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    सूरए ताहा, आयतें 121-126, (कार्यक्रम 565)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 121वीं और 122वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    فَأَكَلَا مِنْهَا فَبَدَتْ لَهُمَا سَوْآَتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِنْ وَرَقِ الْجَنَّةِ وَعَصَى آَدَمُ رَبَّهُ فَغَوَى (121) ثُمَّ اجْتَبَاهُ رَبُّهُ فَتَابَ عَلَيْهِ وَهَدَى (122)

    अन्ततः उन दोनों ने (शैतान के उकसावे में आकर) उस (वर्जित वृक्ष) में से खा लिया जिसके परिणाम स्वरूप (उनके स्वर्ग वाले वस्त्र उतर गए और) उनके समक्ष उनके गुप्तांग प्रकट हो गए तथा वे दोनों अपने ऊपर स्वर्ग के पत्ते चिपकाने लगे। और (इस प्रकार) आदम ने अपने पालनहार के आदेश की अवज्ञा की तो वे भटक गए। (20:121) इसके पश्चात उनके पालनहार ने उन्हें चुन लिया और (अपनी कृपा को) उनकी ओर लौटा दिया और उनका मार्गदर्शन किया। (20:122)

    इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वर ने हज़रत आदम व हव्वा अलैहिमस्सलाम को सचेत किया था कि वे शैतान की चाल में न आएं क्योंकि वह उनका शत्रु है और उन्हें स्वर्ग से निकलवाने की चेष्टा में है किंतु शैतान ने उन्हें इतना उकसाया कि उन्होंने वर्जित पेड़ का फल खा लिया। इसका सबसे पहला प्रभाव यह था कि स्वर्ग वालों के विशेष वस्त्र उनके शरीर से हट गए और उन्होंने अपने आपको निर्वस्त्र पाया अतः वे पेड़ों के पत्तों से अपने शरीर को ढांकने पर विवश हो गए।

    शैतान द्वारा किए गए वादे के अनुसार उन्हें उस पेड़ का फल खाने के बाद अधिक उच्च दर्जों तक पहुंचना और अमर हो जाना चाहिए था किंतु उसके अन्य वादों की भांति ही यह वादा भी झूठा था और उसने उन्हें विफल और निराश बना कर उनकी स्थिति पर छोड़ दिया। इस घटना में हज़रत आदम व उनकी पत्नी विफल रहने के साथ ही ईश्वर की अवज्ञा भी कर बैठे और उसके सामिप्य के स्थान से दूर हो गए।

    इसके बावजूद ईश्वर ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को सदा के लिए अपनी दया से दूर नहीं किया बल्कि पुनः उन्हें अपनी कृपा का पात्र बनाया, उनका मार्गदर्शन किया तथा उनकी तौबा को स्वीकार कर लिया। यहां तक कि उन्हें अपनी पैग़म्बरी का पद प्रदान करके अन्य लोगों के मार्गदर्शन का दायित्व सौंपा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि आज मानव समाज में जो नग्नता प्रचलित है वह शैतान के आदेशों के पालन और ईश्वर की अवज्ञा का एक परिणाम है। संसार के सबसे पहले मनुष्य भी ईश्वर की अवज्ञा के कारण नग्नता में ग्रस्त हो गए थे।

    ईश्वर के आदेशों की अवहेलना मनुष्य को सौभाग्य व कल्याण के मार्ग से दूर कर देती है और उसे ग़लत मार्ग पर पहुंचा देती है।

    ईश्वर से मनुष्य के संपर्क के मार्ग में कोई बंद गली नहीं है और तौबा व प्रायश्चित का मार्ग सदैव खुला हुआ है।

    आइये अब सूरए ताहा की 123वीं और 124वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قَالَ اهْبِطَا مِنْهَا جَمِيعًا بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ فَإِمَّا يَأْتِيَنَّكُمْ مِنِّي هُدًى فَمَنِ اتَّبَعَ هُدَايَ فَلَا يَضِلُّ وَلَا يَشْقَى (123) وَمَنْ أَعْرَضَ عَنْ ذِكْرِي فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْمَى (124)

    ईश्वर ने (आदम व उनकी पत्नी से) कहाः तुम दोनों उस स्वर्ग (और उच्च स्थान) से उतर जाओ कि (इसके बाद) तुममें से कुछ लोग, कुछ अन्य के शत्रु होंगे। फिर यदि मेरी ओर से तुम तक कोई (पैग़म्बर या) मार्गदर्शन पहुँचे तो जो कोई मेरे मार्गदर्शन का पालन करे तो वह न तो पथभ्रष्ट होगा और न ही कठिनाई में ग्रस्त होगा। (20:123) और जो कोई मेरी याद से मुँह मोड़ेगा तो उसका जीवन अत्यंत संकीर्ण होगा और प्रलय के दिन हम उसे अंधा उठाएँगे। (20:124)

