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    सूरए ताहा, आयतें 127-130, (कार्यक्रम 566)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 127वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَكَذَلِكَ نَجْزِي مَنْ أَسْرَفَ وَلَمْ يُؤْمِنْ بِآَيَاتِ رَبِّهِ وَلَعَذَابُ الْآَخِرَةِ أَشَدُّ وَأَبْقَى (127)

    और इस प्रकार हम, सीमा का उल्लंघन करने और अपने पालनहार की आयतों पर ईमान न लाने वाले को बदला देते हैं और निश्चय ही प्रलय का दंड तो अत्यन्त कठोर और अधिक स्थायी है। (20:127)

    इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वरीय परंपरा और क़ानून के आधार पर जो लोग पैग़म्बरों व आसमानी किताबों की ओर से मुंह मोड़ लेते हैं वे इस संसार में तंगी व कड़ाई भरे जीवन में ग्रस्त हो कर अत्यंत दबाव में रहते हैं और प्रलय में भी ईश्वर के सदा रहने वाले स्वर्ग में उनका कोई ठिकाना नहीं होता।

    यह आयत एक बार फिर इस बिंदु पर बल देते हुए कहती है कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आस्था व ईमान की दृष्टि से कुफ़्र में ग्रस्त हो जाते हैं और कर्म के क्षेत्र में भी संतुलन के सीधे मार्ग से विचलित हो कर अतिवाद एवं चरमपंथ की ओर उन्मुख हो जाते हैं। ईश्वर ने इन्हें जो अनुकंपाएं प्रदान की हैं, उन्हें वे ग़लत मार्ग में प्रयोग करते हैं। इस प्रकार के लोग भी पिछले गुट की भांति नरक के कड़े दंड में ग्रस्त होंगे और उससे बचने का कोई मार्ग न होगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि पाप, जो एक प्रकार से अपव्यय और ईश्वरीय अनुकंपाओं का ग़लत प्रयोग है, ईश्वर पर ईमान से मेल नहीं खाता।

    अपने कर्मों के परिणामों का हिसाब किताब करते समय, प्रलय में ईश्वर की ओर से दिए जाने वाले पारितोषिक और दंड को संसार के लाभ और हानि से अधिक महत्व देना चाहिए।

    आइये अब सूरए ताहा की 128वीं और 129वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    أَفَلَمْ يَهْدِ لَهُمْ كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُمْ مِنَ الْقُرُونِ يَمْشُونَ فِي مَسَاكِنِهِمْ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِأُولِي النُّهَى (128) وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِنْ رَبِّكَ لَكَانَ لِزَامًا وَأَجَلٌ مُسَمًّى (129)

    फिर क्या उनकी (चेतना और) मार्गदर्शन के लिए यह पर्याप्त न था कि (वे देखते) हम उनसे पहले कितने लोगों को विनष्ट कर चुके हैं जिनकी बस्तियों में (अब) वे चलते-फिरते हैं? निसंदेह बुद्धिमानों के लिए इसमें बहुत सी निशानियाँ (और पाठ) हैं। (20:128) और यदि आपके पालनहार की ओर से पहले ही (उनके लिए) एक बात (व परंपरा) निश्चित न हो गई होती और एक अवधि निर्धारित न की जा चुकी होती तो अवश्य ही (ईश्वर का दंड) उनके लिए आवश्यक हो जाता। (20:129)

    ये आयतें पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल के काफ़िरों व अनेकेश्वरवादियों के बारे में हैं जो अपनी यमन की यात्राओं के दौरान, आद जाति की उजड़ी हुई बस्तियों में और शाम या वर्तमान सीरिया की यात्रा में समूद जाति के उजड़े हुए नगर तथा लूत जाति के खंडहर बन चुके घरों को देखते थे किंतु फिर भी पाठ नहीं सीखते थे और अपने कुफ़्र एवं हठधर्मी पर अड़े रहते थे। जबकि वे उजड़े हुए घर और बस्तियां, उन्हें भी तथा आजके लोगों को भी अपनी बेज़बानी से चेतावनी देती हैं तथा कुफ़्र, बुराई व अत्याचार के परिणाम का उल्लेख करती हैं।

