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    सूरए ताहा, आयतें 37-42, (कार्यक्रम 549)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 37वीं से लेकर 39वीं आयत तक की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ مَنَنَّا عَلَيْكَ مَرَّةً أُخْرَى (37) إِذْ أَوْحَيْنَا إِلَى أُمِّكَ مَا يُوحَى (38) أَنِ اقْذِفِيهِ فِي التَّابُوتِ فَاقْذِفِيهِ فِي الْيَمِّ فَلْيُلْقِهِ الْيَمُّ بِالسَّاحِلِ يَأْخُذْهُ عَدُوٌّ لِي وَعَدُوٌّ لَهُ وَأَلْقَيْتُ عَلَيْكَ مَحَبَّةً مِنِّي وَلِتُصْنَعَ عَلَى عَيْنِي (39)

    और (हे मूसा!) हम तुम पर एक बार और भी उपकार कर चुके हैं। (20:37) जब हमने तुम्हारी माँ के दिल में वह बात डाली जो डाली जानी चाहिए थी, (20:38) कि बच्चे को सन्दूक़ में रख दे, फिर उसे (नील) नदी में डाल दे ताकि नदी उसे तट पर डाल दे और उसे मेरा शत्रु और उसका शत्रु उठा ले। मैंने अपनी ओर से तुम पर अपना प्रेम डाला। (ताकि शत्रु भी तुमसे प्रेम करे) और ताकि मेरी आँख के सामने तुम्हारा पालन-पोषण हो। (20:39)

    इससे पहले हमने कहा कि जब हज़रत मूसा को ईश्वर की ओर से फ़िरऔन के मार्दर्शन का दायित्व सौंपा गया तो उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह इस कार्य में उनके भाई हज़रत हारून को उनके साथ कर दे और उन्हें आवश्यक संभावनाएं प्रदान करे। ईश्वर ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। ईश्वर इन आयतों में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को संबोधित करते हुए कहता है कि हमने इससे पूर्व भी फ़िरऔन के महल में तुम्हारी सहायता की थी। जब उसने सभी नवजात शिशुओं की हत्या का आदेश दे रखा था तब हमने तुम्हारी माता के मन में यह बात डाली कि वे तुम्हें एक संदूक़ में रख कर नील नदी में डाल दें।

    इसके बाद हमने नील नदी को दायित्व सौंपा कि वह तुम्हें पूरी सुरक्षा के साथ फ़िरऔन के महल के निकट तट तक पहुंचा दे। वहां हम फ़िरऔन और उसकी पत्नी को तट पर ले आए ताकि फ़िरऔन तुम्हें पानी से निकाले और अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर ले तथा तुम्हें, कि जो उसके शत्रु थे, अपने महल में पाले। ये सभी कार्य हमारी इच्छा से हुए जो इस बात का चिन्ह थे कि हमने तुम पर उपकार किया और तुम्हारी जान की रक्षा की।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर का इरादा हर बात पर वर्चस्व रखता है, जैसे कि फ़िरऔन चाहता था कि हज़रत मूसा का जन्म न हो किंतु ईश्वर ने उन्हें फ़िरऔन के घर में ही पाला।

    ईश्वर की एक परंपरा यह है कि वह अपने प्रिय बंदों का प्रेम लोगों के हृदय में डाल देता है।

    आइये अब सूरए ताहा कि आयत क्रमांक 40 की तिलावत सुनें।

    إِذْ تَمْشِي أُخْتُكَ فَتَقُولُ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَى مَنْ يَكْفُلُهُ فَرَجَعْنَاكَ إِلَى أُمِّكَ كَيْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ وَقَتَلْتَ نَفْسًا فَنَجَّيْنَاكَ مِنَ الْغَمِّ وَفَتَنَّاكَ فُتُونًا فَلَبِثْتَ سِنِينَ فِي أَهْلِ مَدْيَنَ ثُمَّ جِئْتَ عَلَى قَدَرٍ يَا مُوسَى (40)

    (याद करो उस समय को) जब तुम्हारी बहन (फ़िरऔन के महल में) जाती और कहती थी, क्या मैं तुम्हें उसका पता बता दूँ जो इसका पालन-पोषण करे? इस प्रकार हमने फिर तुम्हें अपनी माँ के पास पहुँचा दिया ताकि उसकी आँख ठंडी हो और वह शोकाकुल न हो। और तुमने फ़िरऔन के लोगों में से एक की हत्या कर दी और हमने तुम्हें दुख व चिंता से मुक्ति दिलाई तथा हमने बारंबार तुम्हें उस प्रकार परखा जैसे परखना चाहिए। फिर तुम कई वर्ष मदयन के लोगों में ठहरे रहे। फिर हे मूसा! जो कुछ हमने निर्धारित कर रखा है उसके आधार पर तुम (यहां) आ गए हो। (20:40)

