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    सूरए ताहा, आयतें 131-135, (कार्यक्रम 567)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 131वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَلَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَى مَا مَتَّعْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِنْهُمْ زَهْرَةَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا لِنَفْتِنَهُمْ فِيهِ وَرِزْقُ رَبِّكَ خَيْرٌ وَأَبْقَى (131)

    और (हे पैग़म्बर!) जो कुछ हमने लोगों के कुछ गुटों को (भौतिक अनुकंपाएं) दे रखी हैं उनको (आप आंख उठा कर भी) न देखिए कि ये सांसारिक जीवन की (अनुपयोगी) कलियां हैं जिनके माध्यम से हम उनकी परीक्षा लेंगे। और (जान लीजिए कि) आपके पालनहार की रोज़ी उत्तम भी है और स्थायी भी। (20:131)

    इससे पहले की आयतों में ईश्वर ने अपने पैग़म्बर को, विरोधियों के अनुचित व्यवहार व बातों पर संयम से काम लेने की सिफ़ारिश की थी। यह आयत पैग़म्बर को संबोधित करती है किंतु उसका संबोधन सभी मुसलमानों से है। आयत कहती है कि सचेत रहो कि काफ़िरों की धन संपत्ति जो सांसारिक एवं भौतिक अनुकंपा है, तुम्हें मोहित न करे और इस बात का कारण न बने कि तुम ईश्वर द्वारा प्रदान की गई ईमान की महान अनुकंपा को तुच्छ समझने लगो।

    इसके अतिरिक्त जो कुछ हमने काफ़िरों को प्रदान किया है वह स्थायी नहीं है और बसंत की कलियों की भांति बहुत जल्दी मुर्झाने व समाप्त होने वाला है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सारी वस्तुएं परीक्षा का साधन हैं और उन्हें इन अनुकंपाओं का हिसाब देना होगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से भौतिकता की ओर रुझान रखता है किंतु उसे अपनी अन्य सभी इच्छाओं की भांति अपने इस रुझान को भी नियंत्रित करना चाहिए और संसार की चकाचौंध पर मोहित नहीं होना चाहिए।

    हमें उन चीज़ों के बारे में सोचना चाहिए जो हमारे पास हैं, उन चीज़ों को नहीं देखना चाहिए जो अन्य लोगों के पास हैं।.

    संसार की सभी अनुकंपाएं, मनुष्य की परीक्षा के साधन हैं। जिसे अधिक अनुकंपाएं प्राप्त होंगी उसे परीक्षा भी अधिक देनी होगी।

    आइये अब सूरए ताहा की 132वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلَاةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا لَا نَسْأَلُكَ رِزْقًا نَحْنُ نَرْزُقُكَ وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوَى (132)

    और (हे पैग़म्बर!) अपने परिजनों को नमाज़ का आदेश दीजिए और स्वयं भी उस पर जमे रहिए। हम आप (सहित किसी) से कोई रोज़ी नहीं माँगते (बल्कि) हम ही तो हैं जो आप (सहित सभी) को रोज़ी देते हैं और अच्छा अंत तो ईश्वर से भय (रखने वालों) ही के लिए निश्चित है। (20:132)

    पिछली आयत का क्रम जारी रखते हुए यह आयत, इस संसार की तुच्छ व अस्थायी धन संपत्ति व अनुकंपाओं पर मोहित न होने और प्रलय की स्थायी व अमर अनुकंपाओं को दृष्टिगत रखने के संबंध में पुनः पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि आप स्वयं भी निरंतर नमाज़ पढ़ें और अपने परिजनों को भी सदैव नमाज़ पढ़ने की सिफ़ारिश करें। निश्चित रूप से ईमान वाले लोगों को भी अपने पैग़म्बर का अनुसरण करते हुए ऐसा ही करना चाहिए तथा अपनी और अपने परिजनों की नमाज़ पर ध्यान देना चाहिए।

