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    सूरए ताहा, आयतें 13-18, (कार्यक्रम 546)

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    आइये पहले सूरए ताहा की आयत नंबर 13 और 14 की तिलावत सुनें।

    وَأَنَا اخْتَرْتُكَ فَاسْتَمِعْ لِمَا يُوحَى (13) إِنَّنِي أَنَا اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدْنِي وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي (14)

    (हे मूसा!) मैंने तुम्हें (पैग़म्बरी के लिए) चुन लिया तो जो कुछ वहि के रूप में तुम तक भेजा जा रहा है, उसे ध्यानपूर्वक सुनो। (20:13) निसंदेह मैं अल्लाह हूं और मेरे अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है तो मेरी ही उपासना करो और मेरे स्मरण के लिए नमाज़ स्थापित करो। (21:14)

    पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम मदयन के क्षेत्र से मिस्र वापसी के मार्ग में तुवा नामक एक पवित्र घाटी में पहुंचे जहां ईश्वर ने उन्हें संबोधित किया। ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर ने उनसे कहा कि मैंने तुम्हें अपनी पैग़म्बर चुन लिया है अतः अबसे तुम वहि के रूप में ईश्वरीय संदेश सुनने के लिए तैयार रहो तथा उसे ध्यानपूर्वक सुन कर स्वीकार करो। अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की उपासना न करो और उत्तम रूप में उपासना करो कि जो नमाज़ है ताकि सदैव मेरी याद में रहो।

    यद्यपि पैग़म्बरों का दायित्व है कि वे अन्य लोगों को ईश्वर की उपासना का निमंत्रण दें किंतु ईश्वर स्वयं उन्हें आरंभ में अपने संबोधन का पात्र बनाता है ताकि कोई यह न सोचे कि स्वयं उन्हें ईश्वर की उपासना करने और नमाज़ पढ़ने का आदेश नहीं दिया गया है। यह धर्म के सभी प्रचारकों के लिए पाठ है कि वे लोगों को धार्मिक शिक्षाओं के पालन का निमंत्रण देने से पूर्व स्वयं उन पर कटिबद्ध रहें ताकि वे लोगों के लिए आदर्श बन सकें।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के अनन्य होने पर विश्वास, सभी मूल आस्थाओं में सर्वप्रमुख है तथा नमाज़ पढ़ना सभी उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ है।

    सभी ईश्वरीय धर्मों का सबसे पहले आदेश और व्यवहारिक कार्यक्रम, नमाज़ के रूप में सृष्टि के रचयिता की उपासना है।

    केवल नमाज़ का प्रारूप पर्याप्त नहीं है बल्कि नमाज़ की आत्मा, ईश्वर की याद है जो नमाज़ को मूल्य प्रदान करती है।

    आइये अब सूरए ताहा कि आयत नंबर 15 और 16 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ السَّاعَةَ آَتِيَةٌ أَكَادُ أُخْفِيهَا لِتُجْزَى كُلُّ نَفْسٍ بِمَا تَسْعَى (15) فَلَا يَصُدَّنَّكَ عَنْهَا مَنْ لَا يُؤْمِنُ بِهَا وَاتَّبَعَ هَوَاهُ فَتَرْدَى (16)

    (हे मूसाः) निश्चित रूप से प्रलय, जिसके समय को मैंने गुप्त रखा है, आने वाला है ताकि जिसने जो कुछ प्रयास किया है, उसे उसका प्रतिफल दिया जाए। (21:15) तो (सावधान रहो कि) वह व्यक्ति तुम्हें प्रलय की ओर से निश्चेत न कर दे जो उस पर विश्वास नहीं रखता और केवल अपनी आंतरिक इच्छाओं का पालन करता है कि इस स्थिति में तुम तबाह हो जाओगे। (21:16)

    एकेश्वरवाद तथा पैग़म्बरी जैसी आस्थाओं के वर्णन के बाद कि जो सभी ईश्वरीय धर्मों के दो प्रमुख आधार हैं, ये आयतें सभी पैग़म्बरों की शिक्षाओं के तीसरे आधार की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि यद्यपि प्रलय आने का समय किसी को भी यहां तक कि पैग़म्बरों को भी ज्ञात नहीं है और उससे केवल ईश्वर ही अवगत है किंतु उसका आना निश्चित है और सभी मनुष्यों को प्रलय में अपने कर्मों का हिसाब-किताब देना होगा। जिस प्रकार से कि किसी को भी अपनी मृत्यु के समय का ज्ञान नहीं है किंतु कोई भी मृत्यु से बच नहीं सकता और दुर्बल व सबल सभी को मृत्यु का सामना करना ही है।

