ईमान और सद्कर्मों के बीच अटूट रिश्ता है और वे एक पेड़ की जड़ व फल की भांति हैं बिना कर्म के ईमान, बिना फल वाले पेड़ की भांति है और ईमान के बिना कर्म, उस पेड़ जैसा है जिसकी जड़ ही न हो। मूल रूप से सही आस्था के बिना मनुष्य कोई भला कर्म कर ही नहीं सकता। यदि बिना ईमान व आस्था वाला व्यक्ति कोई भला कर्म करे तो यह उसके भीतर पवित्र ईश्वरीय प्रवृत्ति की निशानी है, यद्यपि वह विदित रूप से ईश्वर का इन्कार करता रहे किंतु उसकी आंतरिक प्रवृत्ति उसे अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित करती रहती है।

    स्वाभाविक है कि इन अच्छे कर्मों का परिणाम मनुष्य को इसी संसार में मिल जाता है और उसके तथा उसके परिजनों के लिए अच्छे सांसारिक जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है किंतु जो व्यक्ति प्रलय का इन्कार करता है क्या वह प्रलय में किसी भी प्रकार के पारितोषिक की मांग कर सकता है? या वह व्यक्ति, जिसने ईश्वर के लिए नहीं बल्कि अपने सांसारिक लक्ष्यों के लिए काम किया है, क्या उसके लिए उचित होगा कि वह ईश्वर की ओर से पारितोषिक की आशा रखे?

    अलबत्ता ईश्वर अत्यंत कृपाशील व दयावान है और इसी लिए वह अच्छी भावना के साथ किए जाने वाले सद्कर्मों पर भी पारितोषिक देगा और अपने बंदे को वंचित नहीं रखेगा किंतु स्पष्ट सी बात है कि ऐसे व्यक्ति का ईश्वर पर कोई अधिकार नहीं होगा क्योंकि वह तो ईश्वर को मानता ही नहीं था और प्रलय पर भी उसकी आस्था नहीं थी।

    इस आयत से हमने सीखा कि जो भी अपनी क्षमता व संभावना के अनुसार भले कर्म करे, उसे ईश्वर की ओर से पारितोषिक प्राप्त होगा, चाहे उसके कर्म कम हों या अधिक।

    भले कर्मों की स्वीकृति की शर्त यह है कि वह कर्म ईमान के आधार पर ईश्वरीय भावना के अंतर्गत किए जाएं।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 113 की तिलावत सुनें।

    وَكَذَلِكَ أَنْزَلْنَاهُ قُرْآَنًا عَرَبِيًّا وَصَرَّفْنَا فِيهِ مِنَ الْوَعِيدِ لَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ أَوْ يُحْدِثُ لَهُمْ ذِكْرًا (113)

    और इस प्रकार हमने इसे अरबी क़ुरआन के रूप में उतारा है और हमने इसमें (लोगों को प्रलय के दंड से) विभिन्न प्रकार से चेतावनी दी है ताकि वे ईश्वर से डरें या कम से कम यह क़ुरआन उन्हें (ईश्वर की) याद दिलाए (20:113)

    प्रलय और ईश्वर के न्यायालय में ईमान वालों तथा अपराधियों से संबंधित आयतों के अंत में ईश्वर कहता कि क़ुरआने मजीद को भेजने का एक लक्ष्य उन बातों का वर्णन है जो लोगों को नरक की ओर ले जाती हैं और इसके लिए हमने लोक-परलोक में विभिन्न जातियों के अंत से उन्हें अवगत कराया है ताकि ईमान वाले लोग, उनसे पाठ सीखें और बुराइयों से दूर रहें।

    पैग़म्बरों का भी दायित्व था कि वे निरंतर लोगों को सचेत कराते और ईश्वर के दंड से डराते रहें ताकि वे जीवन के उतार-चढ़ाव भरे मार्ग में भटक न जाएं और सही रास्ते से विचलित हो कर खाई में न गिर पड़ें।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद प्रशिक्षण की किताब है और प्रशिक्षण के लिए, ख़तरों से डराना व सचेत करना आवश्यक है।

    मनुष्य को सदैव ही चेतावनी दिए जाने की आवश्यकता होती है ताकि वह बहाने बाज़ी न कर सके या कम से कम पाठ सीख सके।

    आइये अब सूरए ताहा की 114वीं आयत की तिलावत सुनें।

    فَتَعَالَى اللَّهُ الْمَلِكُ الْحَقُّ وَلَا تَعْجَلْ بِالْقُرْآَنِ مِنْ قَبْلِ أَنْ يُقْضَى إِلَيْكَ وَحْيُهُ وَقُلْ رَبِّ زِدْنِي عِلْمًا (114)

    तो वास्तविक सम्राट ईश्वर है जो सर्वोच्च है। और (हे पैग़म्बर!) जब तक (ईश्वरीय संदेश) वहि संपूर्ण न हो जाए, क़ुरआन (पढ़ने) के बारे में जल्दी न कीजिए और कहिए कि प्रभुवर! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर। (20:114)

    प्रलय के न्यायालय के बारे में पिछली आयतों की बात जारी रखते हुए इस आयत के आरंभिक भाग में कहा गया है कि प्रलय में ईश्वर का शासन होगा कि जो पूर्ण रूप से सच्चाई और न्याय पर आधारित होगा। यद्यपि वह हर वस्तु व हर व्यक्ति का वास्तविक स्वामी है किंतु वह अपनी रचनाओं के साथ न्याय व तत्वदर्शिता के आधार पर व्यवहार करता है।

    आगे चल कर आयत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास क़ुरआने मजीद के भेजे जाने की शैली का वर्णन करती है। इससे पहले वाली आयत में स्वयं क़ुरआन के भेजे जाने की ओर संकेत किया गया था। पैग़म्बरे इस्लाम व उनके परिजनों के कथनों के अनुसार क़ुरआने मजीद दो बार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर उतारा गया है। पहली बार शबे क़द्र अर्थात रमज़ान के पवित्र महीने की 19वीं, 21वीं या 23वीं रात में एक ही समय में संपूर्ण रूप से और दूसरी बार हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के 23 वर्षों के दौरान मक्के और मदीने में क्रमबद्ध ढंग से एक एक आयत करके।

    यही कारण है कि जब भी ईश्वर के विशेष संदेशवाहक फ़रिश्ते हज़रत जिब्रईल पैग़म्बरे इस्लाम के पास आते थे तो वे उनके द्वारा आयतों के पढ़े जाने से पूर्व ही उनकी तिलावत आरंभ कर देते थे क्योंकि वे पहले ही से उन आयतों को जानते थे। इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम को इस कार्य से रोकते हुए कहा गया है कि ईश्वरीय संदेश की प्राप्ति में भी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। अलबत्ता साधारण लोगों में जल्दबाज़ी का कारण उतावलापन और कभी कभी अपने ज्ञान को जताने के लिए घमंड भी होता है किंतु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम, ईश्वरीय कथन से अथाह प्रेम के कारण जल्दी से तिलावत करने लगते थे। सूरए क़यामत की 16वीं आयत में इसी बात की ओर संकेत किया गया है।

    इस आयत से हमने सीखा कि अपने पिछले ज्ञान पर अधिक बल देने के स्थान पर इस बात का प्रयास करना चाहिए कि सदैव नई नई बातें सीखी जाएं। यहां तक कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को भी पहले से ज्ञात आयतों को दोहराने के स्थान पर नई बातों की प्राप्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

    ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और ज्ञानार्जन की समाप्ति का कोई अर्थ नहीं है।