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के जीवन में कई महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनमें से एक उनकी माता हैं जिन्होंने ईश्वर की इच्छा पर उन्हें नदी के पानी के हवाले कर दिया। दूसरी उनकी बहन हैं जो फ़िरऔन के दरबार में गईं और हज़रत मूसा को लालन-पालन के लिए अपनी माता के पास वापस ले आईं। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की पत्नी भी उन महिलाओं में थीं जो हर कठिनाई, हर यात्रा और हर पलायन में उनके साथ रहीं। फ़िरऔन की पत्नी आसिया भी उन महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने हज़रत मूसा के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने फ़िरऔन को बालक की हत्या करने से रोका और इस प्रकार हज़रत मूसा की जान बचाई। अंत में वे हज़रत मूसा पर ईमान ले आईं।

    अलबत्ता ईश्वर ने, जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को बनी इस्राईल के नेतृत्व के लिए चुनना चाहता था, विभिन्न घटनाओं में उनकी परीक्षा ली ताकि वे पूर्ण रूप से तैयार एवं दृढ़ हो जाएं और फिर उन्हें बड़े दायित्व के पालन के लिए मिस्र लौटाया जाए।

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के युवाकाल में कई घटनाएं घटीं। उनमें से एक यह थी कि एक दिन वे एक स्थान से गुज़र रहे थे तो उन्होंने देखा कि दो लोग आपस में झगड़ रहे हैं। उनमें से एक बनी इस्राईल का था और दूसरा फ़िरऔन का आदमी था। हज़रत मूसा ने अत्याचारग्रस्त व्यक्ति की सहायता करनी चाही और फ़िरऔन के व्यक्ति को एक मुक्का मारा और वह वहीं पर ढेर हो गया। इस घटना के कारण वे मिस्र से भाग कर मदयन जाने पर विवश हो गए। वहां उन्होंने हज़रत शुएब की बेटी से विवाह किया। इस झड़प का विवरण सूरए क़सस में मौजूद है।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के निकट माता का विशेष स्थान है अतः पालनहार ने माता की गोद में हज़रत मूसा की वापसी का मार्ग प्रशस्त किया ताकि वे प्रसन्न हो जाएं।

    ईश्वर के प्रिय बंदों को भारी दायित्वों का भार संभालने के लिए अत्यंत कठिन परिक्षाएं देनी पड़ती हैं।

    आइये अब सूरए ताहा कि आयत क्रमांक 41 और 42 की तिलावत सुनें।

    وَاصْطَنَعْتُكَ لِنَفْسِي (41) اذْهَبْ أَنْتَ وَأَخُوكَ بِآَيَاتِي وَلَا تَنِيَا فِي ذِكْرِي (42)

    और मैंने तुम्हें अपने लिए तैयार किया है। (20:41) तो अब तुम और तुम्हारा भाई मेरी निशानियों के साथ (फ़िरऔन की ओर) जाओ और (देखो कदापि) मेरी याद से ढिलाई न करना। (20:42)

    इन आयतों में ईश्वर अपने पैग़म्बर हज़रत मूसा के प्रति अपने अत्यंत प्रेम व स्नेह का प्रदर्शन करता है और कहता है कि तुमने जो इतनी कठिनाइयां सहन की हैं वे इस लिए थीं कि तुम ठोस बन जाओ और मेरी इच्छा का पालन करो। अब उस बड़े उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए हर चीज़ तैयार है। तो अब तुम अपने भाई हारून के साथ मेरी बातें कहने और मेरे चमत्कार दिखाने के लिए फ़िरऔन के पास जाओ और इस मार्ग में तनिक भी ढिलाई न करो कि मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं और तुम्हारी सहायता करता रहूंगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बर साधारण मनुष्य नहीं हैं कि ईश्वर उनके कांधों पर कुछ ज़िम्मेदारियां डाले बल्कि जन्म के बाद से ही ईश्वर की देख-रेख में उनका प्रशिक्षण होता है ताकि वे पैग़म्बरी के भारी दायित्व को निभाने के लिए उचित रूप से तैयार हो सकें।

    ईश्वर के प्रिय बंदों की सफलता का रहस्य, उनके द्वारा सदैव ईश्वर को पूर्ण रूप से दृष्टिगत रखना है अतः वे बड़े साहस और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ते हैं और किसी भी चीज़ से भयभीत नहीं होते।