    आगे चलकर आयतें कहती हैं कि ईश्वर की परंपरा यह है कि वह काफ़िरों को समय व मोहलत देता है ताकि शायद वे अपनी शैली को छोड़ कर सही मार्ग पर आ जाएं। इसके अतिरिक्त हर जाति के लिए ईश्वर ने एक समय निर्धारित कर रखा है और उस समय से पहले वह उसे दंडित नहीं करता।

    इन आयतों से हमने सीखा कि जो व्यक्ति अतीत के लोगों के इतिहास से पाठ न ले वह धिक्कारे जाने योग्य है।

    पुरातन अवशेषों के निरीक्षण के दौरान अधिकतर लोग केवल उनके मनोरंजक आयाम पर ध्यान देते हैं और उनसे पाठ सीखने की ओर से निश्चेत रहते हैं।

    पापियों और अत्याचारियों को ईश्वरीय दंड में विलम्ब पर घमंडी नहीं हो जाना चाहिए क्योंकि ईश्वर, मोहलत या अवधि समाप्त हो जाने के बाद अपराधियों को अवश्य ही दंडित करता है।

    आइये अब सूरए ताहा की 130वीं आयत की तिलावत सुनें।

    فَاصْبِرْ عَلَى مَا يَقُولُونَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ قَبْلَ طُلُوعِ الشَّمْسِ وَقَبْلَ غُرُوبِهَا وَمِنْ آَنَاءِ اللَّيْلِ فَسَبِّحْ وَأَطْرَافَ النَّهَارِ لَعَلَّكَ تَرْضَى (130)

    तो (हे पैग़म्बर!) जो कुछ वे कहते है उस पर धैर्य से काम लीजिए और सूर्योदय से पहले और सूर्य के डूबने से पहले अपने पालनहार का गुणगान कीजिए और रात की घड़ियों में भी तथा दिन के कुछ समय में भी ईश्वर का गुणगान कीजिए ताकि आप प्रसन्न हो जाएं। (20:130)

    यह आयत मक्के के अनेकेश्वरवादियों द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का अनादर किए जाने और उन पर आरोप लगाए जाने के उत्तर में पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है कि इस प्रकार के कटाक्षों को सहन कीजिए और इस बात की आशा न रखिए कि ईश्वर उन्हें तत्काल दंडित कर देगा। अलबत्ता, मनोबल के लिए आवश्यक है कि दिन रात के कुछ निर्धारित भागों में ईश्वर की उपासना और प्रार्थना करें ताकि ईश्वर से आपका संबंध और अधिक सुदृढ़ हो। इस स्थिति में विरोधियों का व्यवहार पैग़म्बरी और दायित्व के निर्वाह में आपको तनिक भी प्रभावित नहीं करेगा और आप निराश नहीं होंगे बल्कि ईश्वर की दया व कृपा के प्रति अधिक आशावान हो कर अपने भारी दायित्व के निर्वाह की ओर से प्रसन्न रहेंगे।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वाले लोगों को विरोधियों की बातों और व्यवहार के संबंध में दृढ़ रहना चाहिए और अपने दायित्वों के पालन की ओर से ढिलाई नहीं करनी चाहिए।

    नमाज़ पढ़ना तथा ईश्वर का गुणगान करना, शत्रुओं की हठधर्मी और कुप्रचारों के मुक़ाबले में भावनाओं के सुदृढ़ होने का कारण है।

    रात केवल आराम और सोने के लिए नहीं है बल्कि उसका एक भाग, नमाज़ और ईश्वर से प्रार्थना के लिए विशेष करना चाहिए।