    इन आयतों में प्रलय का कारण बताते हुए कहा गया है कि ईश्वर सभी को प्रलय में उपस्थित करेगा ताकि हर व्यक्ति को उसके कर्मों का फल दिया जा सके। अर्थात भले कर्म करने वाला स्वर्ग में जाएगा और बुरे कर्म करने वाले को नरक में डाला जाएगा क्योंकि इस संसार में सभी के कर्मों का प्रतिफल देने की संभावना नहीं है अतः ईश्वरीय न्याय की मांग है कि संसार की समाप्ति व प्रलय के स्थापित होने के बाद हर व्यक्ति अपने कर्मों का प्रतिफल प्राप्त करे।

    आगे चल कर आयतें कहती हैं कि बहुत से लोग मृत्यु के बाद के जीवन और प्रलय को स्वीकार करने के लिए तयार नहीं होते और विभिन्न प्रकार के प्रश्न एवं शंकाएं उत्पन्न करके दूसरों को भी प्रलय की आस्था से बहकाने का प्रयास करते हैं अतः ईमान वालों को सावधान रहना चाहिए और अपने ईमान को कमज़ोर नहीं पड़ने देना चाहिए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि यद्यपि प्रलय आने का समय गुप्त है किंतु उसका आना निश्चित है।

    प्रलय के इन्कार का कारण, आंतरिक इच्छाओं का पालन है। कुछ लोग अपनी अवैध इच्छाओं की पूर्ति के मार्ग में स्वयं को स्वतंत्र समझने और प्रलय में कर्मों के हिसाब-किताब की चिंता से बचने के लिए प्रलय का ही इन्कार कर देते हैं।

    ईमान वालों को अपनी आस्थाओं पर सुदृढ़ रहना चाहिए और जान लेना चाहिक कि धर्म की रक्षा में किसी भी प्रकार की ढिलाई से वे तबाह हो जाएंगे और उनका अंत बुरा होगा।

    आइये अब सूरए ताहा कि आयत नंबर 17 और 18 की तिलावत सुनें।

    وَمَا تِلْكَ بِيَمِينِكَ يَا مُوسَى (17) قَالَ هِيَ عَصَايَ أَتَوَكَّأُ عَلَيْهَا وَأَهُشُّ بِهَا عَلَى غَنَمِي وَلِيَ فِيهَا مَآَرِبُ أُخْرَى (18)

    और (ईश्वर ने पूछा) हे मूसाः तुम्हारे दाहिने हाथ में वह क्या है? (21:17) उन्होंने कहा यह मेरी लाठी है। मैं इस पर टेक लगाता हूं, इससे अपनी भेड़ों के लिए पेड़ों से पत्ते गिराता हूं और (इसके अतिरिक्त भी) इसमें मेरे लिए कई अन्य लाभ हैं। (21:18)

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को पैग़म्बरी का पद प्रदान करने और एकेश्वरवाद एवं प्रलय पर बल देने के पश्चात अनन्य ईश्वर, उन्हें कुछ चमत्कार प्रदान करना चाहता था जो उनकी सत्यता का प्रमाण रहें। अतः उसने उस लाठी को जिसे प्रायः चरवाहे अपने हाथ में लिए रहते हैं, चमत्कार के रूप में प्रयोग किया और आरंभ में हज़रत मूसा से पूछा कि उनके हाथ में क्या है और किस काम आता है?

    बहुत स्पष्ट सी बात है कि ईश्वर को इस प्रश्न का उत्तर ज्ञात था और उसने यह प्रश्न, उस लाठी से चमत्कार दिखाने के लिए भूमिका के रूप में किया था किंतु हज़रत मूसा ने, जिन्हें इस संबंध में कुछ ज्ञात नहीं था, लाठी के साधारण कार्यों की ओर ही संकेत किया। अगले कार्यक्रम में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की लाठी के चमत्कारों की चर्चा की जाएगी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि कुछ पैग़म्बरों ने भी चरवाहे का काम किया है। यह काम बहुत कठिन होता था और उन्हें अधिक बड़े व महत्वपूर्ण कार्यों के लिए तैयार करता था।

    ईश्वर अपनी शक्ति के प्रदर्शन के लिए लाठी जैसी अत्यंत साधारण वस्तुओं तक का प्रयोग करता है।