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    सूरए ताहा, आयतें 19-24, (कार्यक्रम 547)

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    आइये पहले सूरए ताहा की आयत नंबर 19, 20 और 21 की तिलावत सुनें।

    قَالَ أَلْقِهَا يَا مُوسَى (19) فَأَلْقَاهَا فَإِذَا هِيَ حَيَّةٌ تَسْعَى (20) قَالَ خُذْهَا وَلَا تَخَفْ سَنُعِيدُهَا سِيرَتَهَا الْأُولَى (21)

    (ईश्वर ने) कहा, हे मूसा! अपनी लाठी को फेंक दो। (20:19) तो मूसा ने उसे फेंक दिया, (जैसे ही उन्होंने उसे फेंका) तो (देखा कि) वह एक सांप बन कर दौड़ रहा है। (20:20) (ईश्वर ने) कहा कि उसे (उठा) लो और मत डरो कि हम तुरंत ही उसे उसकी पिछली स्थिति में लौटा देंगे। (20:21)

    पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को मदयन से मिस्र वापसी के मार्ग में अपना पैग़म्बर बना लिया और उनसे बात की। पैग़म्बरी की घोषणा के पश्चात ईश्वर ने उन्हें कई चमत्कार प्रदान किए ताकि लोग उनकी बातों को स्वीकार करें और उन्हें ईश्वरीय प्रतिनिधि मान लें।

    ये आयतें उनके प्रथम चमत्कार का उल्लेख करती हैं कि जो लाठी का सांप मे परिवर्तित होना था। स्वाभाविक है कि पहली बार स्वयं हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम भी इस अप्रत्याशित घटना से चौंक कर पीछे हट जाते हैं क्योंकि ईश्वर ने उन्हें पहले यह नहीं बताया था कि उनकी लाठी सांप में परिवर्तित हो जाएगी।

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का स्वाभाविक रूप से सांप से डरना ही उनके चमत्कार के ईश्वरीय होने का प्रमाण भी है क्योंकि इसी प्रकार के काम जादू के माध्यम से करने वाले लोग कभी भी अपने कार्यों से नहीं डरते जबकि ईश्वरीय चमत्कारों में पैग़म्बरों की अपनी कोई भूमिका नहीं होती इस लिए सांप जैसी वस्तुओं से उनका पहली बार डरना स्वाभाविक है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि जीवन देना और लेना ईश्वर के हाथ में है तथा लाठी का सांप में परिवर्तित होना और पुनः अपनी वास्तविक स्थिति पर लौट आना ईश्वर की असीम शक्ति व ज्ञान के दृष्टिगत बहुत साधारण बात है।

    लोगों को धर्म की ओर आमंत्रित करने और प्रचार के लिए तैयारी आवश्यक है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के लिए, जिन्हें फ़िरऔन के समक्ष अपनी लाठी को फेंकना था ताकि वह एक अजगर में परिवर्तित हो जाए, आवश्यक है कि वे स्वयं पहले इस दृश्य को देख चुके हों।

    आइये अब सूरए ताहा कि आयत नंबर 22 और 23 की तिलावत सुनें।

    وَاضْمُمْ يَدَكَ إِلَى جَنَاحِكَ تَخْرُجْ بَيْضَاءَ مِنْ غَيْرِ سُوءٍ آَيَةً أُخْرَى (22) لِنُرِيَكَ مِنْ آَيَاتِنَا الْكُبْرَى (23)

    और (हे मूसा) अपने हाथ को अपने गरेबान के भीतर डालो तो (देखोगे कि) वह बिना किसी रोग के सफ़ेद होकर चमकता हुआ बाहर आएगा, यह एक अन्य निशानी (हुई)। (20:22) (यइ इस लिए है) ताकि हम तुम्हें अपनी कुछ बड़ी निशानियां व चमत्कार दिखा सकें। (20:23)

