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    सूरए ताहा, आयतें 25-36, (कार्यक्रम 548)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 25वीं से लेकर 28वीं आयत तक की तिलावत सुनें।

    قَالَ رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي (25) وَيَسِّرْ لِي أَمْرِي (26) وَاحْلُلْ عُقْدَةً مِنْ لِسَانِي (27) يَفْقَهُوا قَوْلِي (28)

    (मूसा ने) कहा कि हे मेरे पालनहार! मेरे सीने को फैला दे (20:25) और मेरे लिए मेरे कार्य को सरल बना दे (20:26) और मेरी जीभ की गांठ को खोल दे (20:27) ताकि (मेरी जाति के लोग) मेरी बात को समझ सकें। (20:28)

    पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अपना पैग़म्बर बनाने के बाद उन्हें दो चमत्कार प्रदान किए ताकि वे लोगों के समक्ष अपनी पैग़म्बरी की घोषणा से पूर्व उन्हें वे चमत्कार दिखाएं। इन आयतों में इस ईश्वरीय दूत का पहला दायित्व या अभियान फ़िरऔन के दरबार में जाना और उसकी उद्दंडता के समक्ष डट जाना बताया गया है। यद्यपि पैग़म्बरों का दायित्व सभी लोगों का मार्गदर्शन करना है किंतु जहां समाज पर फ़िरऔन जैसे अत्याचारियों का वर्चस्व हो और उसने सभी को अपना दास बना रखा हो, ऐसे समाज में लोगों के मार्गदर्शन की राह, उन्हें अत्याचारी शासकों के वर्चस्व से मुक्ति दिला कर ही प्रशस्त होती है।

    स्वाभाविक है कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण अभियान के लिए सही तैयारी की आवश्यकता होती है। अतः हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम आरंभ में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें इस बड़े कार्य की क्षमता व सामर्थ्य प्रदान करे तथा बाहरी वातावरण भी उनके लिए अनुकूल बनाए। इसी संदर्भ में वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उनकी ज़बान की अस्पष्टता को समाप्त कर दे ताकि लोग उनकी बातें सरलता से समझ सकें।

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की सफलता का रहस्य यह था कि उन्होंने महान दायित्व को स्वीकार करने में आना-कानी करने के स्थान पर ईश्वर से प्रार्थना की कि वह संकटों और रुकावटों को समाप्त करने में उनकी सहायता करे ताकि वे अपने अभियान को सफलता से पूरा कर सकें। एक ओर तो उनकी ज़बान सरल हो जाए और अभियान पूरा करने के दौरान उनके हृदय में जटिलता न आने पाए और दूसरी ओर उनके मार्ग की बाहरी रुकावटें भी समाप्त हो जाएं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि समाज के सुधार के मार्ग में सबसे पहला क़दम, उसके नेताओं को सुधारना और यदि अत्याचारी शासक गतिरोध करें तो उनसे संघर्ष करना है।

    संयम, प्रतिरोध और लगन, बड़े दायित्वों की पूर्ति की मूल शर्तें हैं।

    बड़े कार्यों को स्वीकार करने में आना-कानी करने के स्थान पर ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें उन्हें पूरा करने की क्षमता व संभावना प्रदान करे।

    धर्म के प्रचारकों की बातें लोगों की समझ में आनी चाहिए क्योंकि कठिन एवं विशेष प्रकर के शब्दों का प्रयोग, बात को सही ढंग से समझने में रुकावट बनता है।

    आइये अब सूरए ताहा की 29वीं से 32वीं आयतों तक कि तिलावत सुनते हैं।

    وَاجْعَلْ لِي وَزِيرًا مِنْ أَهْلِي (29) هَارُونَ أَخِي (30) اشْدُدْ بِهِ أَزْرِي (31) وَأَشْرِكْهُ فِي أَمْرِي (32)

    और (हे प्रभुवर!) मेरे परिजनों में मेरे लिए एक सहायक बना, (20:29) मेरे भाई हारून को, (20:30) उसके माध्यम से मेरी पीठ को मज़बूत बना दे (20:31) और उसे मेरे कार्य में सहभागी बना दे। (20:32)