    आगे चलकर आयत एक प्रश्न का उत्तर देती है। कुछ युवा पूछते हैं कि ईश्वर को हमारी नमाज़ की क्या आवश्यकता है कि उसने हमें नमाज़ पढ़ने का आदेश दिया है? ईश्वर कहता है कि मुझे तुम्हारी नमाज़ की क्या स्वयं तुम्हारी भी आवश्यकता नहीं है बल्कि तुम्हें मेरी आवश्यकता है। यदि मैं तुम्हें नमाज़ का आदेश देता हूं तो उसका कारण यह है कि तुम संसार पर मोहित न हो और दिन में कई बार प्रलय को याद करो, प्रलय के अपने स्थायी जीवन को याद रखो और उस संसार के लिए प्रयास करते रहो।

    इस आयत से हमने सीखा कि पुरुष अपने परिवार व संतान के धार्मिक प्रशिक्षण के संबंध में उत्तरदायी है और केवल उनकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर्याप्त नहीं है।

    बच्चे के प्रशिक्षण का सबसे पहला चरण, पाठशाली नहीं अपितु परिवार है।

    ईश्वर को हमारी उपासनाओं कसे कोई लाभ नहीं पहुंचता बल्कि इन उपासनाओं के परिणाम स्वयं हमें प्राप्त होते हैं।

    आइये अब सूरए ताहा की 133वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَقَالُوا لَوْلَا يَأْتِينَا بِآَيَةٍ مِنْ رَبِّهِ أَوَلَمْ تَأْتِهِمْ بَيِّنَةُ مَا فِي الصُّحُفِ الْأُولَى (133)

    और उन्होंने कहा कि पैग़म्बर अपने पालनहार की ओर से हमारे पास कोई निशानी या चमत्कार क्यों नहीं लाते? क्या उनके पास पिछली (आसमानी) पुस्तकों में वर्णित तथ्यों का उल्लेख करने वाला (क़ुरआन) नहीं आया है? (20:133)

    मक्के के अनेकेश्वरवादी, क़ुरआने मजीद को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के चमत्कार के रूप में स्वीकार नहीं करते थे और बहाने बनाते हुए उनसे कहते थे कि वे पिछले पैग़म्बरों की भांति चमत्कार क्यों नहीं प्रस्तुत करते? जबकि विरोधियों ने उन चमत्कारों को भी स्वीकार नहीं किया था और वे हज़रत ईसा व हज़रत मूसा जैसे पैग़म्बरों पर भी ईमान नहीं लाए थे।

    अनेकेश्वरवादियों को अपेक्षा थी कि जो कुछ वे प्रस्ताव देते हैं उन्हें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम स्वीकार कर लें जबकि कोई भी पैग़म्बर, लोगों की मांग पर नहीं बल्कि ईश्वर की इच्छा पर चमत्कार प्रस्तुत करता है और यदि लोगों की मांग पर ही चमत्कार प्रस्तुत किए जाने लगें तो हर व्यक्ति अपने ईमान लाने के लिए विभिन्न प्रकार की विचित्र शर्तें रखने लगेगा जिससे सामाजिक मामले बिगड़ने लगेंगे।

    ईश्वर उनके उत्तर में कहता है कि ये लोग चमत्कार की मांग क्यों करते हैं और बहाने क्यों बनाते हैं क्या यह क़ुरआन इनके लिए पर्याप्त नहीं है जो इतनी विशिष्टताओं का स्वामी है और पिछली आसमानी किताबों में जो बातें वर्णित हैं उनका उल्लेख करता है।

    इस आयत से हमने सीखा कि हठधर्मी व घमंडी लोग, मौजूद स्पष्ट तर्कों को स्वीकार नहीं करते और अन्य तर्कों की मांग करते रहते हैं।

    वस्तुतः चमत्कार का स्वरूप महत्वपूर्ण नहीं है, जब मनुष्य में सत्य को स्वीकार करने की भावना ही न हो तो वह न तो क़ुरआने मजीद को स्वीकार करता है और न ही हज़रत मूसा की लाठी को।