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का दूसरा चमत्कार जिसे ईश्वर ने आरंभ में ही उन्हें दिखा दिया उनके हाथ का चमकना था। इस अर्थ में कि जब वे अपने हाथ को अपने गरेबान में डाल कर बाहर निकालते थे तो वह सफ़ेद हो कर चमकने लगता था जबकि उसमें सफ़ेद दाग़ जैसे किसी रोग का कोई लक्षण नहीं होता था।

    ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को कई अन्य चमत्कार प्रदान किए थे जिन्हें उन्होंने अन्य स्थानों पर प्रयोग किया किंतु ये दो उनके सबसे बड़े चमत्कार थे जिन्हें ईश्वर ने उनकी पैग़म्बरी के आरंभ में ही उन्हें प्रदान कर दिया था।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की शक्ति असीम है और वह जो चाहे कर सकता है। वह जड़ वस्तुओं में जान फूंक कर लाठी को सांप बना सकता है और मनुष्य के एक हाथ को दूसरे हाथ से भिन्न बना सकता है।

    आवश्यक है कि लोगों को ईश्वर की ओर बुलाने के उत्तरदायी पैग़म्बर स्वयं ईश्वरीय निशानियों को देख चुके हों ताकि वे पूरे विश्वास के साथ इस भारी दायित्व को पूरा कर सकें।

    आइये अब सूरए ताहा कि आयत नंबर 24 की तिलावत सुनें।

    اذْهَبْ إِلَى فِرْعَوْنَ إِنَّهُ طَغَى (24)

    (हे मूसा!) फ़िरऔन की ओर जाओ कि निसंदेह वह उद्दंडी हो गया है। (20:24)

    पैग़म्बर बनने के बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का पहला अभियान फ़िरऔन की ओर जाना है कि जो एक ओर तो स्वयं को लोगों से पालनहार कहलाता था और दूसरी जाति के लोगों को दास बना कर अपने को उनका स्वामी समझता था।

    यद्यपि पैग़म्बरों का दायित्व लोगों का मार्गदर्शन करना और उन्हें अनन्य ईश्वर की उपासना का निमंत्रण देना है अतः ईश्वर को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को पहले मिस्र के लोगों के पास भेजना चाहिए था किंतु उन्हें सबसे पहले फ़िरऔन के पास जाने का आदेश दिया गया कि जो सारी बुराइयों और उद्दंडता की जड़ था।

    जिस समाज में लोगों के पास कोई अधिकार न हो और वे अत्याचारी शासकों के अधीन हो, उस समाज में ईश्वर के प्रिय बंदों का पहला दायित्व अत्याचार व अत्याचारियों से संघर्ष करना है ताकि ईश्वर की बंदगी का मार्ग प्रशस्त हो सके।

    एक भ्रष्ट समाज को सुधारने के लिए सबसे पहले कुफ़्र व बुराई में ग्रस्त नेताओं से निपटना चाहिए उसके बाद उस अस्वस्थ व्यवस्था के अधीन जीवन बिताने वाले लोगों को सुधारने के लिए काम करना चाहिए जो मानवीय सीमाओं से बाहर हो गई है। ऐसी व्यवस्था का प्रमुख अत्याचारी व उद्दंडी होता है जो सत्य व ईश्वर के मुक़ाबले में खड़ा होता है।

    आयतुल कुरसी में उद्दंडी शासक के मुक़ाबले में डट जाने को ईश्वर पर ईमान की भूमिका बताया गया है और संपूर्ण मानव इतिहास में ईश्वर के प्रिय बंदों ने उद्दंडी शासकों के समक्ष खड़े होकर उनसे मुक़ाबला किया है और इस मार्ग में अपने प्राण न्योछावर किए हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि धर्म, राजनीति से अलग नहीं है। लोगों के मार्गदर्शन के लिए ईश्वरीय पैग़म्बर, अत्याचारी शासकों के समक्ष खड़े हो जाते थे और उनसे संघर्ष करते थे।

    अत्याचारियों से संघर्ष में ईश्वर के प्रिय बंदों को आगे बढ़ना चाहिए तथा अन्य लोगों को उनका अनुसरण करना चाहिए क्योंकि यह संघर्ष कोई राजनैतिक नाटक नहीं बल्कि एक दायित्व है।