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से जो प्रार्थनाएं कीं उनमें पैग़म्बरी और बनी इस्राईल को ईश्वरीय मार्ग की ओर निमंत्रण देने के महान कार्य में उनके भाई हज़रत हारून को उनका सहभागी बनाना था कि इस बड़े कार्य का कुछ दायित्व वे भी संभालें और फ़िरऔन के समक्ष उनके साथी व सहायक रहें।

    जैसा कि क़ुरआने मजीद की व्याख्या की किताबों में वर्णित है, हज़रत हारून अलैहिस्सलाम, हज़रत मूसा से तीन वर्ष बड़े थे और बड़े स्पष्ट एवं सुंदर शब्दों में बात करते थे। वे हज़रत मूसा के जीवन में ही इस संसार से सिधार गए थे। हज़रत मूसा की प्रार्थना के कारण उन्हें भी पैग़म्बरी का पद प्राप्त हुआ और वे फ़िरऔन तथा उसके निकटवर्ती लोगों को सत्य के मार्ग की ओर आमंत्रित करने के कार्य में अपने भाई हज़रत मूसा के सहभागी एवं सहायक ठहराए गए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि बड़े कामों को पूरा करने में ईश्वर से सहायता मांगनी चाहिए और साथ ही दूसरों की सहायता की ओर से भी निश्चेत नहीं रहना चाहिए।

    सहयोगी व सहभागी न केवल आर्थिक व व्यापारिक कार्यों में आवश्यक है बल्कि धार्मिक व प्रचारिक मामलों में भी आवश्यक है ताकि हम दूसरों की क्षमताओं से भी लाभान्वित हो सकें।

    परिजनों का सहयोगी होना, कार्यों की प्रगति में प्रभावी है किंतु शर्त यह है कि उनके विचार भी आपस में मिलते हों।

    आइये अब सूरए ताहा की 33वीं से लेकर 36वीं आयतों तक की तिलावत सुनते हैं।

    كَيْ نُسَبِّحَكَ كَثِيرًا (33) وَنَذْكُرَكَ كَثِيرًا (34) إِنَّكَ كُنْتَ بِنَا بَصِيرًا (35) قَالَ قَدْ أُوتِيتَ سُؤْلَكَ يَا مُوسَى (36)

    ताकि (हे ईश्वर!) हम तुझे (हर प्रकार के समकक्ष से) बहुत विरक्त मानें। (20:33) और तुझे बहुत अधिक याद करें। (20:34) निश्चित रूप से तू हमारे बारे में अधिक (जानकार व) देखने वाला है। (20:35) ईश्वर ने कहा हे मूसा! निश्चित रूप से तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली गई। (20:36)

    इन आयतों में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की विभिन्न प्रार्थनाओं के उद्देश्य का वर्णन किया गया है कि अनन्य ईश्वर पर लोगों के ध्यान और अनेकेश्वरवाद तथा अत्यचार से दूरी के अतिरिक्त उनका कोई उद्देश्य नहीं था। ईश्वर का गुणगान करना और उसे समकक्ष सहित हर प्रकार की बुराई से दूर बताना हर एक के लिए संभव है किंतु इन बातों को समाज में व्यवहारिक बनाना और अनेकेश्वरवादी व्यवस्थाओं को समाप्त करना पैग़म्बरों का काम है और वह भी ईश्वर की सहायता और उसकी दया व कृपा से।

    फ़िरऔन के समक्ष खड़े होने का सामर्थ्य उसी में होगा जो फ़िरऔन से मुक़ाबले के मैदान में ईश्वर को उपस्थित, देखने वाला तथा सर्वसक्षम मानेगा। हज़रत मूसा व हारून का ऐसा ही ईमान व विश्वास था अतः ईश्वर ने भी उनकी प्रार्थनाओं को पूरा किया।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों की दृष्टि में सत्ता का लक्ष्य अनेकेश्वरवादी व्यवस्था को समाप्त और एकेश्वरवादी व्यवस्था को स्थापित करना है।

    यद्यपि ईश्वर हर वस्तु और हर बात को जानता व देखता है किंतु फिर भी प्रार्थना करना हमारा दायित्व है।