    आइये अब सूरए ताहा की 134वीं और 135वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَلَوْ أَنَّا أَهْلَكْنَاهُمْ بِعَذَابٍ مِنْ قَبْلِهِ لَقَالُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آَيَاتِكَ مِنْ قَبْلِ أَنْ نَذِلَّ وَنَخْزَى (134) قُلْ كُلٌّ مُتَرَبِّصٌ فَتَرَبَّصُوا فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ أَصْحَابُ الصِّرَاطِ السَّوِيِّ وَمَنِ اهْتَدَى (135)

    और यदि हम पैग़म्बर और क़ुरआन के आने से पहले उन्हें किसी दंड से विनष्ट कर देते तो वे कहते कि हे हमारे पालनहार! तूने हमारे पास कोई पैग़म्बर क्यों न भेजा कि इससे पहले कि हम अपमानित और लज्जित होते, हम तेरी आयतों का पालन करने लगते?, (20:134) (हे पैग़म्बर! कह दीजिए कि हर एक प्रतीक्षा में है। तो अब तुम भी प्रतीक्षा करो। शीघ्र ही तुम जान लोगे कि कौन लोग सीधे मार्ग वाले हैं और किन लोगों को मार्गदर्शन प्राप्त है? (20:135)

    ये आयतें मक्के के अनेकेश्वरवादियों के एक अन्य बहाने का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि यदि ईश्वर, काफ़िरों को उनके कर्मों के कारण इसी संसार में दंडित करके मार दे तो वे यह बहाना प्रस्तुत करेंगे कि तूने हमारे पास कोई पैग़म्बर क्यों नहीं भेजा? शायद हम उसके मार्गदर्शन को स्वीकार कर लेते और तेरी आयतों का पालन करने लगते? ईश्वर जानता है कि उनका ईमान लाने का कोई इरादा नहीं है और वे केवल बहानेबाज़ी कर रहे हैं अतः जब उसने क़ुरआने मजीद के साथ पैग़म्बर को उनके पास भेजा तो वे प्रतिदिन एक नई बात करने लगे और सत्य को स्वीकार करने से बचने के लिए नए नए बहाने बनाने लगे।

    इसके बाद ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम से कहता है कि वे इन हठधर्मी व बहानेबाज़ अनेकेश्वरवादियों से कह दें कि तुम भी और हम भी, सभी प्रतीक्षा कर रहे हैं, हमें इस बात की प्रतीक्षा है कि ईश्वर ने, कुफ़्र पर सत्य धर्म की विजय का जो हमें वचन दिया है वह कब पूरा होता है और तुम्हें इस बात की प्रतीक्षा है कि हम पर कब कठिनाइयां व समस्याएं आ पड़ती हैं। आगे चल कर आयतें कहती हैं कि तुम लोग शीघ्र ही समझ जाओगे कि तुममें से कौन सही मार्ग पर रहा है और मनुष्य को गंतव्य तक पहुंचाने वाले सीधे रास्ते पर चला है। यह वाक्य, क़ुरआने मजीद की भविष्यवाणियों में से एक है जिसमें अनेकेश्वरवादियों पर मुसलमानों की विजय की सूचना दी गई है जबकि उस समय पैग़म्बरे इस्लाम और मुसलमान शत्रु की ओर से अत्यंत कड़े दबाव में थे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के भेजे जाने के बाद लोगों के पास अब कोई बहाना नहीं बचा है और वे यह नहीं कह सकते कि हमें ईश्वरीय धर्म के बारे में कोई ज्ञान नहीं था और हम अनभिज्ञ थे। इसके अतिरिक्त जब तक कोई क़ानून लोगों तक न पहुंचा दिया जाए तब तक दंड और जुर्माना, न्यायसंगत नहीं होगा।

    इस्लाम, संतुलन और मध्यमार्ग का धर्म है और सीधे रास्ते की ओर मुसलमानों का मार्गदर्शन करता है।