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    सूरए ताहा, आयतें 115-120, (कार्यक्रम 564)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 115वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ عَهِدْنَا إِلَى آَدَمَ مِنْ قَبْلُ فَنَسِيَ وَلَمْ نَجِدْ لَهُ عَزْمًا (115)

    और हमने इससे पहले आदम से वचन लिया था (कि वे शैतान के बहकावे में न आएंगे) किन्तु वे भूल गए और हमने उन्हें प्रतिज्ञा (की पूर्ति) में दृढ़ न पाया। (20:115)

    सूरए ताहा की यहां तक कि आयतों में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम व बनी इस्राईल तथा फ़िरऔन से उनके संघर्ष की घटनाओं का वर्णन किया गया। इस सूरे की बाक़ी बची आयतों में प्रथम मनुष्य और ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम व उनकी पत्नी हज़रत हव्वा तथा उनसे शैतान की शत्रुता की घटनाओं का उल्लेख किया गया है। जैसा कि क़ुरआने मजीद की दूसरी आयतों से ज्ञात होता है, हज़रत आदम व हव्वा को उनके जीवन के आरंभ में स्वर्ग के एक बाग़ में रखा गया था और वहां उन्हें सुख सुविधा का हर साधन प्राप्त था।

    उस समय वे किसी भी कार्य के लिए कटिबद्ध नहीं थे और पूरी स्वतंत्रता के साथ ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित हो रहे थे बस ईश्वर ने उनसे कह रखा था कि वे एक विशेष पेड़ के निकट न जाएं और उसका फल न खाएं क्योंकि इस स्थिति में शैतान उन्हें धोखा दे देगा किंतु उन्होंने ईश्वर की इस सिफ़ारिश को गंभीरता से नहीं लिया और अपनी इस प्रतिज्ञा का उस प्रकार से पालन नहीं किया जिस प्रकार से करना चाहिए था। परिणाम स्वरूप वे समस्याओं में ग्रस्त हुए और स्वर्ग से निकाल दिए गए।

    इस आयत से हमने सीखा कि ठोस इरादे व संकल्प का अभाव, ईश्वर की दृष्टि में निंदनीय है।

    ईश्वर ने मनुष्य से प्रतिज्ञा ली है कि वह अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करेगा किंतु मनुष्य इस पर कटिबद्ध नहीं रहता।

    आइये अब सूरए ताहा की 116वीं और 117वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَإِذْ قُلْنَا لِلْمَلَائِكَةِ اسْجُدُوا لِآَدَمَ فَسَجَدُوا إِلَّا إِبْلِيسَ أَبَى (116) فَقُلْنَا يَا آَدَمُ إِنَّ هَذَا عَدُوٌّ لَكَ وَلِزَوْجِكَ فَلَا يُخْرِجَنَّكُمَا مِنَ الْجَنَّةِ فَتَشْقَى (117)

    और (हे पैग़म्बर! याद कीजिए उस समय को) जब हमने फ़रिश्तों से कहाः आदम को सजदा करो तो उन सभी ने सजदा किया सिवाए इबलीस के कि वह इनकार कर बैठा। (20:116) तो हमने कहाः हे आदम! निश्चत रूप से शैतान तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी का शत्रु है। तो (देखो) ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को स्वर्ग से निकलवा दे कि तुम दुख व कड़ाई में ग्रस्त हो जाओगे। (20:117)

    मनुष्य की रचना के बाद, फ़रिश्तों पर उसकी श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वे आदम के समक्ष नतमस्तक हो जाएं। यह ईश्वरीय आदेश इब्लीस नामक जिन्न पर भी, जो ईश्वर की अत्यधिक उपासना करने के कारण, फ़रिश्तों की पंक्ति में आ गया था, लागू होता था किंतु उसने इसे मानने से इन्कार कर दिया और इसकी अवहेलना की।

    ईश्वर ने मनुष्य की रचना के आरंभ में ही उससे और उसके वंश से इब्लीस या शैतान की शत्रुता से अवगत करा दिया ताकि वह यह जान ले कि शैतान का अनुसरण करने से दुख व पीड़ा के अतिरिक्त उसे कुछ प्राप्त नहीं होगा और शैतान के आदेशों के पालन से मनुष्य के सुख व सौभाग्य का अंत हो जाएगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य, सृष्टि की सभी वस्तुओं यहां तक कि जिन्नों व फ़रिश्तों से भी श्रेष्ठ है और यह प्रतिष्ठा उसे ईश्वर ने प्रदान की है।