    यद्यपि ईश्वर ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की ग़लती को क्षमा कर दिया किंतु अब वे स्वर्ग में रहने के योग्य नहीं रह गए थे अतः उसने उन्हें व शैतान को स्वर्ग से निकल कर धरती पर रहने का आदेश दिया जबकि मानव जाति और शैतान के बीच शत्रुता निरंतर जारी रहने वाली थी।

    इसके बाद क़ुरआने मजीद, लोगों के मार्गदर्शन के संबंध में ईश्वरीय परंपरा की ओर संकेत करते हुए कहता है कि जब भी मैं तुम्हारे पास कोई पैग़म्बर भेजूं तो अनुसरण करो कि इसी में तुम्हारा कल्याण है। यदि तुमने उसके आदेशों का पालन न किया और ईश्वर को भुला बैठे तो तुम्हें लोक-परलोक में विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। इस संसार में तुम्हारा जीवन बहुत तंगी में व्यतीत होगा जबकि प्रलय में तुम अंधे हो जाओगे और तुम्हें परलोक के कल्याण अर्थात अमर स्वर्ग का मार्ग सुझाई नहीं देगा।

    यहां पर जीवन में तंगी का अर्थ दरिद्रता और निर्धनता नहीं है क्योंकि ऐसे बहुत से धनवान व पूंजीपति हैं जो लोभ व कंजूसी के कारण सदैव ही डर और भय के साथ जीवन बिताते हैं और उन्हें एक क्षण के लिए भी चैन नहीं मिलता। स्वाभाविक है कि जिसने ईश्वर को भुला कर उससे नाता तोड़ लिया हो उसके लिए संसार के अतिरिक्त कोई चीज़ नहीं बचती जिसे वह अपना लक्ष्य बनाए और इसके परिणाम स्वरूप वह केवल संसार के लिए ही अपना हर प्रयास करता है और दिन प्रतिदिन उसमें वृद्धि करता चला जाता है। अलबत्ता उसके इस लोभ की कोई सीमा नहीं रहती और वह जितना भी धन कमाता है उससे अधिक कमाने की लालसा रखता है।

    इस प्रकार का मनुष्य, समस्याएं व कठिनाइयां सामने आने और रोगों व मृत्यु के भय से उत्पन्न होने वाले दुखों व चिंताओं के अतिरिक्त सदैव ही, अपनी पूरी न होने वाली लालसाओं की सोच और जो कुछ उसने प्राप्त किया है उसके, हाथ से निकल जाने के भय में जीवन बिताता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य का सौभाग्य व कल्याण, ईश्वरीय पैग़म्बरों के अनुसरण में निहित है।

    ईश्वर की याद से दूरी, व्याकुलता और दिशाहीनता का कारण बनती है चाहे मनुष्य के पास कितना ही धन क्यों न हो।

    जो व्यक्ति इस संसार में आध्यात्मिक वास्तविकताओं को देखने के लिए तैयार न हो वह प्रलय में अंधा बना कर उठाया जाएगा और यह संसार में उसके कर्मों का ही फल होगा।

    आइये अब सूरए ताहा की 125वीं और 126वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قَالَ رَبِّ لِمَ حَشَرْتَنِي أَعْمَى وَقَدْ كُنْتُ بَصِيرًا (125) قَالَ كَذَلِكَ أَتَتْكَ آَيَاتُنَا فَنَسِيتَهَا وَكَذَلِكَ الْيَوْمَ تُنْسَى (126)

    मनुष्य कहेगाः हे मेरे पालनहार! तूने मुझे अंधा क्यों उठाया जबकि मैं (संसार में) तो आँखों वाला था? (20:125) (ईश्वर उसके उत्तर में) कहेगाः जिस प्रकार तुझ तक हमारी आयतें आई थीं तो तूने उन्हें भुला दिया था, उसी प्रकार आज तुझे भी भुलाया जा रहा है। (20:126)

    चूंकि प्रलय मनुष्य के कर्मों के साक्षात होने का स्थान है, अतः आसमानी किताबों और ईश्वरीय पैग़म्बरों की अनदेखी, जो लोगों के बीच ईश्वर की याद भुलाए जाने का मार्ग प्रशस्त करती है, इस बात का कारण बनती है कि मनुष्य प्रलय में अंधा उठाया जाए और उसकी अनदेखी की जाए तथा उसकी किसी भी आपत्ति पर ध्यान न दिया जाए।

    इन आयतों के अनुसार न केवल काफ़िर बल्कि वे मुसलमान भी जो क़ुरआन पर ध्यान नहीं देते हैं या नमाज़ अदा करने में, जो ईश्वर की याद है, ढिलाई करते हैं, लोक-परलोक में इसी प्रकार के परिणामों में ग्रस्त होंगे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय दंड अत्यंत न्यायपूर्ण हैं और मनुष्य के पाप के अनुसार ही होते हैं।

    यद्यपि इस संसार में मनुष्य के लिए आंखें और दृष्टि बहुत महत्वपूर्ण है किंतु, प्रलय में आंखों का होना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है ताकि मनुष्य स्वर्ग के सौंदर्य व उसकी अनुकंपाओं को देख सके।