    मनुष्य से, चाहे व स्त्री हो या पुरुष, शैतान की शत्रुता, उसकी रचना के आरंभ से रही है और प्रलय तक जारी रहेगी।

    आइये अब सूरए ताहा की 118वीं और 119वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    إِنَّ لَكَ أَلَّا تَجُوعَ فِيهَا وَلَا تَعْرَى (118) وَأَنَّكَ لَا تَظْمَأُ فِيهَا وَلَا تَضْحَى (119)

    निश्चित रूप से यहाँ (अर्थात स्वर्ग में) न तो तुम्हें भूख लगेगी और न तुम निर्वस्त्र रहोगे। (20:118) और न यहाँ तुम्हें प्यास लगेगी और न तुम धूप की तकलीफ़ उठाओगे। (20:119)

    ईश्वर ने हज़रत आदम व उनकी पत्नी हज़रत हव्वा अलैहिमस्सलाम को उनकी रचना के बाद जो स्थान उपलब्ध कराया था, उसका वह इस प्रकार वर्णन करता है कि यह भव्य बाग़, हर प्रकार की अनुकंपा से संपन्न है, इसमें उन्हें कभी भी भूख नहीं लगेगी और यहां का मौसम इतना अच्छा है कि गर्मी व धूप से मनुष्य को किसी प्रकार की यातना नहीं होगी कि जिसके परिणाम स्वरूप से उसे प्यास लगे।

    इस बाग़ में आहार, पानी, वस्त्र और घर जैसी मनुष्य की आरंभिक आवश्यकता के सभी साधन अत्यंत उचित ढंग से उपलब्ध करा दिए गए हैं और इनकी प्राप्ति के लिए उसे किसी भी प्रकार की तकलीफ़ नहीं उठानी होगी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सांसारिक जीवन भूख और प्यास जैसी कठिनाइयों से भरा हुआ है और कठिनाइयां, शैतान के अनुसरण के कारण हैं।

    ईश्वरीय आदेशों का पालन मनुष्य को स्वर्ग में पहुंचाता है जहां किसी प्रकार की कोई कठिनाई और दुख नहीं है।

    आइये अब सूरए ताहा की 120वीं आयत की तिलावत सुनें।

    فَوَسْوَسَ إِلَيْهِ الشَّيْطَانُ قَالَ يَا آَدَمُ هَلْ أَدُلُّكَ عَلَى شَجَرَةِ الْخُلْدِ وَمُلْكٍ لَا يَبْلَى (120)

    फिर शैतान ने उन्हें उकसाया (और) कहने लगाः हे आदम! क्या मैं तुम्हें अमर जीवन के वृक्ष और कभी पुराने (और समाप्त) न होने वाले राज्य का पता दूँ? (20:120)

    अंततः ईश्वर ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को जिस बात की ओर से सचेत कर रखा था वह हो कर रही। हुआ यह कि इब्लीस या शैतान, जिसने आदम के समक्ष सजदा नहीं किया था, अंजान व्यक्ति बन कर उनके पास आया और अपने धूर्ततापूर्ण उकसावों से उसने उनके समक्ष उस बात को सुंदर व टिकाऊ बना कर प्रस्तुत किया जिससे ईश्वर हज़रत आदम को रोक चुका था।

    हज़रत आदम अलैहिस्सलाम भी उसके उकसावे में आ गए और अमर जीवन तथा कभी न समाप्त होने वाले शासन की चाह में शैतान के जाल में फंस गए। शैतान ने उनसे कहा कि यदि वे उसकी बात मानें तो वह उन्हें अमर जीवन के वृक्ष और अनंत शासन का पता बता देगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि शैतान कभी भी मनुष्य को अपनी बात मानने पर विवश नहीं कर सकता बल्कि वह केवल उसे उकसाता है।

    शैतान की घुसपैठ का मार्ग, मनुष्य की आंतरिक इच्छाएं हैं क्योंकि उनमें धोखा खाने की संभावना अधिक होती है।